लोकप्रिय पोस्ट

Monday, November 14, 2016

बचपन : अनकही कहानियां डायरी के पन्नों से…

माँ ! आज चारों तरफ बाल दिवस ही धूम-धड़ाके के बीच आपको कुछ बताना है। कुछ कहना है जो आजतक नहीं कह पाया।
आप हमेशा चाहती थीं न कि मैं पढ़लिखकर कर डॉक्टर बनूँ। मुझे याद है एक बार आपने कहा था। शायद इसीलिए आपने मुझे २ साल की उम्र से ही पढ़ना शुरू कर दिया था घर पर। मुझे आज भी याद है उस बड़े से आँगन के दृश्य। बिल्कुल वैसे ही,  जैसे पिक्चर की रील चलती है। आपका घंटों तक मुझे पढ़ाना। छोटी-छोटी गलतियों पर मुझे मुर्गा बनाना। घडी से देखकर आधे घंटे के लिए खेलने जाने देना,  वो भी तमाम प्रतिबंधों के साथ। “आधे घंटे का मतलब, आधे घंटे”, “घर दूर मत जाना, दुआरे पे खेलना”, “सूद के लड़कों के साथ न देखूं  आपको “, “पिंटू के साथ भी मत खेलना, गलियां देता घूमता है”… आपके नसीहतों की फेहरिस्त लंबी थी। मैं जनता हूँ  आप मुझे पूर्ण बनाना चाहती थी। आप मुझे ऐसा चाँद बनाना चाहती थी जिसमें दाग न हो। लेकिन मेरा भी अपना बचपन था माँ। मैं भी खेलना चाहता था गाँव के तमाम ‘सूद’ लड़कों की तरह। बिलकुल नंगे होकर पूरे गांव में घूमना चाहता था। धूल में लोटना चाहता था लेकिन जरा सा कपडे गन्दे हो जाने पर आप मुझे डांटती थी। मैं जाना चाहता था; खेत जोतने वाले ग्वाल बप्पा (यादव होने के कारण मैं उन्हें ग्वाल बप्पा कहता था) के साथ, उत्तर वाले खेतों में। उस हवेली से घर की चहरदीवारें मेरे लिए सलाखों से काम नहीं थी। आप मुझे संस्कारी बनाना चाहती थी। आप मुझे ऐसा बालक बनाना चाहती थी जिसको देखकर लोग अपने बच्चों को उलाहना दें। ऐसा होता भी था पर मैं खुश था। हमेशा मरा सा रहता था । मेरे अन्दर का दर्द आप समझ नहीं पाईं। मैं आपसे कुछ कह भी नही पाता था।  डरता था मैं आपसे। आप मुझे भोर ४ बजे ही उठा देती थी। रामायण के पाठ करवाती थी। मैंने आपको ‘बालक को संस्कारी कैसे बनाएं’ जैसी किताबें पढ़ते अक्सर देखा करता था। मैं आपके मन्तव्य पर कोई सवाल नहीं उठा रहा हूँ। वो तो सवालों से परे है। आप बहुत अच्छी माँ हो। आप हर हाल में मुझे सफलता के बुलंदियों पर पंहुचाना चाहती थी पर मैं मशीन नहीं था। मैं आपके  मन्तव्य को तब भी भली प्रकार से समझता था और आज भी। आपकी उस तपस्या में बदले की भावना थी। मैं आपके अंदर जल रहे आग के धधक को भली-भांति महसूस कर सकता था। आप उन लोगों को हराना चाहती थी जिन्होंने केवल स्त्री होने के कारण आपको सताया था। मैं ये भी जनता हूँ कि आप अस्तित्व लड़ाई लड़ रही थी और उस लड़ाई में मैं एक हथियार था। आप हथियार को चमका कर पैना बनाने में कोई कसर नही छोड़ना चाहती थी। आपके संघर्षों के बीज हैं मुझमें। मैं उन्हें पहचान सकता हूँ। जैसा हमेशा होता है। हर लड़ाई में महिलाएं और बच्चे पिसते हैं। मैं भी परिवार के इस लड़ाई में पिसा। मेरा बचपन इस शीत युद्ध में मारा गया। 
child
आप मुझे अपने क्लास से स्कूल में भेजना चाहती थी पर वहां दिनों अच्छे स्कूल की बात सोचना भी पाप था। गाँव में अच्छे तालीम की व्यवस्था नहीं थी। उन दिनों स्कूल के नाम पर गांव से २ किलोमीटर दूर प्राइमरी स्कूल था। आपने कुछ दिन भेज मुझे था उस स्कूल में, जहाँ पंडित जी खटिया पर लेट कर सोते थे और हफ्ते-हफ्ते पर नहाने वाले लड़के खेलने के साथ भैंस चराने का ‘ओवर टाइम’ करते थे। पिद्दी-पिद्दी से लड़के लड़कियों से हर ‘वो’ सवाल पूछते जो गांव के बैठकों में ठहाके बटोरने के काम आती थीं। एक दिन तो हद ही हो गयी। जगराम के लड़के ने रास्ते में मुझसे बंगळाहिन चाची (गाँव के मुस्लिम समाज की नाई की पत्नी, जो बंगाल से लाई गयीं थी) को गाली दिलवा दिया। मुझे क्या पता था कि उसका इतना गन्दा मतलब होता है। फिर आपने मुझे घर से दूर पापा और चाचा के पास भेज दिया। मात्र तीन साल का था मैं। मैंने कभी आपको बताया नही पर मैं कई दिनों तक छुप-छुप कर रोता रहा था। आखिर पापा मम्मी तो नहीं हो सकते न। पता है ? जब सप्ताह के अंत में पापा आपके पास गाँव जाते थे, तब चाचा मुझे कमरे में बंद करके घूमने चले जाते थे। पूरी रात के लिए…और मैं रोता रहता था कमरे के अंदर। जिंदगी और मौत से जूझते एक लैंप के उजाले में। डरता था मैं उस कमरे में…जब भूतों की कहानियां याद आती थीं। डर से रोता, चिल्लाता था और फिर थक कर सो जाता था। भूखे पेट। सबसे ज्यादा डर तो तब लगता था, जब मैं बंद दरवाजे के नीचे जमीन और लकड़ी के बीच के चीर को देखता था। मुझे हमेशा लगता था कि उसी चीरे से सांप आएगा। सांप मुझे न काट पाए इसके लिए मैं बेड से नीचे पांव नहीं रखता था। मुझे पता है कि आप भी मेरे लिए रोती थी घर पर। मुझे संस्कारी और सफल बनाने के लिए ही आप यह सब कर रही थी। आपके इस निर्माण में मेरे बचपन का विनाश हो गया माँ। आज चाहते हुए भी मैं ‘मिसिंग चाइल्डहुड’ नही लिख पा रहा हूँ। मैं जब भी अपने बचपन के बारे में सोचता हूँ तो आप मुझे विलेन लगती हैं। आपसे अच्छी तो आंटी थी। मुझे अपने दोस्त की तरह रखती थीं वो। शायद इसीलिए मैं उनसे इतना प्यार करता हूँ। मैं जानता हूँ कि जब कभी आप इसे पढ़ोगी तो आपको  दुःख होगा पर ये सच माँ। मेरा बचपन मरुभूमि में उगे नागफनी सा है और उसका साफ़ प्रभाव मेरे व्यक्तित्व पर दिखता है। उसे मैं चाह कर भी भुला नहीं सकता। जब कभी मैं दुनियादारी से बेफिकर होकर बच्चों को खेलते देखता हूँ तो मेरे आँखों में आंसू आ जाते हैं। आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो और मुझे फख्र है कि मैंने आपके कोख से जन्म लिया। यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कह रहा कि आप मेरी माँ हो बल्कि उसके पीछे कारण हैं। इस दुनिया में आपके लिए मुझसे बढ़कर कुछ नही और मेरे लिए आपसे बढ़कर कुछ नही पर जाने-अनजाने मेरा बचपन आपके हाथों नष्ट हुआ है और यह मैं कहूंगा। हाँ, मुझे इस बात का बराबर अफ़सोस है कि मैं आपकी आकांक्षाओं पर खरा नही उतर पाया। आपके स्वर्णिम जीवन इतिहास में मेरा वजूद लडे बिना हार मान लेने योद्धा सा है।

Tuesday, October 11, 2016

...लो आज जान ही लो, क्या है तालिबानी आदेश

सितंबर 1996 में काबुल में सोवियत सेना पर विजय के बाद तालिबान ने काबुल में पर्चे बंटवाए।  जो सन्देश पर्चे में लिखा था थी, वही सन्देश रेडियो और सड़कों पर आहिस्ता दौड़ते टोयोटा ट्रकों के ऊपर बंधे लाउडस्पीकर से भी सुनाई दे रहा था।  गौर से पढ़िए इन संदेशों को।  इन्ही को दुनिया तालिबानी आदेश के नाम से जानती है -

( ध्यान से पढ़िएगा )
हमारा वतन अब इस्लामिक अफगान अमीरात के नाम से जाना जाएगा। ये वे नियम हैं जिन्हें हम लागू करेंगे और आप लोग उसका पालन करेंगे-


  1. सभी नागरिकों को दिन में पांच बार नमाज़ अदा करना होगा। अगर नमाज़ के वक्त आप कोई और काम करते पकडे जाते हैं तो आपकी पिटाई  होनी तय है।   
  2. सभी मर्दों को अपनी दाढ़ी बढ़ानी होगी। दाढ़ी की सही नाप ठुड्डी से एक बंधी मुट्ठी के बराबर माना जाएगा।  अगर ऐसा नहीं करोगे तो पीटे जाओगे। 
  3. सभी लड़के पगड़ी बांधेंगे। एक से लेकर छठवीं जमात तक के बच्चे काली पगड़ी बांधेंगे। इससे ऊपर जमात में पढ़ने वाले लड़के सफ़ेद पगड़ी बांधेंगे। लड़कों को इस्लामिक कपडे पहनने होंगे। कुर्ते के बटन  हमेशा बंद रहना चाहिए। 
  4. आज से संगीत प्रतिबंधित किया जाता है। 
  5. नृत्य भी  प्रतिबंधित  किया  जाता है। 
  6. ताश खेलना, शतरंज खेलना, जुआ खेलना और पतंग उड़ाना भी मना है। 
  7. किताबें लिखना, फिल्म देखना और चित्रकारी करना भी प्रतिबंधित है। 
  8. अगर तोता या कोई अन्य पक्षी पालोगे, तो पीटे जाओगे।  जिस पक्षी को  पालोगे  उसे  मौत  के घाट उतार दिया जाएगा।  
  9. अगर चोरी करोगे तो कलाई सहित हाथ काट लिए जायेंगे। अगर दोबारा चोरी करोगे तो पैर  भी काट डाले जायेंगे। 
  10. अगर तुम मुस्लिम नही हो तो तुम ऐसी किसी भी जगह पूजा नहीं कर सकते जहाँ तुम्हे कोई मसलमान देख सकता हो। अगर ऐसा हुआ तो जेल की हवा खाओगे। पिटाई होगी सो अलग से। अगर तुम किसी मुस्लिम को अपने धर्म में परिवर्तित करते हुए पकडे जाओगे तो फांसी पर चढ़ा दिया जायेगा।

महिलाओं का उद्धार करता एक तालिब 
















महिलाएं (ख़वातीन) ध्यान दें-


  1. तुम लोग हमेशा अपने घर के अंदर रहोगी। महिलाओं का सड़कों पर निरुद्देश्य घूमना कतई  सही नही है। अगर तुम बाहर जाती हो तो तुम्हारे साथ कोई महरम (पुरुष संबंधी) होना चाहिए। अगर तुम सड़कों पर अकेली घुमते मिली तो पीटकर घर भेज जायेगा।
  2. किसी भी हालात में तुम अपना चेहरा नहीं दिखाओगी। तुम जब घर से भी बहार निकलोगी तो तुम्हे बुर्का पहनना होगा। अगर ऐसा नहीं करोगी तो पिटाई होगी। 
  3. कॉस्मेटिक का प्रयोग  प्रतिबंधित  है। 
  4. आभूषण पहनना भी मना है। 
  5. महिलाएं भड़कीले और चमकीले  कपडे नही पहनेंगी।   
  6. तुम तब तक नही बोलोगी जब तक कि बोलने के लिए कहा न जाए।  
  7. कुछ भी हो जाए तुम कभी भी मर्दों से आँख  नहीं मिलाओगी। 
  8. सार्वजनिक जगहों पर तुम्हारा हंसना  सख्त मना है। अगर ऐसा करोगी तो पीटी जाओगी। 
  9. नाखून में नेल पॉलिश नहीं लगाना है। अगर किसी के नाखून में नेल पॉलिश लगा मिला तो वह अपनी अंगुली से हाथ धो बैठेगा। 
  10. लड़कियां का स्कूल जाना मना है। लड़कियों के सारे स्कूल जल्द ही बंद कर दिए जायेंगे। 
  11. महिलाएओं का घर से बाहर काम करना मना है। 
  12. अगर व्यभिचार या छिनालपन (Adultery)करती पकड़ी गयी तो पत्थर मार-मार के मौत के घात उतार दिया जायेगा। 
सुनो। ध्यान से सुन लो।  अल्लाह हो अकबर।

क्या अफगानिस्तान के बारे में और अधिक जानने की इच्छा है? यदि हाँ तो कॉमेंट बॉक्स में 'YES' लिखें। अफगानिस्तान के बारे में आपको रोचक जानकारियों से अवगत कराया जायेगा।
 

Tuesday, September 13, 2016

जेएनयू अध्यक्ष कॉमरेड मोहित के नाम खुला पत्र

आदरणीय कॉमरेड मोहित पाण्डेय जी,
जानकर हर्ष हुआ कि आप उसी विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हैं जहाँ मैं अभी पढ़ रहा हूँ। यानि आप मेरे अग्रज हुए। अपनी संस्कृति (जिसे आप मनुवादी कहते हैं) के अनुसार चूँकि हम अपने से बड़ों को प्रणाम करके उनका अभिवादन करते हैं, मन कर रहा है कि आपको प्रणाम करूँ।  पर डर लगता है कि कहीं आप मुझे ब्राह्मणवादी या मनुवादी न ठहरा दें...। फिर कैसे आपका अभिवादन करूँ ? मुझे पता है.., आपको 'लाल सलाम' पसंद आएगा।  पर लाल सलाम पेश करने वालों ने देश-दुनिया में जो कुछ किया है उससे मेरा मन विचलित हो जाता है।  मुझे लगता है कि जिस दिन इस लाल सलाम के नारे में दुनिया के करोड़ों बेगुनाह लोगों के खून की सड़ांध आपके नथुनों तक पहुंचेगी, इस्तेकबाल करने वाले ये लफ्ज़ आपको माँ-बहन की गाली से बढ़कर लगने लगेंगे।  ऐसा मैं हरगिज़ नहीं चाहूंगा। आपका अज़नबी अनुज होने के साथ-साथ मैं उस विद्यार्थी परिषद् का सदस्य भी रहा हूँ जिसकी आपने जेएनयू से अर्थी निकाल दी। मैंने आपके अध्यक्षीय चुनावी भाषण को सुना है। उसमें आपने कहा था कि जेएनयू ही देश में असली प्रतिपक्ष है। यानि आप विपक्ष की महत्ता को मानते हैं।परंतु पता नहीं क्यों आप लोगों को अपने विश्वविद्यालय में प्रतिपक्ष की मौजूदगी नहीं बर्दाश्त हो रही। असल में मानव अधिकार, प्रतिपक्ष, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यहाँ तक की लोकतंत्र...। आप लोगों के मुंह से ये सारी बातें केवल नारों में अच्छा लगता है। आप जिस विचारधारा के झंडाबरदार बने हैं, उसने पूरी दुनिया में इन मूल्यों के साथ कैसा बलात्कार किया है, यह बात किसी से छुपी नहीं है। खैर, आपके अर्थी निकालने या पुतला दहन करने से विद्यार्थी परिषद् का अस्तित्व नहीं खत्म हो जाता। हमारा बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत इस बात का गवाह है कि जेएनयू से हम जाने वाले नहीं, अपितु हम आने वाले हैं। आप और आपके लोगों का यह घिनौना कृत्य आपकी 'खोखली और मृतप्राय' होती विचारधारा का संकेत है। हाँ, खोखली और मृतप्राय...। इन्ही दो शब्दों से काम चला रहा हूँ। आपकी जमात के विद्वानों ने असहिष्णुता की परिभाषा देते हुए इसका मतलब बताया था - किसी दूसरे के विचारों को न सुनना।  आपकी परिभाषा के अनुसार कायदे से आपको 'असहिष्णु' कहना चाहिए। परंतु सहिष्णुता और असहिष्णुता का  सर्टीफिकेट बाँटने वाली एजेंसियों पर भी तो आपके कुनबे का ही एकाधिकार है।

माखनलाल विवि से पढ़े हैं पंडित जी

बहरहाल, आप और आपके संगठन को जीत की हार्दिक शुभकामनाएं। कहते हैं सफलता अपने साथ नई जिम्मेदारियां लेकर आती है। इस जीत के बाद आपकी जिम्मेदारियां भी बढ़ीं हैं। बड़े दुर्भाग्य की बात है, आप के संगठन से देशप्रेमियों को कोई उम्मीद नहीं रह गयी है। आपके ऊपर सबसे बड़ी जिम्मेदारी है उस मर गई उम्मीद को दोबारा जिन्दा करना।  आपका अनुज होने के नाते आपसे कुछ शिकायतें हैं, कुछ सलाह, तो कुछ सवाल भी।  उम्मीद है आप मेरी
 बातों पर जरूर गौर करेंगे-




  • उम्मीद है कि आपके कार्यकाल के दौरान 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के नारों से जेएनयू परिसर नहीं गूंजेगा। महोदय, आप सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाइए, हम आपके साथ हैं। आप कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में मानवाधिकारों के हनन और उन पर हो रही ज्यादतियों पर आवाज़ उठाइए, हम आपके साथ हैं।  आपको #ऑक्यूपाई यूजीसी जैसा कोई और आंदोलन चलाना होगा तो हमको जरूर बुलाइयेगा। मैं क्या, देश का अधिकतर नौजवान आपके साथ खड़ा मिलेगा।  पर बड़े भाई ! बड़ा दर्द होता है... जब आप लोग देश को तोड़ने की बात करते हो। 1 रूपये की माचिस पर भी टैक्स देकर देश को समर्थ बनाने में लगे हम लोग देश के टुकड़े होने की बात नहीं सुन सकते।  
  • भैया, ये मनुवाद-मनुवाद का खेल खेलना बंद कर दीजिये।  मनुवाद के नाम पर गुमराह मत कीजिये देश के नौजवानों को।  हमने आज तक कभी मनुस्मृति को अपनी आँखों से देखा नहीं है, छूने की बात तो छोड़ ही दीजिये।  दिल पर हाथ रखके बताइयेगा, जेएनयू आने से पहले मनुस्मृति को कभी पढ़ा था आपने? जिस मनुस्मृति को हमने देखा नहीं, छुआ नहीं, उसको जलाकर, उसका नाम बार-बार उछालकर आप लोग क्या साबित करना चाहते हो ?
  • ये जो लाल और नीले रंग (लाल-वामपंथ, नीला-आंबेडकरवाद) को एक करने की योजना आप लोग बना रहे हैं, उससे आप लोगों का राजनीतिक हित तो सध जायेगा, पर इस देश का बड़ा नुकसान हो जाएगा। हम मानते हैं कि हमारी वर्ण व्यवस्था में समय के साथ खामियां आ गयी थीं। आज हम उनसे लगातार लड़ रहे हैं और वो धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं । दलितों में बदले की भावना भड़काकर उन्हें हमसे लड़ाइए मत। अपने इस 'वर्ग संघर्ष' की संकल्पना में थोड़ा बदलाव कीजिए।  
  • जेएनयू से आप लोग समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर आंदोलन, सभा, गोष्ठी वगैरह करते रहते हैं। अवाम पर हो रहे जुल्मों-शितम की आवाज़ को बुलंद करते रहे हैं। फलस्तीनियों के लिए आप लोगों का प्यार जग-जाहिर है; होना भी चाहिए। पर कभी बेचारे तिब्बतियों, बलूचों, पाकिस्तानी हिंदुओं, यूक्रेनियों और कुर्दों का भी हाल-चाल ले लीजिए। 
  • कश्मीरियों के दर्द को आप के जमात के लोग अपना दर्द समझते रहे  हैं, एक नज़र अभागे कश्मीरी पंडितों पर भी डाल दीजिये।  आप के भाई लोगों ने तो उन गरीबों की ओर से मुंह मोड़ रखा है।  उम्मीद है आप उनके हकों-हुकूक की आवाज़ उठाएंगे।
  • जेएनयू में मुझ जैसे गरीब छात्र अपने माँ-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए बड़ी उम्मीद से पढ़ने आते हैं। आप से निवेदन है कि उन बेचारों का कैंपस प्लेसमेंट होने दें। हर छात्र आपकी तरह क्रन्तिकारी नहीं हो सकता। अपने विधारधारा के चक्की में उसे न पीसिए।
  • आप निर्भीक और नवाचारी लोग हैं। कृपया कभी संघ और विद्यार्थी परिषद्  के उन निर्दोष कार्यकर्ताओं की आवाज़ भी बनिए, जिन्हें केरल और पश्चिम बंगाल में आपके लोग सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार देते हैं क्योंकि उनकी विचारधारा आपसे मेल नहीं खाती।  
  • निवेदिता मेनन आपके धड़े की फायरब्रांड प्रोफेसर हैं। पता नहीं क्यों कभी-कभी मेरा मन कहता है कि 'प्रोफ़ेसर' शब्द को दोबारा परिभाषित करना चाहिए। उन तक मेरा सन्देश पहुंचाइएगा कि कश्मीर, अरुणाचल या देश का कोई अन्य भाग हमारे लिए महज़ एक जमीन का टुकड़ा नहीं है। उससे हमारी भावनाएं जुडी हैं।  हज़ारों वर्ष पुरानी अपनी संस्कृति और सभ्यता से उनसे हम गुंथे हुए हैं।  इस देश की एकता और अखण्डता के लिए देश के नौजवानों ने अपना बलिदान दिया है,जेएनयू में जनता के मोटे पैसों पर बैठकर जहर नहीं उगला है।  उन्हें कहियेगा की गलत तथ्य प्रस्तुत कर लोगों को गुमराह न करें।
                                                                   और हाँ, ये ग़लतफ़हमी कभी मत पालियेगा कि आपने जेएनयू को जीत लिया है। जेएनयू आपका अंतिम किला है जिसे आप लोग बस बचाने में सफल हो पाए हैं। सोचिये एक अकेला विद्यार्थी परिषद् आप लोगों के लिए इतना बड़ा खतरा हो गया कि आप लोगों को आपस में हाथ मिलाना पड़ा। क्या ये आपकी रणनीतिक और नैतिक हार नहीं ? वैसे, देश की जनता 9 फ़रवरी को इतनी जल्दी नहीं भूलने वाली। अतः संभलकर चलिए अब, नहीं तो केरल से भी हाथ धो बैठेंगे। फ़िलहाल आशा करते हैं, लोगों को लड़ाने की बजाय आप उनकी आवाज बनेंगे। 

सहमत हों तो पोस्ट शेयर करने के साथ अपने बहुमूल्य राय से भी अवगत कराएँ.


Sunday, September 11, 2016

ख़त लिखता हूँ

मैं लेखक नहीं हूँ, और न ही मैं बनना चाहता हूँ. फिर भी मैं लिखूंगा, ऐसी कवितायेँ, जिनका कोई अर्थ न होगा। मैं लिखूंगा, ऐसी कहानियां , जिनकी कोई परिणति न होगी.. मैं ऐसी गजलें भी लिखूंगा, जिसमे न सुर होगा न ताल। मैं लिखूंगा और लगातार लिखूंगा... क्योंकि मुझे लेना है बदला, और चिढाना भी है, उस "मैं" को , जिसने किया है मेरे साथ भेदभाव.. मुझे, लेखकीय गुण न देकर..
मैं लिखूंगा.. रातों में, बरसातों में, किसी सूनी सड़को पे, या किसी तैरते सपने पर.. मैं खोजूंगा, तन्हाइयों में खुद को, इस कलम से, उन शब्दों को .. जिसने उड़ाया था, मज़ाक मेरे "मैं" होने का.. मैं थिरकाउंगा, कीबोर्ड पर अपनी अँगुलियों को.. मैं सहलाउंगा, बिना अर्थो की अपनी रचनानाओं को.. हाँ जनता हूँ ना, ये भी नहीं छपेगी.. फिर भी मैं लिखूंगा, उन तमाम प्रेम पत्रों की तरह, जिनको हर बार मोड़कर छुपा देता हूँ, तकिये के लिहाफ़ में.. मैं लिखूंगा, क्योंकि उम्मीद है, शायद ये छपेंगी एक दिन, या मेरा खत पहुंचेगा, उस शख्स तक, जिसे बताना चाहता हूँ ढेर सारी बातें.. नहीं! मैं लेखक नहीं हूँ, क्योंकि मैं कविता नहीं खत लिखता हूँ..

Friday, September 2, 2016

....क्योंकि रात हमारी है, काके !

रात में जगना एक अलग अहसास देता है। रात में सोने वालों को शायद पता भी न हो कि वे सो कर कितना कुछ खो रहे हैं ? रात के आगोश में आप वो तमाम काम कर सकते हैं जो जालिम दिन का उजाला नहीं करने देता। रात में आप सोच सकते हैं। अपने घर के आराम बिस्तर पर सोती हुई उस लड़की के बारे में जिसके लिए आपने गलियों के चक्कर काटे, मोहल्ले के 'अच्छे लड़कों' वाली छोटी सी लिस्ट में से अपना नाम कटवाया। जिसके लिए कोचिंग की अपनी क्लास को छोड़कर रास्ते में अपनी साइकिल लगाए खडे रहे ताकि उस चांद का एक झलक पा सकें। हां, बिल्कुल ! रात में आप उस चांद से चेहरे को जी भर कर याद कर सकते हैं जिसके लिए आप रात-रात तक जागे हैं। इस उम्मीद में कि शायद उसका फोन आ जाए। आप उन यादों को ताजा कर सकते हैं जब पहली बार आप मिले थे उससे। गली के उस मोड़ पर, जिसके किनारे सरकारी गोदाम की जर्जर होती दीवार पर ‘देखो गधा मूत रहा है‘ लिखा होने के बावजूद पेट भर कर मूता करते थे । जैसे वे खुद को गधा मानने को तैयार न थे। या फिर लेखक की इस ज्यादती पर ‘पुरस्कार वापसी' सरीखा आन्दोलन चला रहे थे।
साभार :www.pinterest.com
याद कीजिए रोज नाक बिचका कर पार करने वाली उस जगह पर आप कैसे खडे थे। घण्टों.......। क्योंकि उस समय आपके साथ कोई था, जिसकी कमी आपको आज तक खलती है। इसी रात में आप उस मनहूस समय को भी याद कर सकते हैं जब आप ने उसकी मजबूरी समझे बिना उसको बेवफा से शुरू करके र’डी तक फकत गालियां दी थी आपने। उस गलती के लिए रात में आप अपने आप को गरिया सकते हैं, झपड़िया सकते हैं। आप कुछ भी कर सकते हैं। रात में । आप सुट्टा मारिए, या मेरी तरह नए हैं तो जेब से निकालिए कमला पसंद की वो पुड़िया।  जो आप एक बार खरीद कर पांच बार खाते हैं। निकालिए और फांका मार लीजिए, बिना इसके परवाह किए कि कोई आपको देख लेगा। स्पेशियली वो जो आपको आज-कल कनखियों से देखा करती है। रात अपना यार है। इसके आगोश में खता होने का कोई चांस नहीं है बाॅस।  आप खुलकर खेलिए। अपने आप से। दारू से। सिगरेट से। या फिर किसी हसीन लड़की के तस्वीर से। देखिए आप। वो फिल्में जिसे दिन में देखने पर लोग मुंह बिचकाते हैं। या फिर कोई और दिव्य क्रिया कीजिए। इस निपट अकेले में। अरे नहीं! यह अकेलापन नहीं। यही तो वह महफिल है जहां हमारी आपकी सुनी जाती है। रात की महफिल आपकी है। दिन की ? अमां मियां ! वो महफिल किसी की हो पर आपकी तो नहीं है। हर कोई अपना सुनाए जा रहा है। आपको सुनने में कौन दिलचस्पी रखता है। मित्र ! यह भी बढ़िया मजाक है। मित्रता के नाम पर दिखावा है। हर कोई अपनी सुनाना चाहता है। महफिल है आपके यादों की। यही वो समय है जब आप अपने आप से, अपने वजूद से मिल सकते हैं। नहीं, घबराइए मत। इस समय आपको टोकने वाला कोई नहीं होगा। 
आप पढ़ सकते हैं तुलसीदास से लेकर खुशवंत सिंह और चेतन भगत तक। इंडिया टुडे से लेकर मनोहर कहानियां तक। आप निजात पाए रहेंगे, उस बिन मांगे सलाहों से जो पढ़ने में भी अच्छा बुरा का भेद करते हैं। आप सावरकर को भी पढ़िए और लावोस्की को भी। इस समय ऐसा कोई नहीं जो आपके हाथ में किसी किताब विशेष को देखकर राष्ट्रवादी या वामपंथी नामक बाजार में आई नई गालियों से नवाज दे। यही वो समय है जब आप मुक्त होकर सोच सकते हैं। आपके विचारों में डीटीसी बसों के हाॅर्न का शोर नहीं होगा। सड़क पर किसी बाइक के आगे आ जाने पर न ही कोई लट्ठमार कर्कश जट्ट आवाज  सुनाई देगी- ‘अबे भों*ड़ी ! अंधा है के।' 
या फिर, लिखिए....। महबूब की यादें रूमानी। पहले सेक्स की कहानी। वो लड़की अंजानी। कोई फितरत पुरानी।  या लिखिए उस पल की डायरी, जब आपको लव लेटर का जवाब थप्पड़ से मिला था। या फिर बचपन वह डर लिखिए जब चाचा आपको अकेले कमरे में बन्द कर घूमने चले गए थे और आपको लग रहा था कि बस अभी सांप लकड़ी के पल्ले और दरवाजे के बीच उस पतली सी दरार से आएगा और आपको धर दबोचेगा। अरे! उस हालात के मारे गरीब चोर के आंखों की कहानी लिखो न। जो 50 किलो गेहूं चुराने पर चैराहे पर सरेआम पीटा गया था। आप चाहते हुए भी कुछ न कर पाए थे। 

आप नाचो, गाओ, पढ़ो, लिखो, सोचो.....। आप हर वो काम करो जो दुनिया आपको दिन के रोशनी में नहीं करने देती। क्योंकि.... काके! रात हमारी है। सिर्फ हमारी। 

और हाँ, आपको कैसा लगा ये पोस्ट ? नीचे बॉक्स में बता तो दीजिये। 

Wednesday, August 31, 2016

हमें तुम पर 'शर्म' है, ऐ रियो के बैरंगों !

पूरे देश के साथ आप भी यह जानना चाहते होंगे कि रियो में हमारी इतनी बुरी दुर्गति क्यों हुई ? आप जानना चाहते होगें उन लोगों को, जो इस ट्रेजेडी के खलनायक हैं। शायद अपने फ्रेंड सर्किल में रियो पर डिस्कशन के दौरान उन इडियट्स को जी भर गालियां देने का प्लान भी बना रखा हो। खेलों में बुरे प्रदर्शन पर जब भी देश में बात होती है, तब सबसे आसान टारगेट होते हैं- खेल संगठनों को कब्जियाये राजनेता, खेल मंत्रालय के अफसर, उनकी लालफीताशाही की कहानियां व असहयोग आंदोलन से प्रभावित उनकी हरकतें। नीचे लिखे बिन्दु यह साबित करने के लिए काफी हैं कि इस बार चूक प्रशासनिक स्तर पर नहीं हुई है-


  • रियो ओलम्पिक की तैयारियों में कोई खोट न रह जाए और खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करें, इसके लिए खेल मंत्रालय ने टॉप्स यानी टारगेट ओलम्पिक पोडियम स्कीम नाम की एक विशेष समिति गठित की थी। प्रशासनिक गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अप्रैल से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक इस समिति की 54 बैठकें हुई।
  • इस समिति ने प्रत्येक खिलाड़ी से कहा था कि वे पूरे दुनिया में कहीं भी, किसी भी कोच से ट्रेनिंग ले सकते हैं। उसका पूरा खर्च मंत्रालय वहन करेगा। इसके लिए बाकायदा टॉप्स ने खिलाड़ियों से प्रपोजल मंगवाए थे।
  • ओलम्पिक के तैयारियों पर टॉप्स  ने पूरे 20 करोड़ रुपए खर्च किए।

फिर कहां रह गई खोट ?

खेल चाहे कोई भी हो उसमें हार-जीत का होना स्वभाविक पक्ष है। मगर इसके बावजूद कई खिलाड़ी ऐसे होते है जो भले ही जीत हासिल कर पाने में नाकाम रहें मगर अपने प्रदर्शन से सबको खुश होने का अवसर प्रदान करते है। इस बार हमारे पास ऐसे मौके बहुत कम आए। हमारी नाराजगी की स्वभाविक वजह यही है। ऐसा क्यों हुआ, इससे संबंधित कुछ तथ्य निम्न है, इससे आपको सारा मामला खुद ही समझ में आ जाएगा-

84 प्रतिशत खिलाड़ी अपना पिछला सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने में भी नाकाम रहे-

  • ओलम्पिक में खेलना किसी भी खिलाड़ी के लिए एक सपने जैसा होता है, जहां वह अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ देने के लिए दिन-रात एक कर देता है। देश के लिए एक अदद तमगा जीतने के लिए खिलाड़ी अपना सर्वस्व दांव पर लगा देता है। क्या हमारे खिलाड़ियों ने ऐसा किया था ?
  • रियो ओलम्पिक टीम में कुल 117 खिलाडी थे। हाॅकी में महिला व पुरुष टीम में शामिल 32 खिलाड़ियों को छोड़ दें, तो बचे कुल 85 खिलाड़ी । इन 85 खिलाड़ियों में से मात्र 13  खिलाड़ी ही अपने वर्ल्ड रैकिंग के अनुरूप या उससे बेहतर प्रदर्शन कर पाए।
  • कुल 34 ट्रैक या फील्ड एथलीटों में से मात्र 4 ने ही अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। 
  • लांग जम्पर अंकित शर्मा महीने भर पहले बनाये अपने 8.19 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्ड से आधा मीटर कम कूद पाए।
  • मेडल के प्रबल दावेदार टेबल टेनिस खिलाड़ी सौम्यजीत घोष वर्ल्ड रैकिंग में अपने से 126 पायदान नीचे के खिलाड़ी से हार गए।
  • वर्ल्ड रैकिंग में 72वें स्थान एक मात्र भारतीय जुडो खिलाड़ी अवतार सिंह 91वें पायदान के खिलाड़ी से हार गए।

....तो हमारे खाते में होता एक और सिल्वर मेडल
48 किलोग्राम भारवर्ग में वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने रियो ओलम्पिक से दो माह पहले पटियाला में सेलेक्शन ट्रायल्स के दौरान 192 किलोग्राम भार उठाकर नेशनल रिकॉर्ड कायम किया था। ओलम्पिक में वे मात्र 82 किग्रा उठा पायीं। 192 किग्रा भार उठाकर इंडोनेशियाई खिलाड़ी वहयूनी अगस्टिएनी ने रजत पदक अपने नाम कर लिया


पैसा ठूंसो, रियो जाओ, सेल्फी लो.....पर अपने परिवार के साथ 

रियो गए अनाड़ी जब देश की भद् पिटवा रहे थे, तब विवादित लेखिका शोभा डे ने ट्विट किया था-"रियो जाओ, सेल्फी लो और घर वापस लौट आओ।" 
तब उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई थी। जरा देखिए, कैसी-कैसी उच्च कोटि की धार्मिक गलियां मिलीं थीं उनको-





मुझे नहीं पता आप उनके बयान से कितना इत्तफाक रखते हैं। नीचे लिखे तथ्यों को गौर से पढ़िए, आपको उनकी बातें बहुत हद तक सही लगने लगेंगी। हां, यह सही है कि उनकी भाषा से लोगों को एतराज हो सकता है ।

  • डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया पिछले 2 साल से चोटिल चल रहीं थीं। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर राजस्थान विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। 22 मई को हुई टॉप्स कमेटी की मीटिंग बताती है कि अप्रैल में वो फिर से अपने फॉर्म में वापस लौट आई। टॉप्स स्कीम के तहत अमेरिका में अपने पति व कोच विजेन्दर सिंह के साथ ट्रेनिंग के लिए उन्होंने टॉप्स से 40 लाख रुपए मांगे। उन्हें रुपए दिए गए पर वे ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाईं
  • शूटिंग में हीना सिधू अपने पति, कोच व शूटिंग दल के प्रबंधक रौनक पंडित के साथ रियो गईं। उन्होंने तैयारियों के लिए सरकार से 1 करोड़ रुपए लिए। यह अलग बात है कि वे इतने मंहगे ट्रेनिंग के बाद भी वे फाइनल तक नहीं पहुंच पाईं। वे 10 मी. व 25 मी. श्रेणी में क्रमशः 14वें व 18वें स्थान पर रहीं।
  • ओलम्पिक के लगभग 50 दिन पहले सानिया मिर्जा की डबल्स पार्टनर प्रार्थना थाम्बरे ने साई से 60 लाख रुपए और मांगे, जबकि उनको 30 लाख रुपया मिल चुका था।
  • सानिया मिर्जा अपने मां ( टेनिस टीम की मैनजर) को रियो ले गईं।
  • डिस्कस थ्रोअर विकास गौड़ कोच के बदले अपने पिता शिव को अपने साथ रियो ले गए।
  • डिस्कस थ्रोअर सीमा अतिल अपने पति अंकुश को कोच के रूप में रियो ले गईं।
  • गोल्फर अदिति अशोक अपने पिता को कैडी के रूप में रियो ले गए।
  • रेस वॉकर सपना पूनिया और शॉट पुटर मनप्रीत कौर अपने-अपने पति को ट्रेनिंग के लिए पोलैंड अपने साथ ले गईं। सरकार ने दोनों का पूरा खर्च उठाया।

......और बोलते रहे झूठ

कभी साई से अधिक पैसे ठूंसने के लिए, तो कभी अपनी असफलता को छिपाने के लिए खिलाड़ी लगातार झूठ बोलते रहे।

  1. रियो का महाकुंभ शुरू होने के लगभग 15 दिन पहले तेज धावक दुती चंद ने खुले-आम कहा कि उनके पास जूते खरीदने तक के लिए पैसे नहीं हैं, जबकि टॉप्स के तहत उन्हें पहले ही 30 लाख रुपए मिल चुके थे। उसके बाद भी साई ने जूतों के लिए अलग से 2 लाख रुपए दिए।
  2. फिनिशिंग लाइन पर दौड़ते-दौड़ते गिर जाने के बाद सुखिर्यों में आईं मैराथन धावक ओ पी जैसा ने आरोप लगाया कि भारतीय दल ने उनके लिए पानी तक की व्यवस्था नहीं की थी, इसलिए ऐसा हुआ। रियो आयोजन समिति ने बाकायदा बयान जारी कर बताया कि पूरे 42 किमी के रास्ते में शुरूआत और अंत को छोड़कर 14 पानी के स्टॉल लगाए गए थे। उनकी साथी धावक कविता रावत और कोच ने भी उनके आरोप को झूठा बताया है।

         ये हैं गुदड़ी की ललियां - 

      अब उनकी कहानी जिन्होने देश का नाक कटने से बचाया-

पीवी संधु- टॉप्स से मात्र 44 लाख मांगे। देश में ही ट्रेनिंग हासिल की। सिल्वर मेडल जीत देश का मान रखा।

संधू का खेल देखने लायक था 

साक्षी मलिक- इस हरियाणवी छोरी को तैयारियों के लिए मात्र 12 लाख रुपए पर्याप्त लगे। देश में ही प्रशिक्षण प्राप्त किया।

और लास्ट बट नॉट द लीस्ट, दीपा करमाकर- देश की इस बेटी ने मेडल तो नहीं जिता मगर दिल सबका जीता है। 
दीपा को रियो की तैयारियों के लिए मात्र दो लाख रुपयों की जरूरत पड़ी।
सवाल ये नहीं है कि किसने कितने पैसे मांगे ? या अपने साथ किसको ले गए ? सवाल यह है कि इन सब के बाद उन्होंने रिजल्ट क्या दिया ? ध्यान रहे रिजल्ट केवल मेडल नहीं होते। रिजल्ट दिया है करमाकर ने, संधु ने। उन्होंने रियो में जो किया वो हमारे लिए कई गोल्ड से बढ़कर है। 
अब सवाल यह उठता है कि- 

  • क्या देश में योग्य खिलाडियों की कमी है ? या उन्ही खिलाडियों को आगे बढाया जाता है जो खेल अधिकारी व नेताओं के करीब हैं ? 
  • क्या नरसिंह यादव का रिओ में न खेल पाने की वजह आपसी कलह और राजनीति थी ?
  • महिला खिलाडियों के कोच बने उनके पति क्या कोच बनने का काबीलियत रखते हैं ?
  • क्या पूर्व खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल के असम चुनावों में व्यस्त रहने के कारण रिओ तैयारियों पर गलत असर पड़ा ?
  • जहाँ अधिकतर खिलाडियों को 40 से 50 लाख के आस-पास रूपये मिले वहीँ, हीना सिद्धू को 1 करोड़ कैसे मिल गए ?



इस पोस्ट में आपने ध्यान दिया होगा, बहुत सारे खिलाड़ियों के पति, मां या पिता ही कोच, प्रबंधक और न जाने क्या-क्या है। अगला पोस्ट खेल में पनप रहे इस परिवारवाद के पड़-ताल पर ही केंद्रित होगा।


Sunday, August 28, 2016

कम्यूनिकेशन गैप है जनसत्ता व इंडियन एक्सप्रेस के मैनेजमेण्ट में: मनोज मिश्रा



हिन्दी अखबार  'जनसत्ता ' की कहानी कमोबेश भारत देश जैसी है। जिसके अतीत में नीर-क्षीर की नदियां बहा करती थीं, वह आज अपने पहचान की लड़ाई लड़ रहा है। सोचिए, जनसत्ता का कोई जिम्मेदार व्यक्ति आपको मिल जाए तो आप उससे क्या जानना चाहेंगे ? कि जनसत्ता क्यों डूबता जा रहा है ? सोचिए और बताइए। संयोगवश  हमारी (मैं और राजीव ) मुलाकात  हुई  जनसत्ता दिल्ली के मेट्रो एडिटर मनोज मिश्र  से । हमने उनसे क्या पूछा, नीचे पढ़िए-   
सर, मेट्रो शहरों की रिपोर्टिंग अन्य क्षेत्रों की रिपोर्टिंग से अलग कैसे है ?

मेट्रो शहरों में आवागमन सुविधाजनक है। रिपोर्टर को कम क्षेत्रफल कवर करना होता है। रिपोर्टर आधुनिक उपकरणों के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। एक जगह जाने से कई काम निबट जाते हैं। इस तरह मेट्रो शहरों की रिपोर्टिंग आसान है। छोटे शहरों में कम विकास होने की वजह से रिपोर्टिंग थोड़ी मुश्किल है।

सोशल नेटवर्किंग साइटों ने रिपोर्टिंग को आसान कर दिया है, परन्तु  रिपोर्टर के पास प्रायोजित सामग्री आने लगी। ऐसे में रिपोर्टर इससे कैसे बचे ?

बिल्कुल सही कहा आपने। हमने जब पत्रकारिता शुरू की थी तो एक वर्जन के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। टेक्नालाॅजी के आने से चीजें आसान हो गयीं हैं। अब जैसे हर चीज का साइड इफैक्ट होता है, उसी तरह यह टेक्नालाॅजी का साइड इफैक्ट है। इससे बचने के दो ही तरीके हैं। अव्वल तो आप को घटनास्थल पर खुद जाना चाहिए। दूसरा, इस तरह के स्रोतों से मिली जानकारी को क्रास-चेक करके ही आगे बढ़ाएं।
जनसत्ता दिल्ली के मेट्रो एडिटर श्री मनोज मिश्र  हमसे मुखातिब होते हुए.


अक्सर किसी विशेष राजनीतिक दल को कवर करने वाले रिपोर्टर उस दल के प्रवक्ता के तरह बात करने लगते हैं। ऐसा क्यों ?

देखिए, मनुष्य विचारशील प्राणी है। कोई-न-कोई विचारधारा तो उसमें रहेगी ही। ऐसे में थोड़ा-बहुत झुकाव तो होता ही है, परन्तु खबरों में यह झुकाव नहीं दिखना चाहिए। न्यूज और व्यूज में अंतर बरकरार रखना चाहिए।

ऐसा देखा जा रहा कि अनेक समाचार-पत्र विश्लेषण के नाम पर न्यूज में व्यूज को मिला रहे हैं। यह कहां तक सही है  ?

यह बिल्कुल गलत है। यह पत्रकारिता के साथ अन्याय है।

एजेंसी के रिपोर्ट्स पर बढ़ती निर्भरता के दौर में खबरों का अलग-अलग एंगल कैसे निकालें ?

खबरों के लिए एजेंसी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। रिपोर्टिंग का ‘ए' ही घटनास्थल है। अलग-अलग समाचार पत्रों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु समाचार तो एक ही होना न..। बाकी एंगल तो खबर लिखने वाले उप-सम्पादक के नजरिए पर निर्भर करता है।

आशंका जताई जा रही है कि एजेंसियों की बढ़ती संख्या के कारण मीड़िया संस्थानों से रिपोर्टर का पद समाप्त हो जाएगा। आपकी क्या राय है ? 

(तपाक से)... अभी इतनी जल्दी खत्म नहीं होगा। लेकिन खतरा तो है।

सर, जनसत्ता के प्रसार संख्या में कमी का क्या कारण है ?


हमने प्रसार संख्या (सर्कुलेशन) पर कभी ध्यान नहीं दिया। हम उन्हीं लोगों को पढ़ाना चाहते हैं जो खबरों से इतर कुछ पढ़ना चाहते हैं। प्रभाष जोशी जी जब रिटायर हो रहे थे तब हमने उनका ध्यान इस ओर आकर्षित कराया था परंतु उन्होंने इस तरफ ध्यान नहीं दिया जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है।

एक ही समूह का होने के बावजूद इंडियन एक्सप्रेस में छपने वाली बड़ी खबरें जनसत्ता में दूसरे-तीसरे दिन छपती हैं। ऐसा क्यों ?

देखिए, जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के प्रबंधन में गैप आ गया है। पहले तो कुछ खबरें जनसत्ता में छपती थीं लेकिन वे इंडियन एक्सप्रेस में नहीं छपती थीं। मैं इस बारे में अपने संपादक जी से बात करुंगा।

मुकेश भारद्वाज जी के संपादकीय सत्ता में आने के साथ ही जनसत्ता कुछ मामलों में एनबीटी की राह चल पड़ा है। क्या जनसत्ता अपनी पहचान बदलना चाहता है ?

हां, ये सही है कि कुछ मामलों में जनसत्ता एनबीटी की राह पर है। कभी समाचार-पत्र जनसत्ता की राह चला करते थे, पर आज स्थिति उलट  है। पहचान बदलने के मामले पर....... मुझे लगता है कि अभी स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है।

हमारे पीढ़ी का पत्रकार या तो रिपोर्टर बनना चाहता है या एंकर। ऐसे में क्या डेस्क पर कुशल पत्रकारों का अकाल पड़ सकता है ?

डेस्क किसी भी संस्थान की रीढ़ की हड्डी है। संस्थान की सफलता बहुत हद तक उसके डेस्क पर निर्भर करती है। मैं मूलतः रिपोर्टर रहा हूं पर मैं मानता हूं कि किसी पत्रकार को प्रसिद्धि डेस्क से ही मिलती है। इंडियन एक्सप्रेस सहित कोई भी अखबार जो अच्छा कर रहा है, उनका डेस्क बहुत मजबूत है। एक एंकर या रिपोर्टर के पीछे बीस-बीस डेस्क के पत्रकार लगे होते हैं।

प्रभाष जोशी जी के समय की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में क्या अंतर है ?

जमीन-आसमान का अंतर  है। तब किसी को खुश करने के लिए खबरें नहीं लिखीं जाती थी। आज तो बाकायदा ट्रेंड सेट कर दिया गया है। हमारे अखबार में तो कम, अन्य अखबारों में तो डिक्टेट तक किया जाता है।

नवोदित पत्रकारों के लिए भविष्य की लिहाज से पत्रकारिता के किस बीट में अधिक संभावनाएं हैं ?

देखिए, दो चीजें हैं- एक तो सीखने के लिहाज से और दूसरा करियर की लिहाज से। सीखने के लिहाज से अपराध, पुलिस, कानून-व्यवस्था और राजनीति महत्वपूर्ण बीट हैं। मनोरंजन, फैशन, जीवन-शैली जैसे क्षेत्र उभरते हुए हैं इसीलिए इनमें करियर की संभावनाएं अधिक हैं।

Sunday, August 21, 2016

अफगानी सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्भीक कदम उठाये भारत : करज़ई

बतौर अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई को अपना दूसरा व अंतिम कार्यकाल पूरा किए हुए लगभग दो साल हो रहे हैं। लेकिन अफगानी राजनीति में वे अब भी एक प्रमुख शक्ति बने हुए हैं। उन्होंने अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस से पीएम के बलूचिस्तान पर बयानआईएस के खतरे से लेकर कश्मीर की वर्तमान स्थिति पर खुलकर बात की. मैंने इस साक्षात्कार को अनुदित करने की कोशिश की है. ताकि अच्छी सामग्री हिंदी के पाठक तक पहुँच सके. पेश है बातचीत का प्रमुख अंश-

पीएम नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में बलूचिस्तान के बारे बयान दिया है, वह भी लाल किले की प्रचीर से। आपके हिसाब से उनके इस बयान का क्या असर होगा ?

इसका मतलब है कि भारत इस क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और मानवाधिकारों के बारे में चिंतित है। यह बयान भारत के इस चाह को दर्शाता है कि बलूचिस्तान के लोग भी बेहतर करें। वे बंदूकों के फायरिंग, कट्टरवादी हमले व बमबारी से दूर कष्टरहित सामान्य जीवन जी सकें। बलूचिस्तान हमारे लिए कोई अलग मसला नहीं है। अफगानिस्तान में कट्टवाद वहीं से आता है। बलूचिस्तान हमसे भौगोलिक व मानसिक दोनों रूप से बहुत करीब है। हमें बलूची लोगों की शांति व विकास तक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। यह मानवाधिकर का मामला है जो हर बलूची का अधिकार है।

शायद पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इस मसले पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी है। क्या इस वजह से आने वाले दिनों में भारत-पाक सम्बन्धों में बदलाव देखने को मिलेगा?
यह भारतीय उपमहाद्वीप में महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा। यह कदम इस क्षेत्र में शांति व स्थिरता कायम करने व राज्य द्वारा नीतिगत तरीके से कट्टरवाद और अतिवाद को उपयोग करने की प्रथा को खत्म करने की दिशा में कारगर साबित होगा। हमें इस दिशा में मिलकर काम करना होगा।

शांति व विकास तक पहुँच हर बलूची का अधिकार है.

आईएस के उदय और इसके परिणाम को आप किस रूप में देखते हैं ? विशेषकर भारत के संदर्भ में भारतीय अधिकारियों से मिलने पर क्या आप इस बारे में बात करते हैं ?

बिल्कुल ! यह मुद्दा भारत और अफगानिस्तान के बीच वार्ता का थीम होता है। रुढ़िवाद और अतिवाद की वजह से जन-धन की भारी हानि हो रही है। भारत को आईएस को गम्भीरता से लेना चाहिए। हमारे क्षेत्र के लिए यह पूर्णतः विदेशी सोच है, अतः हमें मिलकर इससे निबटना चाहिए।

अगर हम भारतीय संदर्भ में देखें तो आईएस बाकीे आतंकी समूहों से अधिक घातक और खूंखार है। ऐसा क्यों?

आईएस आईएस अफगानी मूल का नहीं है और उसका तालिबान से कोई सम्बन्ध नहीं है। अत का उद्देश्य कहीं अधिक घातक है। तालिबान स्थानीय थे। मूलतः अफगानी।  आपको उनसे अत्यधिक सतर्क रहना होगा। आपको उनकी भारत में पहुंच और भारतीय हितों पर कुठाराघात को रोकना ही होगा। जैसा कि अभी वे अफगानिस्तान में कर रहे हैं।

बतौर राष्ट्रपति आपने सैनिक साजो-सामान की वो सूची भारत को सौंपी, जो आप भारत से चाहते हैं। कुछ हेलीकाप्टरों को छोड़कर सूची में शामिल अन्य साजो-सामान भारत अभी तक नहीं दे पाया है। क्या आपको लगता है भारत इस बारे में और अधिक कर सकता है ?

भारत को अफगानिस्तान के सैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खुलकर सामने आना चाहिए। मैं चाहता हूं कि अफगान सैन्य क्षमता को बढ़ाने के लिए भारत को कड़े कदम उठाए। इसे चमत्कारिक ही कहा जाएगा कि भारत, पाकिस्तान और अमेरिका दोनों के दृष्टिकोण से सहमत दिखता था। मैं चाहता हूं कि भारत अपने हितों और भारत-अफगान सम्बन्धों को ध्यान में रखकर उचित कदम उठाए। वर्तमान सरकार ने कुछ हेलीकाप्टर दिए हैं परन्तु हमें उनसे अधिक अपेक्षा है।

भारत अफगान नेशनल आर्मी को किस तरह के साजो-सामान उपलब्ध करा सकता है ? जिससे उसकी क्षमता को बढ़ाया जा सके?

भारत हमारे सेनाओं की स्थिति को बखूबी जानता है। सैनिक साजो-सामान से लेकर सैन्य प्रशिक्षण तक बहुत सारी चीजें हैं जिनको भारत उपलब्ध करवा सकता है। और ये चीजें भारत के पास हैं भी।

क्या आपको लगता है कि भारत पीएम मोदी के बलूचिस्तान पर बयान के बाद अफगानिस्तान को सैन्य सहायता के दिशा में अपेक्षाकृत अधिक काम कर रहा है?

मैं इस बात को लेकर अत्यधिक आशान्वित हूं कि भारत, अफगानिस्तान और अफगानी सेना के मजबूत करने के लिए और अधिक सहायता उपलब्ध कराएगा। हमें अपने पड़ोसी पाकिस्तान के साथ भी शांतिपूर्ण रिश्ते कायम करने होंगे।

इन दिनों कश्मीर उथल-पुथल से गुजर रहा है। इस पूरे मामले को आप कैसे देखते हैं ?
मैं आशा करता हूं कि वहां शांति स्थापित होगी। वहां खून-खराबा, अशांति व बाहरी हस्तक्षेप बन्द होगा।

इस समय आप पीएम नरेन्द्र मोदी को क्या संदेश देना चाहेंगे ?

अफगानिस्तान के प्रति भारतीय सहयोग के लिए हम उनके आभारी हैं। अफगानिस्तान पर उनका मजबूत स्टैंड, क्षेत्रीय मसलों पर उनके खुले और स्पष्ट विचारों का हम स्वागत करते हैं।
(इस पोस्ट का मकसद उन पाठकों तक क्वालिटी प्रोडक्ट पंहुचाना है जो अंग्रेजी में खुद असहज महसूस करते हैं.पूरा साक्षात्कार पढने के लिए क्लिक करें.)

Wednesday, May 4, 2016

वाह दीदी ! तू और तेरे गुंडे..

( पश्चिम बंगाल के चुनाव में हिंसा ओर मारकाट की घटनाएँ आम हैं पर जब पांचवीं  में  पढने  वाले  एक बच्चे को सिर्फ इसलिए पीट-पीट कर बेहोश कर दिया जाता है कि उसने खेलने के लिए किसी दल का बैनर फाड़ लिया था तो मानवता शर्मसार हो उठती है. जी हाँ ! पूर्वी कैनिंग विधानसभा सीट के हरिहरपुर गाँव में तृणमूल कोंग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ऐसा करामात किया है. पढ़ें उस 9 साल के नन्हे बच्चे की डायरी ....)

लगातार मिलते जनसमर्थन से दीदी के गुंडे के हौसले  सातवें आसमान पर हैं 


उस दिन अच्छी हवा चल रही थी. मैं पतंग उड़ाना चाहता था. अप्रैल महीने का अंत चल रहा था. मैं जानता था कि अब्बा के 3000 महीने के अल्प आय में से इस समय अम्मी पतंग के लिए रूपये देने से रहीं. तभी मेरी नज़र सामने के खम्भे पर हवा के थपेड़ों से फडफडाते हुए बैनर पर पड़ी. बस मिल गया. वह बैनर नहीं पतंग है. जैसे वो खम्भे पर न लटका हो, दूर आसमान में तारों से कबड्डी खेल रहा हो और मैं ! मैं अपने हाथों में उसकी डोर लिए हुए पड़ोस में खेलने गये एक छोटे बच्चे की माँ की तरह कह रहा हूँ कि तू बहुत थक गया है, आजा आराम कर ले फिर खेलने जाना. इन्ही हसीन ख्वाबों में डूबा मैं बरबस खम्भे की ओर चल पड़ा. खयाली पतंग की डोर अभी तक मेरे हाथों में थी. मैंने जोर लगा कर खींचा. बैनर धडाम की आवाज के साथ जमीन पर आ गिरा. इस बैनर से बड़ा पतंग बन सकता है. बड़ा.....वाला. इतना बड़ा जितना किसी के पास नही है. न शाकिर के पास, न मुन्नन के पास और न ही उस भूरे, घुंघराले बालों वाले अब्दुल के पास. मुझे नए प्रयोग करना अच्छा लगता है. मैं हर चीज में कुछ नया खोजता हूँ. ऐसा मेरे दादा ने  मुझे सिखाया है. मैं बना रहा हूँ ऐसा पतंग जो पानी बरसने पर भी उड़ सके जब सब अपने घरों में दुबके बैठे हों. मैं इसमें लगाउंगा, बहन शकीना के उस नीले दुपट्टे के टुकड़े को. जिसको बकरी ने खूंटी से खींचकर कुतर दिया था. मैं पतंग में बैनर के तीन गुब्बारे जैसे दिखने वाले फूलों को एकदम बीचो-बीच रखूँगा ताकि रिमझिम बारिश के बीच जब पतंग उड़े तो फूलों को मिल जाये पानी की फुहारें. और वे खुले नीले आसमान में उड़ते हुए मुझे कहें-“थैंक्यू”. अचानक मेरे तरफ पांच-छह लोगों की दौड़ने की आवाजें आने लगीं. वे कुछ बुदबुदा रहे हैं. नहीं शायद गरिया रहे है. धमाक-धमाक. फट-फट. फटाक-फटाक. भच्च....मुंह से लाल-लाल कुछ निकल पड़ा. कानों में सांय-सांय की आवाज़. सन्नाटा.... बेहोशी.
अपने बाबा के साथ पीड़ित शाहिल मुल्ला                (फोटो :इंडियन एक्सप्रेस) 
             मेरा नाम शाहिल मुल्ला है . मैं पांचवी में पढता हूँ. परिवार में 6 लोग हैं. मेरा घर पश्चिम बंगाल के हरिहरपुर गाँव में पड़ता है. अभी मैं अपने एक कोठरी के घर में चारपाई पर लेटा हूँ. कमरा छोटा है पर हम रह लेते हैं इसमें. दो लोग चारपाई पर सो जाते हैं बाकी सब जमीन में. आह! बहुत दर्द हो रहा है सिर में. लगता है जैसे किसी ने बड़ा सा पत्थर मेरे सर पर दे मारा हो. मेरे होंठ सूजे हुए हैं. माँ ज्यादा करवट नहीं लेने देती कहती है डॉक्टर ने मना किया है. कमर में चोट की वजह से. अम्मी के आँखों से आंसू निकल रहे हैं. वो बगल में बैठी है, जबसे मेरी आँख खुली है. वो मेरे माथे पर कपडे की पट्टी रख रही है. पट्टी गीली है. उसके आंसुओं से या पानी से ? पता नहीं. वे मुझे दीदी के उस गंदे आदमी अएजुल सरदार के पास ले गए थे. उसके सामने उन गुंडों ने मुझे बहुत मारा. बोले तुम्हारा बाप माकपा का मेंबर है. एक दिन हम तुम सब को जान से मार देंगे. मैं मार से बुरी तरह बेहोश हो गया था. मुन्नन कहता है कि बाबा मुझे गाँव के बाहर बड़े से खाली मैदान में से उठाकर लाये हैं. लोग कहते हैं कि वे ममता दीदी के आदमी थे. लोग दीदी को तो अच्छा कहते हैं फिर उनके आदमियों ने मुझे मारा क्यूँ ? मैंने क्या किया था? मैं तो केवल पतंग बनाना चाहता था. मैं अब कभी पतंग नहीं उड़ाउंगा, नहीं तो वो मुझे फिर से मारेंगे.


Monday, May 2, 2016

तीव्र आर्थिक विकास ओर मजदूर हितों के बीच संतुलन


हर वर्ष 1 मई को मजदूरों के नाम पर घडियाली आंसू बहाए जाते हैं. कहा जाता है कि भारत में इस परम्परा की शुरुवात मद्रास में 1 मई 1923 में लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान नामक संगठन ने किया. हर साल इस तारीख को मजलूमों से रहनुमाई रखने वाले लोग लाल झंडे के नीचे इक्कट्ठे होकर मजदूर हितों की बात करते हैं. इससे उनका हित कितना होता है, ये बाद का मसला है. लाल झंडे के देवता माने जाने वाले कार्ल मार्क्स ने कहा था कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ. एक होकर क्या करो ? तख्ता पलट कर दो. शासन पर अपना कब्ज़ा कर लो. चाहे इसके लिए तुम्हे खूनी रास्ता ही क्यों न अपनाना पड़े. दुनिया के अनेक देशों में ऐसा हुआ भी. चीन, रूस सहित दुनिया के अन्य देशों सहित भारत में पश्चिम बंगाल एवं केरल जैसे राज्यों में कम्युनिस्ट ओर मार्क्सवादी पार्टियों के नेतृत्व में सरकारें बनीं. यानि मजदूर वर्ग सत्ता में आ गया. सत्ता में आने के बाद मजदूरों का कल्याण होना चाहिए था पर क्या ऐसा हुआ ? चीन ओर रूस में श्रमिकों के शोषण की कहानियां किसी से छिपी नहीं है. कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल में लोगों की स्थिति बदतर ही हुई है. साफ है कि बाहर से लुभाने वाली मार्क्स की विचारधारा मजदूरों का कल्याण न कर सकी. मार्क्स की विचारधारा समस्या के समाधान में केवल एक पक्ष को शामिल करता है. जब बात श्रमिक की हो रही हो तो स्वामी को कैसे भुलाया जा सकता है ? क्या उद्योगपति के हितों की अनदेखी कर श्रमिक हितों की बात व्यवहारिक तरीके से की जा सकती है ? सेवक ओर स्वामी एक दुसरे के बिना अधूरे हैं. तो मालिक और मजदूर के हितों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? इस बात को समझने से पहले हमें यह समझना होगा कि वास्तव में दोनों चाहते क्या हैं? एक-दूसरे से उनकी अपेक्षाएं क्या हैं ? पहले बात श्रमिकों की. श्रमिक अपने श्रम का उचित और समय पर भुगतान चाहता है. साथ ही वह सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा की भी हसरत रखता है. क्या पता गाहे-बगाहे अगर कोई दुर्घटना घट जाये तो शेष जीवन या उसके न रहने के बाद उसके मातहत बीबी-बच्चे भूखों मरने को बेबस न हों. मोटा-मोटा बस इतना ही चाहता है मजदूर. अब बात उद्योगपति की. कोई भी व्यक्ति मुनाफा कमाने के लिए ही उद्योग शुरू करता है. जैसे-जैसे पूरी दुनिया में बाजारीकरण व निजीकरण का दबदबा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे माल को सस्ते दाम पर उपलब्ध कराने के साथ-साथ मुनाफा कमाने की चुनौती भी लगातार बढ़ती जा रही है. सस्ते और गुणवत्तापरक माल ही बाज़ारों में टिक पा रहे हैं. परोक्ष रूप से कहें तो बाज़ार में सस्ते ओर गुणवत्तापरक श्रम की जबरदस्त मांग है. यानि नियोक्ता को सस्ता ओर प्रशिक्षित श्रम चाहिए. बात यहीं से बिगड़ना शुरू होती है. बाज़ार में प्रशिक्षित श्रम की भरी किल्लत है. लोगों की काम करने की क्षमता कम है. अपने आपको मुनाफे में रखने के लिए उद्दमी काम का समय बढ़ा देता है जबकि सुविधाएँ काम करता है. वर्तमान युग के मजदूर ओर नियोक्ता हितों के सामने असल समस्या है-उद्योग में अकुशल श्रम का आना. इस समस्या का हल दोनों पक्षों को मिलकर निकलना होगा. हमें श्रम को उद्योग विशेष की प्रकृति एवं मांग के अनुरूप प्रशिक्षित करना होगा. तभी मजदूरों का भी भला हो सकेगा और तेजी से बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, पुल, बांध, सड़कें, ऊँची-ऊँची इमारतें, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आदि बन ओर पनप सकेंगी. आखिर विकास का हमारा यही तो पैमाना है.  

Sunday, April 17, 2016

राष्ट्रवाद

लगभग महीने भर पहले राजधानी के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में घटी देश विरोधी नारेबाजी की घटना ने राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह के बहस को जन्म दिया. जब बहस देशद्रोह बनाम राष्ट्रवाद पर छिड़ी तो देशद्रोह व राष्ट्रवाद के परिभाषा पर बहस छिड़ना भी लाजिमी था और ऐसा ही हुआ. आज देश का बौद्धिक खेमा राष्ट्रवाद के परिभाषा पर अलग-अलग खेमों में बंटा हुआ है. कन्हैय्या कुमार और उनके साथियों के गिरफ़्तारी के बाद तो जेएनयू में बाकायदा राष्ट्रवाद पर खुली कक्षाएं आयोजित की गयीं. राष्ट्रवाद मुख्य रूप से पश्चिम से आयातित संकल्पना है. वाम विचारधारा के विद्वान ऐसा ही मानते हैं. पश्चिम में औद्दोगिक क्रांति एवं साम्राज्यवाद के उदय के साथ ही राष्ट्रवाद की संकल्पना का उभार हुआ. पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल में उनके साझा आर्थिक हित थे.  पश्चिमी राष्ट्रवाद का उदय दुनिया के संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की मंसा की पृष्ठभूमि में हुआ. जिसने पूरी दुनिया को “हम” और “अन्य” में बाँट दिया. यह मूलतः बुर्जुआ संकल्पना थी. पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल में कुछ साझा पहचान थी . जैसे दुनिया पर कब्ज़ा ज़माने वालों की नस्ल गोरी थी . वे क्राइस्ट को मानते थे . भौगोलिक एकरूपता के कारण उनका खान-पान, वेश-भूषा सब एक जैसी थी. यानी पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल में समानता और एकरूपता थी. उन्होंने अपने आपको दुनिया में सबसे श्रेष्ठ घोषित किया. इस प्रकार राष्ट्रीय राज्यों का उदय खुद को एक-दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने की पृठभूमि में हुआ. पश्चिमी राष्ट्रवाद के विभाजनकारी स्वरुप को इसी बात से समझा जा सकता है कि मात्र धार्मिक असमानता के कारण यहूदियों को पश्चिमी देशों ने कभी अपने यहाँ टिकने न दिया.

              भारतीय राष्ट्रवाद अपने प्रकृति के कारण पश्चिमी संकल्पना से निहायत भिन्न है. हमारा राष्ट्रवाद भारतीय उपमहादीप के विविधताओं में मौजूद कुछ साझे तत्वों पर आधारित है. वाम विचारक मानते हैं कि भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना अंग्रेजों के आगमन के साथ आयी जो लगभग पश्चिमी ढांचे पर आधारित था. परन्तु अंग्रेजों के आगमन से पूर्व शेरशाह सूरी ने ग्रांड ट्रंक रोड बनवाई जो बहुत सारे राज्यों से होकर गुजरती थी. क्या इस घटना में राष्ट्रवाद के लक्षण नहीं मिलते ? क्या वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कोई सड़क कई देशों से बिना किसी सीमा और रोक-टोक के गुजर सकती है ? मूलरूप से भारतीय राष्ट्रवाद सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित है. इसमें ‘हम’ और ‘अन्य’ के विचार के लिए कोई स्थान नहीं है. भारतीय राष्ट्रवाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का उद्घोष करता है. भारतीय राष्ट्रवाद वैश्विक संसाधनों पर अधिकार ज़माने की बात नहीं करता और न ही ये नस्लीय, धार्मिक या जातीय समानता की बात करता है. यानी बहुलता इसके जड़ में बसी है. भारतीय राष्ट्रवाद के इसी विशेषता का परिणाम है कि हमारे देश में जिस भी जाति, नस्ल या धर्म के लोग आये हमने सबको स्वीकार किया. राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ को राष्ट्रवाद का अगुवा माना जाता है. वह खुद भी इस बात का उद्घोष करता है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उसका प्रमुख एजेंडा है और यही कारण है कि संघ के मानचित्र के अनुसार भारतीय राष्ट्र में वर्तमान भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश तक का क्षेत्र आता है. संघ दृष्टि में पूरा भारतीय उपमहादीप एक राष्ट्र है. इस प्रकार का राष्ट्रवाद समावेशी है. बहुलतावादी है. परन्तु दुर्भाग्य से वर्त्तमान समय में देश में राष्ट्रवाद के अर्थ को बेहद संकुचित कर दिया गया है. आज राष्ट्र का अर्थ चंद राष्ट्रीय प्रतीकों तक सिमट कर रह गया है जो भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उसके उद्गम स्थल पर ही झुठलाता है. सबसे मज़ेदार बात यह है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की झंडाबरदार आरएसएस की सहयोगी संस्थाएं ही यह काम कर रही हैं. मसलन अगर आप भारत माता को माता नहीं मानते तो आप राष्ट्रवादी नहीं हैं. अगर आप महिषासुर दिवस मनाते हैं तो आप राष्ट्रवादी नहीं हैं और चूँकि आप राष्ट्रवादी नहीं हैं इसलिए आप देशद्रोही हैं. निरपेक्ष आप रह ही नहीं सकते. राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र बाँटने वाले आपको निरपेक्ष रहने ही नहीं देंगे. उनके लिए स्त्री-पुरुष के बीच, दिन-रात के बीच कोई चीज आती ही नहीं है. राष्ट्रवाद पर छिड़ी वर्त्तमान बहस बौद्धिक समाज के भटकाव को ही नहीं वरन लोगों की संकुचित होती मानसिकता को भी प्रदर्शित करती है. वैसे भी राष्ट्रवाद की संकल्पना अपने उदयकाल से ही विवादों में रही है. अपेक्षाकृत अधिक उदार लोग दुनिया में किसी सीमा को नहीं स्वीकार करना चाहते हैं. पहली नज़र में यह लुभाती है पर क्या बिना किसी सामाजिक इकाई के आधुनिक सभ्य समाज की कल्पना की जा सकती है ? उदहारण सामने है. पश्चिमी देश अपने टूटते परिवारों से किस प्रकार जूझ रहे हैं. अतः समाज में राष्ट्र नामक इकाई का रहना तो आवश्यक है परन्तु वर्त्तमान विकृत राष्ट्रवाद समाज में कलह ही पैदा करेगा. बेहतर होगा यदि हम अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अति-उदार, बहुलतावादी माडल को लागू करने की दिशा में काम करें. यह भारत के साथ-साथ विश्व कल्याण के लिए भी उपयोगी होगा.  

Monday, March 14, 2016

प्रथम साक्षात्कार


उत्तर-प्रदेश सरकार पॉलीथीन प्रतिबन्ध को भले ही अमल में न ला पायी हो पर नोएडा का बिशनपुरा गाँव पॉलीथीन मुक्त ग्राम बनने की ओर अग्रसर है| खास बात यह है कि ये अभियान गाँव के लोगों द्वारा स्वेच्छा से चलाया जा रहा है| अभियान का नेतृत्व करने वाले रिटायर्ड नौसैन्य कर्मी रणवीर सिंह से अभियान के संदर्भ में बात कर रहें हैं शुभम |    

आपको इस तरह का सकारात्मक अभियान चलाने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

आज हमारे चारों ओर जो गन्दगी दिखाई पड़ती है उसमे सबसे बड़ा योगदान पॉलीथीन का है| यह ऐसा अपशिष्ट है जिसका निस्तारण करना बहुत मुश्किल है| इस समस्या से निबटने के लिए हम लोगों ने अपने स्तर पर काम करना शुरू किया| बाद में सरकार का फैसला आया जिससे साहस और प्रोत्साहन मिला|

आपने इस कार्य के लिए लोगों को राजी कैसे किया?

प्रदूषण और इससे होने वाली बीमारियों से प्रत्येक व्यक्ति परेशान है लेकिन इससे निजात पाने के लिए  वह खुद कोई कदम नहीं उठा रहें है| हमने लोगों को इससे होने वाली हानियों से अवगत कराया| इसके लिए पूरे गाँव में हमने पोस्टर लगवाकर जागरूकता फैलाई| सबसे खास बात यह है कि इस गाँव की सामाजिक संरचना में तालमेल इतना अच्छा है कि पूरा गाँव आसानी से एक निर्णय पर पहुँच जाता है|

इस मुहिम के प्रति लोगों में क्या प्रतिक्रिया है?

सबसे पहले तो लोगों ने यही सवाल उठाया कि बहुत सारी चीजें जो पॉलीथीन में ही आती हैं उनका क्या करें? हमने लोगों को समझाया कि अपने स्तर पर हम जो कर सकते हैं तो वो तो करें पहले| आप देखिये तो 60 फीसद पॉलीथीन का प्रयोग कैरी बैग के रूप में होता है| हमारी बात को लोगों ने माना| इससे हमने गन्दगी के बड़े हिस्से को नियंत्रित कर लिया है|

तो आप पॉलीथीन रैपर्स से कैसे निबटेंगे?

यह तो बड़े स्तर की बात है| हम तो कहते हैं कि प्लास्टिक बंद कर दो| जब ये नहीं था तब भी तो लोग आराम से रह रहे थे| इसका कोई दूसरा विकल्प निकल आएगा| वैसे हमने उन चीजों का इस्तेमाल कम कर दिया है जो पॉलीथीन रैपर्स में आतीं हैं|

बिशनपुरा को आदर्श ग्राम बनाने के लिए आपकी और कौन-कौन सी योजनायें हैं?

देखिये, हम सभी क्षेत्रों पर ध्यान दे रहें हैं जिसमे कूड़ा निश्तारण, जल निकासी, भूमिगत विद्युतीकरण के अलावा समाज में बढती दूरी को कम करने एवं सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन करेंगे|

सुनने में आ रहा है कि इस मुहिम के जरिये आप चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं| यह किस हद तक सही है ?

चुनाव का इस मुहिम से कोई सम्बन्ध नहीं हैं| दोनों चीजें अलग-अलग हैं| सामजिक कार्यों सरोकारों से हमारा परिवार पहले से ही जुडा रहा है|

देश के अन्य ग्राम पंचायतों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?

देश की ग्राम पंचायतों को और अधिक स्वायत्ता और अधिकारों की मांग करनी चाहिए| हाँ, उन्हें पूरे रोडमैप के साथ काम करना चाहिए जिसमे जनसमर्थन अत्यंत आवश्यक है|