हर वर्ष 1 मई को मजदूरों के नाम पर घडियाली आंसू बहाए जाते हैं. कहा जाता है कि
भारत में इस परम्परा की शुरुवात मद्रास में 1 मई 1923 में लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान
नामक संगठन ने किया. हर साल इस तारीख को मजलूमों से रहनुमाई रखने वाले लोग लाल
झंडे के नीचे इक्कट्ठे होकर मजदूर हितों की बात करते हैं. इससे उनका हित कितना होता है,
ये बाद का मसला है. लाल झंडे के देवता माने जाने वाले कार्ल मार्क्स ने कहा था कि
दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ. एक होकर क्या करो ? तख्ता पलट कर दो. शासन पर अपना
कब्ज़ा कर लो. चाहे इसके लिए तुम्हे खूनी रास्ता ही क्यों न अपनाना पड़े. दुनिया के
अनेक देशों में ऐसा हुआ भी. चीन, रूस सहित दुनिया के अन्य देशों सहित भारत में पश्चिम
बंगाल एवं केरल जैसे राज्यों में कम्युनिस्ट ओर मार्क्सवादी पार्टियों के नेतृत्व
में सरकारें बनीं. यानि मजदूर वर्ग सत्ता में आ गया. सत्ता में आने के बाद मजदूरों
का कल्याण होना चाहिए था पर क्या ऐसा हुआ ? चीन ओर रूस में श्रमिकों के शोषण की
कहानियां किसी से छिपी नहीं है. कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद पश्चिम
बंगाल में लोगों की स्थिति बदतर ही हुई है. साफ है कि बाहर से लुभाने वाली मार्क्स
की विचारधारा मजदूरों का कल्याण न कर सकी. मार्क्स की विचारधारा समस्या के समाधान
में केवल एक पक्ष को शामिल करता है. जब बात श्रमिक की हो रही हो तो स्वामी को कैसे
भुलाया जा सकता है ? क्या उद्योगपति के हितों की अनदेखी कर श्रमिक हितों की बात
व्यवहारिक तरीके से की जा सकती है ? सेवक ओर स्वामी एक दुसरे के बिना अधूरे हैं.
तो मालिक और मजदूर के हितों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? इस बात को समझने
से पहले हमें यह समझना होगा कि वास्तव में दोनों चाहते क्या हैं? एक-दूसरे से उनकी
अपेक्षाएं क्या हैं ? पहले बात श्रमिकों की. श्रमिक अपने श्रम का उचित और समय पर
भुगतान चाहता है. साथ ही वह सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा की भी हसरत रखता है. क्या
पता गाहे-बगाहे अगर कोई दुर्घटना घट जाये तो शेष जीवन या उसके न रहने के बाद उसके
मातहत बीबी-बच्चे भूखों मरने को बेबस न हों. मोटा-मोटा बस इतना ही चाहता है मजदूर.
अब बात उद्योगपति की. कोई भी व्यक्ति मुनाफा कमाने के लिए ही उद्योग शुरू करता है.
जैसे-जैसे पूरी दुनिया में बाजारीकरण व निजीकरण का दबदबा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे
माल को सस्ते दाम पर उपलब्ध कराने के साथ-साथ मुनाफा कमाने की चुनौती भी लगातार बढ़ती
जा रही है. सस्ते और गुणवत्तापरक माल ही बाज़ारों में टिक पा रहे हैं. परोक्ष रूप
से कहें तो बाज़ार में सस्ते ओर गुणवत्तापरक श्रम की जबरदस्त मांग है. यानि
नियोक्ता को सस्ता ओर प्रशिक्षित श्रम चाहिए. बात यहीं से बिगड़ना शुरू होती है.
बाज़ार में प्रशिक्षित श्रम की भरी किल्लत है. लोगों की काम करने की क्षमता कम है.
अपने आपको मुनाफे में रखने के लिए उद्दमी काम का समय बढ़ा देता है जबकि सुविधाएँ
काम करता है. वर्तमान युग के मजदूर ओर नियोक्ता हितों के सामने असल समस्या
है-उद्योग में अकुशल श्रम का आना. इस समस्या का हल दोनों पक्षों को मिलकर निकलना
होगा. हमें श्रम को उद्योग विशेष की प्रकृति एवं मांग के अनुरूप प्रशिक्षित करना
होगा. तभी मजदूरों का भी भला हो सकेगा और तेजी से बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, पुल, बांध,
सड़कें, ऊँची-ऊँची इमारतें, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आदि बन ओर पनप सकेंगी. आखिर
विकास का हमारा यही तो पैमाना है. लोकप्रिय पोस्ट
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Monday, May 2, 2016
तीव्र आर्थिक विकास ओर मजदूर हितों के बीच संतुलन
हर वर्ष 1 मई को मजदूरों के नाम पर घडियाली आंसू बहाए जाते हैं. कहा जाता है कि
भारत में इस परम्परा की शुरुवात मद्रास में 1 मई 1923 में लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान
नामक संगठन ने किया. हर साल इस तारीख को मजलूमों से रहनुमाई रखने वाले लोग लाल
झंडे के नीचे इक्कट्ठे होकर मजदूर हितों की बात करते हैं. इससे उनका हित कितना होता है,
ये बाद का मसला है. लाल झंडे के देवता माने जाने वाले कार्ल मार्क्स ने कहा था कि
दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ. एक होकर क्या करो ? तख्ता पलट कर दो. शासन पर अपना
कब्ज़ा कर लो. चाहे इसके लिए तुम्हे खूनी रास्ता ही क्यों न अपनाना पड़े. दुनिया के
अनेक देशों में ऐसा हुआ भी. चीन, रूस सहित दुनिया के अन्य देशों सहित भारत में पश्चिम
बंगाल एवं केरल जैसे राज्यों में कम्युनिस्ट ओर मार्क्सवादी पार्टियों के नेतृत्व
में सरकारें बनीं. यानि मजदूर वर्ग सत्ता में आ गया. सत्ता में आने के बाद मजदूरों
का कल्याण होना चाहिए था पर क्या ऐसा हुआ ? चीन ओर रूस में श्रमिकों के शोषण की
कहानियां किसी से छिपी नहीं है. कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद पश्चिम
बंगाल में लोगों की स्थिति बदतर ही हुई है. साफ है कि बाहर से लुभाने वाली मार्क्स
की विचारधारा मजदूरों का कल्याण न कर सकी. मार्क्स की विचारधारा समस्या के समाधान
में केवल एक पक्ष को शामिल करता है. जब बात श्रमिक की हो रही हो तो स्वामी को कैसे
भुलाया जा सकता है ? क्या उद्योगपति के हितों की अनदेखी कर श्रमिक हितों की बात
व्यवहारिक तरीके से की जा सकती है ? सेवक ओर स्वामी एक दुसरे के बिना अधूरे हैं.
तो मालिक और मजदूर के हितों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? इस बात को समझने
से पहले हमें यह समझना होगा कि वास्तव में दोनों चाहते क्या हैं? एक-दूसरे से उनकी
अपेक्षाएं क्या हैं ? पहले बात श्रमिकों की. श्रमिक अपने श्रम का उचित और समय पर
भुगतान चाहता है. साथ ही वह सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा की भी हसरत रखता है. क्या
पता गाहे-बगाहे अगर कोई दुर्घटना घट जाये तो शेष जीवन या उसके न रहने के बाद उसके
मातहत बीबी-बच्चे भूखों मरने को बेबस न हों. मोटा-मोटा बस इतना ही चाहता है मजदूर.
अब बात उद्योगपति की. कोई भी व्यक्ति मुनाफा कमाने के लिए ही उद्योग शुरू करता है.
जैसे-जैसे पूरी दुनिया में बाजारीकरण व निजीकरण का दबदबा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे
माल को सस्ते दाम पर उपलब्ध कराने के साथ-साथ मुनाफा कमाने की चुनौती भी लगातार बढ़ती
जा रही है. सस्ते और गुणवत्तापरक माल ही बाज़ारों में टिक पा रहे हैं. परोक्ष रूप
से कहें तो बाज़ार में सस्ते ओर गुणवत्तापरक श्रम की जबरदस्त मांग है. यानि
नियोक्ता को सस्ता ओर प्रशिक्षित श्रम चाहिए. बात यहीं से बिगड़ना शुरू होती है.
बाज़ार में प्रशिक्षित श्रम की भरी किल्लत है. लोगों की काम करने की क्षमता कम है.
अपने आपको मुनाफे में रखने के लिए उद्दमी काम का समय बढ़ा देता है जबकि सुविधाएँ
काम करता है. वर्तमान युग के मजदूर ओर नियोक्ता हितों के सामने असल समस्या
है-उद्योग में अकुशल श्रम का आना. इस समस्या का हल दोनों पक्षों को मिलकर निकलना
होगा. हमें श्रम को उद्योग विशेष की प्रकृति एवं मांग के अनुरूप प्रशिक्षित करना
होगा. तभी मजदूरों का भी भला हो सकेगा और तेजी से बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, पुल, बांध,
सड़कें, ऊँची-ऊँची इमारतें, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आदि बन ओर पनप सकेंगी. आखिर
विकास का हमारा यही तो पैमाना है.
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well written shubham!Keep it up!
ReplyDeletewell written shubham!Keep it up!
ReplyDeleteउत्साह वर्धन हेतु धन्यवाद मित्र
ReplyDeleteसही प्रश्न उठाए हैं...
ReplyDeleteसही प्रश्न उठाए हैं...
ReplyDeleteकोई कमी हो तो बताइए ?
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