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Sunday, May 14, 2017

...तो मां बनने को तैयार हैं आप?

सुबह से ही सोशल साइट्स पर मदर्स डे से सम्बंधित पोस्ट पढ़ रहा हूँ. हर कोई अपने-अपने तरीके से मां के प्रति अपना प्रेम प्रकट कर रहा है. कोई मोबाइल में पड़े हजारों फ़ोटोज़ के बीच अपने मां को ढूंढ रहा है तो कोई फोटो के ऊपर लिखने के लिए अच्छा कैप्शन ढूंढ रहा है. कई लोग यह नहीं तय कर पा रहे कि मां की कौन सी फोटो डालें जिस पर लोग 'गॉर्जियस', 'ब्यूटीफुल', 'अवसम' जैसे कमेंट करें. मां के प्रति हमारी भावनाएं आज उफान पर हैं. आज हमारे भावनाओं के समंदर में ज्वार उठ खड़ा हुआ है. ज्वार के साथ एक बड़ी दिक्कत है. इसकी नियति में भाटा हो जाना लिखा है.

बरसाती केवल मेढक ही नहीं होते, हमारे ज़ज्बात भी बरसाती होते हैं. अलग-अलग दिन, अलग-अलग तरह की बारिश होती है और हर बारिश के हिसाब से हम खुद को बदल लेते हैं. आज मदर्स डे की बारिश है, कल फादर्स डे की होगी, परसों वैलेंटाइन डे की, नरसों टेडी डे की और उसके बाद रोज़  डे, थैंक्यू  और पता नहीं कितने और डे... मदर्स डे को मां सबसे ऊपर है, वैलेंटाइन डे को प्यार सबसे ऊपर होगा और टेडी डे को जिंदगी में टेडी सबसे महत्वपूर्ण चीज बन जाएगी। हर नए दिन में नई प्राथमिकताएं।

भावनाएं सेंसेक्स हैं, रोज नई ऊंचाइयों पर होती हैं. हम निवेशक हैं. हमें लगता है यही वह पॉइंट है जहाँ सबसे ज्यादा फायदा है. हर दिन हम अपने हिस्से की भावनाओं को किसी ‘डे’ नामक ब्रोकर से तुडवाकर उसे बाजारू बना देते हैं.

मैं उलझन में हूँ. मुझे क्या करना चाहिए? अपनी भावनाओं को बाजारू बना दूँ? एक फोटो अपलोड करके कुछ अच्छा सा लिख दूँ? क्या मां बस एक फोटो है और हमारे जीवन में उसका योगदान बस कैप्शन तक सीमित है? क्या हम मां को किसी एक देह, फोटो, किसी याद तक समेट सकते हैं? मेरी मां कौन है? सिर्फ वो जिसने मुझे जन्म दिया?
(फोटो क्रेडिट: juliapelish.com)

नहीं। 'मां' शब्द की अभिव्यक्ति मात्र उस महिला से नहीं हो सकती जिसने मुझे जन्म दिया है. कोई भी भौतिक वस्तु मां शब्द को नहीं निरूपित कर सकती है. मां एक भावना है, एक विचार है. मां एक खूबसूरत अहसास है. एक ऐसा एहसास जो हर अच्छे-बुरे वक्त में हमारे साथ परछाई के तरह चलता है.

याद कीजिए जब कभी रात के 10 बजे किसी सूनसान सड़क पर किसी डरी-सहमी लड़की को देखकर आपके मन में उसके प्रति चिंता के भाव आयें थे। वो चिंता नहीं थी आपका ममत्व था. उस समय आप आप नहीं थे. उस समय आप मां हो गए थे. जब उस डरी लड़की ने सड़क पर गुजर रही किसी गाड़ी की हेडलाइट के उजाले में आपके आँखों में कुछ देखकर आपके बैक सीट पर धीरे से बैठ गयी थी। तब उसने आपके आँखों में मां देखा था. जब आपका कोई मित्र एसएससी में चौथी बार सिर्फ 2 नंबर से लटक जाने के बाद फूट-फूट कर रो रहा था. आपने उसे संभाला था. उसे हिम्मत न हारने वाले किस्से सुनाये थे, आपने उसका सिर अपने कंधे पर रखकर उसके बालों में प्यार से हाथ फेरा था और उसके साथ जब आप भी फूट कर रोए थे. तब आप आप नहीं थे. आप मां हो गए थे. आप तब भी मां थे जब आपने किसी दलित, आदिवासी, गरीब, किसान के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद किया था.

हम सब के भीतर 'कुछ' मां है. किसी के अन्दर थोड़ा ज्यादा किसी के अन्दर थोड़ा कम. हमें अपने अन्दर के मां को पहचानना है. अपने अन्दर के 'मां' वाले हिस्से को थोड़ा बढ़ाना है. मां के नाम पर रोज़ निकालने वालीं हजारों गालियों को बंद करना है. अगर हम यह सब कर पाए तो मदर्स डे की सार्थकता होगी. नहीं तो यह 'डे' बरसात बन जाएगा और हम मेंढक, डे प्रोडक्ट हो जाएगा और हम खरीदार।

तो बताइए आप मां बनाने को लिए तैयार हैं?

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