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Sunday, September 11, 2016

ख़त लिखता हूँ

मैं लेखक नहीं हूँ, और न ही मैं बनना चाहता हूँ. फिर भी मैं लिखूंगा, ऐसी कवितायेँ, जिनका कोई अर्थ न होगा। मैं लिखूंगा, ऐसी कहानियां , जिनकी कोई परिणति न होगी.. मैं ऐसी गजलें भी लिखूंगा, जिसमे न सुर होगा न ताल। मैं लिखूंगा और लगातार लिखूंगा... क्योंकि मुझे लेना है बदला, और चिढाना भी है, उस "मैं" को , जिसने किया है मेरे साथ भेदभाव.. मुझे, लेखकीय गुण न देकर..
मैं लिखूंगा.. रातों में, बरसातों में, किसी सूनी सड़को पे, या किसी तैरते सपने पर.. मैं खोजूंगा, तन्हाइयों में खुद को, इस कलम से, उन शब्दों को .. जिसने उड़ाया था, मज़ाक मेरे "मैं" होने का.. मैं थिरकाउंगा, कीबोर्ड पर अपनी अँगुलियों को.. मैं सहलाउंगा, बिना अर्थो की अपनी रचनानाओं को.. हाँ जनता हूँ ना, ये भी नहीं छपेगी.. फिर भी मैं लिखूंगा, उन तमाम प्रेम पत्रों की तरह, जिनको हर बार मोड़कर छुपा देता हूँ, तकिये के लिहाफ़ में.. मैं लिखूंगा, क्योंकि उम्मीद है, शायद ये छपेंगी एक दिन, या मेरा खत पहुंचेगा, उस शख्स तक, जिसे बताना चाहता हूँ ढेर सारी बातें.. नहीं! मैं लेखक नहीं हूँ, क्योंकि मैं कविता नहीं खत लिखता हूँ..

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