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Monday, November 14, 2016

बचपन : अनकही कहानियां डायरी के पन्नों से…

माँ ! आज चारों तरफ बाल दिवस ही धूम-धड़ाके के बीच आपको कुछ बताना है। कुछ कहना है जो आजतक नहीं कह पाया।
आप हमेशा चाहती थीं न कि मैं पढ़लिखकर कर डॉक्टर बनूँ। मुझे याद है एक बार आपने कहा था। शायद इसीलिए आपने मुझे २ साल की उम्र से ही पढ़ना शुरू कर दिया था घर पर। मुझे आज भी याद है उस बड़े से आँगन के दृश्य। बिल्कुल वैसे ही,  जैसे पिक्चर की रील चलती है। आपका घंटों तक मुझे पढ़ाना। छोटी-छोटी गलतियों पर मुझे मुर्गा बनाना। घडी से देखकर आधे घंटे के लिए खेलने जाने देना,  वो भी तमाम प्रतिबंधों के साथ। “आधे घंटे का मतलब, आधे घंटे”, “घर दूर मत जाना, दुआरे पे खेलना”, “सूद के लड़कों के साथ न देखूं  आपको “, “पिंटू के साथ भी मत खेलना, गलियां देता घूमता है”… आपके नसीहतों की फेहरिस्त लंबी थी। मैं जनता हूँ  आप मुझे पूर्ण बनाना चाहती थी। आप मुझे ऐसा चाँद बनाना चाहती थी जिसमें दाग न हो। लेकिन मेरा भी अपना बचपन था माँ। मैं भी खेलना चाहता था गाँव के तमाम ‘सूद’ लड़कों की तरह। बिलकुल नंगे होकर पूरे गांव में घूमना चाहता था। धूल में लोटना चाहता था लेकिन जरा सा कपडे गन्दे हो जाने पर आप मुझे डांटती थी। मैं जाना चाहता था; खेत जोतने वाले ग्वाल बप्पा (यादव होने के कारण मैं उन्हें ग्वाल बप्पा कहता था) के साथ, उत्तर वाले खेतों में। उस हवेली से घर की चहरदीवारें मेरे लिए सलाखों से काम नहीं थी। आप मुझे संस्कारी बनाना चाहती थी। आप मुझे ऐसा बालक बनाना चाहती थी जिसको देखकर लोग अपने बच्चों को उलाहना दें। ऐसा होता भी था पर मैं खुश था। हमेशा मरा सा रहता था । मेरे अन्दर का दर्द आप समझ नहीं पाईं। मैं आपसे कुछ कह भी नही पाता था।  डरता था मैं आपसे। आप मुझे भोर ४ बजे ही उठा देती थी। रामायण के पाठ करवाती थी। मैंने आपको ‘बालक को संस्कारी कैसे बनाएं’ जैसी किताबें पढ़ते अक्सर देखा करता था। मैं आपके मन्तव्य पर कोई सवाल नहीं उठा रहा हूँ। वो तो सवालों से परे है। आप बहुत अच्छी माँ हो। आप हर हाल में मुझे सफलता के बुलंदियों पर पंहुचाना चाहती थी पर मैं मशीन नहीं था। मैं आपके  मन्तव्य को तब भी भली प्रकार से समझता था और आज भी। आपकी उस तपस्या में बदले की भावना थी। मैं आपके अंदर जल रहे आग के धधक को भली-भांति महसूस कर सकता था। आप उन लोगों को हराना चाहती थी जिन्होंने केवल स्त्री होने के कारण आपको सताया था। मैं ये भी जनता हूँ कि आप अस्तित्व लड़ाई लड़ रही थी और उस लड़ाई में मैं एक हथियार था। आप हथियार को चमका कर पैना बनाने में कोई कसर नही छोड़ना चाहती थी। आपके संघर्षों के बीज हैं मुझमें। मैं उन्हें पहचान सकता हूँ। जैसा हमेशा होता है। हर लड़ाई में महिलाएं और बच्चे पिसते हैं। मैं भी परिवार के इस लड़ाई में पिसा। मेरा बचपन इस शीत युद्ध में मारा गया। 
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आप मुझे अपने क्लास से स्कूल में भेजना चाहती थी पर वहां दिनों अच्छे स्कूल की बात सोचना भी पाप था। गाँव में अच्छे तालीम की व्यवस्था नहीं थी। उन दिनों स्कूल के नाम पर गांव से २ किलोमीटर दूर प्राइमरी स्कूल था। आपने कुछ दिन भेज मुझे था उस स्कूल में, जहाँ पंडित जी खटिया पर लेट कर सोते थे और हफ्ते-हफ्ते पर नहाने वाले लड़के खेलने के साथ भैंस चराने का ‘ओवर टाइम’ करते थे। पिद्दी-पिद्दी से लड़के लड़कियों से हर ‘वो’ सवाल पूछते जो गांव के बैठकों में ठहाके बटोरने के काम आती थीं। एक दिन तो हद ही हो गयी। जगराम के लड़के ने रास्ते में मुझसे बंगळाहिन चाची (गाँव के मुस्लिम समाज की नाई की पत्नी, जो बंगाल से लाई गयीं थी) को गाली दिलवा दिया। मुझे क्या पता था कि उसका इतना गन्दा मतलब होता है। फिर आपने मुझे घर से दूर पापा और चाचा के पास भेज दिया। मात्र तीन साल का था मैं। मैंने कभी आपको बताया नही पर मैं कई दिनों तक छुप-छुप कर रोता रहा था। आखिर पापा मम्मी तो नहीं हो सकते न। पता है ? जब सप्ताह के अंत में पापा आपके पास गाँव जाते थे, तब चाचा मुझे कमरे में बंद करके घूमने चले जाते थे। पूरी रात के लिए…और मैं रोता रहता था कमरे के अंदर। जिंदगी और मौत से जूझते एक लैंप के उजाले में। डरता था मैं उस कमरे में…जब भूतों की कहानियां याद आती थीं। डर से रोता, चिल्लाता था और फिर थक कर सो जाता था। भूखे पेट। सबसे ज्यादा डर तो तब लगता था, जब मैं बंद दरवाजे के नीचे जमीन और लकड़ी के बीच के चीर को देखता था। मुझे हमेशा लगता था कि उसी चीरे से सांप आएगा। सांप मुझे न काट पाए इसके लिए मैं बेड से नीचे पांव नहीं रखता था। मुझे पता है कि आप भी मेरे लिए रोती थी घर पर। मुझे संस्कारी और सफल बनाने के लिए ही आप यह सब कर रही थी। आपके इस निर्माण में मेरे बचपन का विनाश हो गया माँ। आज चाहते हुए भी मैं ‘मिसिंग चाइल्डहुड’ नही लिख पा रहा हूँ। मैं जब भी अपने बचपन के बारे में सोचता हूँ तो आप मुझे विलेन लगती हैं। आपसे अच्छी तो आंटी थी। मुझे अपने दोस्त की तरह रखती थीं वो। शायद इसीलिए मैं उनसे इतना प्यार करता हूँ। मैं जानता हूँ कि जब कभी आप इसे पढ़ोगी तो आपको  दुःख होगा पर ये सच माँ। मेरा बचपन मरुभूमि में उगे नागफनी सा है और उसका साफ़ प्रभाव मेरे व्यक्तित्व पर दिखता है। उसे मैं चाह कर भी भुला नहीं सकता। जब कभी मैं दुनियादारी से बेफिकर होकर बच्चों को खेलते देखता हूँ तो मेरे आँखों में आंसू आ जाते हैं। आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो और मुझे फख्र है कि मैंने आपके कोख से जन्म लिया। यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कह रहा कि आप मेरी माँ हो बल्कि उसके पीछे कारण हैं। इस दुनिया में आपके लिए मुझसे बढ़कर कुछ नही और मेरे लिए आपसे बढ़कर कुछ नही पर जाने-अनजाने मेरा बचपन आपके हाथों नष्ट हुआ है और यह मैं कहूंगा। हाँ, मुझे इस बात का बराबर अफ़सोस है कि मैं आपकी आकांक्षाओं पर खरा नही उतर पाया। आपके स्वर्णिम जीवन इतिहास में मेरा वजूद लडे बिना हार मान लेने योद्धा सा है।

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