जिंदगी जीने का मेरा तरीका थोडा सा अलग है. मेरा मानना है दूसरे में
गलती निकालने से पहले अपनी गलती ढूंढ लेना चाहिए. आप अपनी गलती ढूंढ का सही कर
लीजिए मैं अपनी. मैंने कल फेसबुक पर जो पोस्ट लिखा उसमें आप यह अप्रोच देख सकते
हैं. मैं स्वामी विवेकानंद के विचारों से काफी प्रभावित रहा हूँ. उन्होंने कहा था
कि अगर किसी का दर्द समझना हो तो उसके स्थान पर खुद को रख के देखो. जब भी किसी
दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक के साथ अन्याय होता है तो मुझे पीड़ा होती है क्योंकि
मैं 1 मिनट के लिए उनके स्थान पे खुद को रख के सोचता हूँ. अगर आप मुझसे इस तरह के
पोस्ट लिखने की अपेक्षा करते हैं तो मुझे क्षमा करें –
दलितों के धर्म छोड़ने से आप क्यों परेशान हैं?
मेरे पोस्ट पर लोग सबसे ज्यादा जिस बात पर उखड़े हैं वो है - दलितों को
धर्म परिवर्तन का सुझाव देना. मुझे समझ में नहीं आता इसमें गलत क्या है? पूरी
जिंदगी हम चीजों को छोड़ने और पकड़ने का ही काम करते हैं. दरअसल हमारी जिंदगी
छोड़ने-पकड़ने से ही बनी है. गाँव में अच्छा स्कूल नहीं था इसलिए गाँव छोड़कर सबसे
पास के किसी शहर में पढने आए. उस शहर में अच्छी उच्च शिक्षा नहीं मिल सकती थी
इसलिए उसे छोड़कर बड़े शहर आए. शहर में एक कमरा ढूंढा रहने के लिए. कुछ समय बाद लगा
की यह कमरा जम नहीं रहा है तो उसे छोड़ दूसरा पकड़ लिया. उस कमरे में 2 साल रहे.
कमरा अपने घर जैसा लगने लगा. उससे प्रेम हो गया. फिर हमारी आमदनी बढ़ी तो हमने उस
प्यारे कमरे को छोड़ फ्लैट ले लिया. जब इस शहर में अच्छी नौकरी नहीं मिली तो दूसरे
शहर में चले गए. उससे भी अच्छी नौकरी विदेशों में मिली तो वहां चले गए. कॉलेज में
एक गर्लफ्रेंड पटाई (शब्द पर आपको आपत्ति हो सकती है पर हमारे समाज में लड़की पटाई
ही जाती है). कुछ समय बाद उससे अनबन होने लगी तो उसे छोड़ दिया किसी दूसरी लड़की को
पकड़ लिया. मतलब ‘मूव ऑन’ कर लिया. जब कभी कोई मित्र किसी एक लड़की के प्यार में
देवदास बन जाता है तो हम उसे यही तो सुझाते हैं – ‘मूव ऑन’. जब हमारा किसी से झगड़ा
हो जाता है या हम किसी चीज पर अटक जाते हैं तो दोस्तों की सबसे ज्यादा दी जाने
वाली सलाह ‘छोडो यार’ होती है.
अब आप बताइए क्यों छोड़ा आपने उस गाँव को जिसने आपको पाल-पोस कर बड़ा किया? जिसके मिटटी में आप खेले-खाए? उस शहर को आपने क्यों छोड़ा जिसने आपको पहचान दी? उस कमरे को क्यों छोड़ा जो आपको घर जैसा लगने लगा था? उस शहर को आपने क्यूँ छोड़ा जहाँ आप अपने प्रेमिका के साथ हाथ में हाथ डालकर शहर की संकरी गलियों में घूमे थे? गोलगप्पे खाए थे? जहाँ आपने बड़े-बड़े सपने देखे थे? अपने देश को क्यों छोड़ा? अपने जन्म भूमि को क्यों छोड़ा? ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरीयसी’ का मन्त्र भूल गए आप? आपने अपनी प्रेमिका को क्यों छोड़ा? आपने दूसरी प्रेमिका क्यों बनाई?
अब आप बताइए क्यों छोड़ा आपने उस गाँव को जिसने आपको पाल-पोस कर बड़ा किया? जिसके मिटटी में आप खेले-खाए? उस शहर को आपने क्यों छोड़ा जिसने आपको पहचान दी? उस कमरे को क्यों छोड़ा जो आपको घर जैसा लगने लगा था? उस शहर को आपने क्यूँ छोड़ा जहाँ आप अपने प्रेमिका के साथ हाथ में हाथ डालकर शहर की संकरी गलियों में घूमे थे? गोलगप्पे खाए थे? जहाँ आपने बड़े-बड़े सपने देखे थे? अपने देश को क्यों छोड़ा? अपने जन्म भूमि को क्यों छोड़ा? ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरीयसी’ का मन्त्र भूल गए आप? आपने अपनी प्रेमिका को क्यों छोड़ा? आपने दूसरी प्रेमिका क्यों बनाई?
उत्तर बहुत सरल है. हम किसी एक चीज में फंसना नहीं चाहते हैं. हम
लगातार प्रगति करना चाहते हैं. क्यों? अच्छे जीवन के लिए. क्वालिटी लाइफ के लिए. वर्तमान
आधुनिक युग में क्वालिटी लाइफ मानव की सारी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है. जब आप
पूरी जिंदगी तमाम चीजों को छोड़ते रहे तो कोई दिक्कत नहीं और आज जब दलित आपकी बनाई
हुई व्यवस्था में घुटन महसूस कर रहा है तो आप चाहते हैं की वह उस व्यवस्था को न
छोड़े? हम कौन होते हैं किसी के जीवन की दिशा तय करने वाले? मेरा मन है माखनलाल में
पढूं या आईआईएमसी में, नीला पहनूं या पीला, चावल खाऊं या रोटी, कमरे में रहूँ या
फ्लैट में? आपको क्यों दिक्कत हो रही है? पुरानी व्यवस्था में मुझे जो दिक्कतें
थीं उनके समाधान को आप आगे क्यों नहीं आए?
ख़बरों की दुनिया में रहने वाले लोगों को कम से कम दंगे से पहले
सहारनपुर, वहां की स्थिति, राजपूतों द्वारा दलितों को एक बोर्ड न लगाने देना, उनको
अम्बेडकर जयंती न मनाने देना, उनको शोभा यात्रा न निकालने देना, भीम सेना आदि के
बारे में पता रहा ही होगा. आपने इनमें से कितने विषयों पर आपने लिखा? नहीं. तब आप
इसको मुद्दा ही नहीं मानते थे क्योंकि यह कोई नई बात नहीं हो रही थी. सदियों से
ऐसा चला आ रहा है. तब आप चुप रहे और आज जब दलित अपना निर्णय ले रहे हैं तो आप
उन्हें सुझाव देने निकल पड़े. आज आप स्थिति संभालने की बात करते हैं. आज आपको
हिंदुत्व, भाई चारा, इस्लामिक षडयन्त्र, विपक्षियों की चाल और न जाने क्या क्या
दिखाई से रहा है.
कल से ही बहुत सारे मित्र मुझे बता रहे हैं की वो दलितों के साथ कोई
भेदभाव नहीं करते हैं. उनको साथ बिठाकर खिलाते हैं. सही है मित्र आप उनके ऊपर
एहसान कर रहे हैं. मुझे बताइए जरा आपके अब तक के मित्र मंडली में कितने दलित हैं? क्या
आपने किसी दलित मित्र को अपने घर ले जाकर अपने थाली-गिलास में उनको खाना खिलाया है?
कृष्ण-कन्हैया टाइप के भाई लोग जरा मुझे बताएं कि उनके पूर्व-प्रेमिकाओं में कितनी
दलित लड़कियां थीं? या आप खुद दिमाग पर जोर डालिए और बताइए यदि आपके किसी मित्र किसी
दलित लड़की से शादी किया हो?
मेरा एक मित्र है. शायद दलित है या पिछड़े वर्ग से है. मुझे स्पष्ट रूप
से पता नहीं है. मैंने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की. हाँ इतना पता है कि उसकी
प्रेमिका ब्राह्मण है. दोनों में काफी प्रेम था. बात शादी तक पंहुची. घर वालों ने
लड़के की जाति सुनते ही मना कर दिया. बोले और किसी ऊंची जाति का होता तो चल भी
जाता. यह नहीं हो सकता. क्यों नहीं हो सकता भाई? दलितों के धर्म परिवर्तन पर उखड़े
लोग बताएं जरा आप किसी चमार लड़की से शादी करने को तैयार हैं? आप अभी जोश में भले
ही बोल दें पर गारंटी ले सकता हूँ बाद में आप पलट जाएंगे.
दलितों के साथ किए जा रहे भेद-भाव को बहुत सारे लोग यह कह कर तर्कसंगत
ठहरा रहे हैं कि दलित भी कुछ जातियों के साथ भेद-भाव करते हैं. यह तो ठीक वैसा ही
है जैसे कोई विद्यार्थी यह कह कर अपने फेल होने क बचाव करे कि उसके अन्य साथी भी
फेल हो गए हैं. यहाँ फिर से अप्रोच की बात आती है. आपका अप्रोच कहता है कि अपने
समुदाय के नियम-कानून को किसी तरीके से न्यायसंगत ठहराओ जबकि मेरा मानना है कि
अपने अन्दर सुधार कर उनके लिए दीपक बनो.
गड़े मुर्दे न उखाड़ो
अतीत
में हुई गलतियों की जब भी चर्चा होती है तो लोगों का मुंह यह कहकर बंद करने का
प्रयास किया जाता है कि गड़े मुर्दे न उखाड़ो. इसके पीछे भी एक बड़ा खेल है. अतीत की
जिन बातों से प्रभावशाली समुदाय की आभा बढती है या कम से कम उनको कोई दिक्कत नहीं होती
है, अतीत के ऐसे पन्नों को स्वर्णिम इतिहास, गौरवशाली, शौर्य से भरा, आदर्श और न
जाने किन-किन नामों से अलंकृत किया जाता है जबकि जिन चीजों से उनको दिक्कत है उसे ‘गड़े
मुर्दे’ बता नेपथ्य में धकेल दिया जाता है. मेरा मानना है ‘गड़े मुर्दों’ को
समय-समय पर उखाड़ना बहुत जरूरी है. इससे हमारी वर्तमान और आने वाली पीढियां सबक
लेती रहेंगी और आने वाले समय में ऐसी किसी घटना को रोका जा सकेगा. हासिमपुर घटना
के सम्बन्ध में उस समय गाज़ियाबाद के एसपी रहे विभूति नारायण सिंह भी ऐसा ही मानते
हैं. इसीलिए वे चाहते हैं कि हासिमपुर नरसंहार को समय-समय पर याद किया जाए.
समस्या कहाँ है?
हमारे
साथ समस्या यह है कि हम दलितों से अपने आप को ऊपर रखना चाहते हैं. इसमें कुछ अलग
नहीं है. यह मानव का स्वाभाव है. सभी को नैसर्गिक इच्छा होती है कि उसे किसी से श्रेष्ठ
समझा जाए. चूँकि दलितों के ऊपर हमारे पूर्वजों ने मानसिक कब्ज़ा जमा रखा है तो हम
उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं. अब आप कहेंगे आप ऐसी मानसिकता नहीं रखते. तो मायावती को
गलियां कौन देता है? आज भी जातिसूचक गलियां किन जातियों के नाम पर दी जाति हैं. चमार,
बेडिया, भंगी क्या है ये? मैं जब कक्षा 8 पंहुचा तब मुझे पता चला कि असल में ये
जातियां हैं. जब मैं स्नातक में पंहुचा तब मुझे पता चला कि ‘बेडिया’ दरअसल किसी
जनजाति का नाम है. पढ़े-लिखे और प्रगतिवादी मानसिकता के लोग भी दलितों के समस्याओं
को कोई बड़ी समस्या के रूप में नहीं देखते क्योंकि उनके लिए यह कोई नई बात नहीं है.
ये सब सदियों से चली आ रहा है. दूसरी तरफ जब कभी दलित धर्म छोड़ने की बात करते हैं
तो हमें अपने धर्म की चिंता सताने लगती है. हिंदुत्व तुरंत खतरे में आ जाता है.
उसके पीछे हमें षडयंत्र दिखने लगता है.
आपने क्या किया है दलितों के सम्मान के लिए
जो लोग मुझे दलितों के लिए ‘कुछ करने’ और समाज में जहर न बोने का ज्ञान दे रहे हैं उनसे एक सीधा सा सवाल है. आपने अपने स्तर पर दलितों के उत्थान के सम्मान के लिए क्या किया है. नीचे कमेंट बॉक्स में बताइए. मैं भी तो जानूं जरा. मैंने क्या किया है यह किसी दूसरे ब्लॉग पोस्ट में बताऊंगा.
मुझे गरियाते रहिए
संवाद
का सबसे स्याह पहलू है उसे व्यक्तिगत स्तर पर ले जाना. यहाँ तक बहुत सारे लोग
गलियां देने लगते हैं. कुछ गलियां बौद्धिक और साहित्यिक गलियां होती हैं तो कुछ
सीधे माँ-बहन को समर्पित होती हैं लेकिन मेरे ऊपर इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता.
मेरा मानना है अगर आप पत्रकारिता करने आए हैं (सब लोग पत्रकारिता नहीं करने आए
हैं. पत्रकारिता के नाम पर और भी बहुत सारे धंधे हैं) तो आपको गाली, थप्पड़ आदि के
लिए सदैव तैयार रहना चाहिए और इसमें मैं उस व्यक्ति की गलती नहीं मानता हूँ. उस
बेचारे को अब तक जो बताया गया है उसको उसने सच मान लिया है और उस ‘सच’ से उसकी
भावनाएं जुड़ गई हैं और भावनाओं का खेल तो आप जानते ही हैं.
...सो अपने आप
को रोक के रखिए
मेरे
बहुत सारे मित्रों को इस बात की चिंता है कि मैं अपने रास्ते से भटकता जा रहा हूँ,
मैं अपनी सभ्यता, संस्कृति को भूल रहा हूँ और सबसे बड़ी चिंता कि मैं वामपंथी (यद्दपि
मैंने अभी तक वामपंथ को पढ़ा, समझा नहीं है) होता जा रहा हूँ. दरअसल, जब मैंने
माखनलाल में प्रवेश लिया था तो मैं ही ऐसी बातें किया करता था. दो सालों में पता
नहीं कहाँ से यह सारा ‘जहर’ आकर मेरे मष्तिष्क में भर गया है. मेरी सलाह है कि आप
अपने आप को बचा के रखिए. कहीं आप भी विश्वविद्यालय से निकलते-निकलते यही सब न हो
जाएं. सो थोडा सावधान रहिए, अपनी संवेदनाओं को मार दीजिए, पढ़ना-लिखना बहुत न
कीजिये, सच को मष्तिष्क में मत प्रवेश होने दीजिए, जिस खूंटे को पकड़ कर आए थे उससे
बंधे रहिए. शायद आप बच जाएं.
(नोट: जिन लोगों ने परीक्षा के एक दिन पहले ब्लॉग लिखने में मेरा 2
घंटे समय बर्बाद करवाया है न... मां सरस्वती उनको माफ़ नहीं करेंगी.)
जय श्री
राम!

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