हिन्दी अखबार 'जनसत्ता ' की कहानी कमोबेश भारत देश जैसी है। जिसके अतीत में नीर-क्षीर की नदियां बहा करती थीं, वह आज अपने पहचान की लड़ाई लड़ रहा है। सोचिए, जनसत्ता का कोई जिम्मेदार व्यक्ति आपको मिल जाए तो आप उससे क्या जानना चाहेंगे ? कि जनसत्ता क्यों डूबता जा रहा है ? सोचिए और बताइए। संयोगवश हमारी (मैं और राजीव ) मुलाकात हुई जनसत्ता दिल्ली के मेट्रो एडिटर मनोज मिश्र से । हमने उनसे क्या पूछा, नीचे पढ़िए-
सर, मेट्रो शहरों की रिपोर्टिंग अन्य क्षेत्रों की रिपोर्टिंग से अलग कैसे है ?
मेट्रो शहरों में आवागमन सुविधाजनक है। रिपोर्टर को कम क्षेत्रफल कवर करना होता है। रिपोर्टर आधुनिक उपकरणों के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। एक जगह जाने से कई काम निबट जाते हैं। इस तरह मेट्रो शहरों की रिपोर्टिंग आसान है। छोटे शहरों में कम विकास होने की वजह से रिपोर्टिंग थोड़ी मुश्किल है।
सोशल नेटवर्किंग साइटों ने रिपोर्टिंग को आसान कर दिया है, परन्तु रिपोर्टर के पास प्रायोजित सामग्री आने लगी। ऐसे में रिपोर्टर इससे कैसे बचे ?
बिल्कुल सही कहा आपने। हमने जब पत्रकारिता शुरू की थी तो एक वर्जन के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। टेक्नालाॅजी के आने से चीजें आसान हो गयीं हैं। अब जैसे हर चीज का साइड इफैक्ट होता है, उसी तरह यह टेक्नालाॅजी का साइड इफैक्ट है। इससे बचने के दो ही तरीके हैं। अव्वल तो आप को घटनास्थल पर खुद जाना चाहिए। दूसरा, इस तरह के स्रोतों से मिली जानकारी को क्रास-चेक करके ही आगे बढ़ाएं।
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| जनसत्ता दिल्ली के मेट्रो एडिटर श्री मनोज मिश्र हमसे मुखातिब होते हुए. |
अक्सर किसी विशेष राजनीतिक दल को कवर करने वाले रिपोर्टर उस दल के प्रवक्ता के तरह बात करने लगते हैं। ऐसा क्यों ?
देखिए, मनुष्य विचारशील प्राणी है। कोई-न-कोई विचारधारा तो उसमें रहेगी ही। ऐसे में थोड़ा-बहुत झुकाव तो होता ही है, परन्तु खबरों में यह झुकाव नहीं दिखना चाहिए। न्यूज और व्यूज में अंतर बरकरार रखना चाहिए।
ऐसा देखा जा रहा कि अनेक समाचार-पत्र विश्लेषण के नाम पर न्यूज में व्यूज को मिला रहे हैं। यह कहां तक सही है ?
यह बिल्कुल गलत है। यह पत्रकारिता के साथ अन्याय है।
एजेंसी के रिपोर्ट्स पर बढ़ती निर्भरता के दौर में खबरों का अलग-अलग एंगल कैसे निकालें ?
खबरों के लिए एजेंसी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। रिपोर्टिंग का ‘ए' ही घटनास्थल है। अलग-अलग समाचार पत्रों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु समाचार तो एक ही होना न..। बाकी एंगल तो खबर लिखने वाले उप-सम्पादक के नजरिए पर निर्भर करता है।
आशंका जताई जा रही है कि एजेंसियों की बढ़ती संख्या के कारण मीड़िया संस्थानों से रिपोर्टर का पद समाप्त हो जाएगा। आपकी क्या राय है ?
(तपाक से)... अभी इतनी जल्दी खत्म नहीं होगा। लेकिन खतरा तो है।
सर, जनसत्ता के प्रसार संख्या में कमी का क्या कारण है ?
हमने प्रसार संख्या (सर्कुलेशन) पर कभी ध्यान नहीं दिया। हम उन्हीं लोगों को पढ़ाना चाहते हैं जो खबरों से इतर कुछ पढ़ना चाहते हैं। प्रभाष जोशी जी जब रिटायर हो रहे थे तब हमने उनका ध्यान इस ओर आकर्षित कराया था परंतु उन्होंने इस तरफ ध्यान नहीं दिया जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है।
एक ही समूह का होने के बावजूद इंडियन एक्सप्रेस में छपने वाली बड़ी खबरें जनसत्ता में दूसरे-तीसरे दिन छपती हैं। ऐसा क्यों ?देखिए, जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के प्रबंधन में गैप आ गया है। पहले तो कुछ खबरें जनसत्ता में छपती थीं लेकिन वे इंडियन एक्सप्रेस में नहीं छपती थीं। मैं इस बारे में अपने संपादक जी से बात करुंगा।
मुकेश भारद्वाज जी के संपादकीय सत्ता में आने के साथ ही जनसत्ता कुछ मामलों में एनबीटी की राह चल पड़ा है। क्या जनसत्ता अपनी पहचान बदलना चाहता है ?
हां, ये सही है कि कुछ मामलों में जनसत्ता एनबीटी की राह पर है। कभी समाचार-पत्र जनसत्ता की राह चला करते थे, पर आज स्थिति उलट है। पहचान बदलने के मामले पर....... मुझे लगता है कि अभी स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है।
हमारे पीढ़ी का पत्रकार या तो रिपोर्टर बनना चाहता है या एंकर। ऐसे में क्या डेस्क पर कुशल पत्रकारों का अकाल पड़ सकता है ?
डेस्क किसी भी संस्थान की रीढ़ की हड्डी है। संस्थान की सफलता बहुत हद तक उसके डेस्क पर निर्भर करती है। मैं मूलतः रिपोर्टर रहा हूं पर मैं मानता हूं कि किसी पत्रकार को प्रसिद्धि डेस्क से ही मिलती है। इंडियन एक्सप्रेस सहित कोई भी अखबार जो अच्छा कर रहा है, उनका डेस्क बहुत मजबूत है। एक एंकर या रिपोर्टर के पीछे बीस-बीस डेस्क के पत्रकार लगे होते हैं।
प्रभाष जोशी जी के समय की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में क्या अंतर है ?
जमीन-आसमान का अंतर है। तब किसी को खुश करने के लिए खबरें नहीं लिखीं जाती थी। आज तो बाकायदा ट्रेंड सेट कर दिया गया है। हमारे अखबार में तो कम, अन्य अखबारों में तो डिक्टेट तक किया जाता है।
नवोदित पत्रकारों के लिए भविष्य की लिहाज से पत्रकारिता के किस बीट में अधिक संभावनाएं हैं ?
देखिए, दो चीजें हैं- एक तो सीखने के लिहाज से और दूसरा करियर की लिहाज से। सीखने के लिहाज से अपराध, पुलिस, कानून-व्यवस्था और राजनीति महत्वपूर्ण बीट हैं। मनोरंजन, फैशन, जीवन-शैली जैसे क्षेत्र उभरते हुए हैं इसीलिए इनमें करियर की संभावनाएं अधिक हैं।

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