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Friday, September 2, 2016

....क्योंकि रात हमारी है, काके !

रात में जगना एक अलग अहसास देता है। रात में सोने वालों को शायद पता भी न हो कि वे सो कर कितना कुछ खो रहे हैं ? रात के आगोश में आप वो तमाम काम कर सकते हैं जो जालिम दिन का उजाला नहीं करने देता। रात में आप सोच सकते हैं। अपने घर के आराम बिस्तर पर सोती हुई उस लड़की के बारे में जिसके लिए आपने गलियों के चक्कर काटे, मोहल्ले के 'अच्छे लड़कों' वाली छोटी सी लिस्ट में से अपना नाम कटवाया। जिसके लिए कोचिंग की अपनी क्लास को छोड़कर रास्ते में अपनी साइकिल लगाए खडे रहे ताकि उस चांद का एक झलक पा सकें। हां, बिल्कुल ! रात में आप उस चांद से चेहरे को जी भर कर याद कर सकते हैं जिसके लिए आप रात-रात तक जागे हैं। इस उम्मीद में कि शायद उसका फोन आ जाए। आप उन यादों को ताजा कर सकते हैं जब पहली बार आप मिले थे उससे। गली के उस मोड़ पर, जिसके किनारे सरकारी गोदाम की जर्जर होती दीवार पर ‘देखो गधा मूत रहा है‘ लिखा होने के बावजूद पेट भर कर मूता करते थे । जैसे वे खुद को गधा मानने को तैयार न थे। या फिर लेखक की इस ज्यादती पर ‘पुरस्कार वापसी' सरीखा आन्दोलन चला रहे थे।
साभार :www.pinterest.com
याद कीजिए रोज नाक बिचका कर पार करने वाली उस जगह पर आप कैसे खडे थे। घण्टों.......। क्योंकि उस समय आपके साथ कोई था, जिसकी कमी आपको आज तक खलती है। इसी रात में आप उस मनहूस समय को भी याद कर सकते हैं जब आप ने उसकी मजबूरी समझे बिना उसको बेवफा से शुरू करके र’डी तक फकत गालियां दी थी आपने। उस गलती के लिए रात में आप अपने आप को गरिया सकते हैं, झपड़िया सकते हैं। आप कुछ भी कर सकते हैं। रात में । आप सुट्टा मारिए, या मेरी तरह नए हैं तो जेब से निकालिए कमला पसंद की वो पुड़िया।  जो आप एक बार खरीद कर पांच बार खाते हैं। निकालिए और फांका मार लीजिए, बिना इसके परवाह किए कि कोई आपको देख लेगा। स्पेशियली वो जो आपको आज-कल कनखियों से देखा करती है। रात अपना यार है। इसके आगोश में खता होने का कोई चांस नहीं है बाॅस।  आप खुलकर खेलिए। अपने आप से। दारू से। सिगरेट से। या फिर किसी हसीन लड़की के तस्वीर से। देखिए आप। वो फिल्में जिसे दिन में देखने पर लोग मुंह बिचकाते हैं। या फिर कोई और दिव्य क्रिया कीजिए। इस निपट अकेले में। अरे नहीं! यह अकेलापन नहीं। यही तो वह महफिल है जहां हमारी आपकी सुनी जाती है। रात की महफिल आपकी है। दिन की ? अमां मियां ! वो महफिल किसी की हो पर आपकी तो नहीं है। हर कोई अपना सुनाए जा रहा है। आपको सुनने में कौन दिलचस्पी रखता है। मित्र ! यह भी बढ़िया मजाक है। मित्रता के नाम पर दिखावा है। हर कोई अपनी सुनाना चाहता है। महफिल है आपके यादों की। यही वो समय है जब आप अपने आप से, अपने वजूद से मिल सकते हैं। नहीं, घबराइए मत। इस समय आपको टोकने वाला कोई नहीं होगा। 
आप पढ़ सकते हैं तुलसीदास से लेकर खुशवंत सिंह और चेतन भगत तक। इंडिया टुडे से लेकर मनोहर कहानियां तक। आप निजात पाए रहेंगे, उस बिन मांगे सलाहों से जो पढ़ने में भी अच्छा बुरा का भेद करते हैं। आप सावरकर को भी पढ़िए और लावोस्की को भी। इस समय ऐसा कोई नहीं जो आपके हाथ में किसी किताब विशेष को देखकर राष्ट्रवादी या वामपंथी नामक बाजार में आई नई गालियों से नवाज दे। यही वो समय है जब आप मुक्त होकर सोच सकते हैं। आपके विचारों में डीटीसी बसों के हाॅर्न का शोर नहीं होगा। सड़क पर किसी बाइक के आगे आ जाने पर न ही कोई लट्ठमार कर्कश जट्ट आवाज  सुनाई देगी- ‘अबे भों*ड़ी ! अंधा है के।' 
या फिर, लिखिए....। महबूब की यादें रूमानी। पहले सेक्स की कहानी। वो लड़की अंजानी। कोई फितरत पुरानी।  या लिखिए उस पल की डायरी, जब आपको लव लेटर का जवाब थप्पड़ से मिला था। या फिर बचपन वह डर लिखिए जब चाचा आपको अकेले कमरे में बन्द कर घूमने चले गए थे और आपको लग रहा था कि बस अभी सांप लकड़ी के पल्ले और दरवाजे के बीच उस पतली सी दरार से आएगा और आपको धर दबोचेगा। अरे! उस हालात के मारे गरीब चोर के आंखों की कहानी लिखो न। जो 50 किलो गेहूं चुराने पर चैराहे पर सरेआम पीटा गया था। आप चाहते हुए भी कुछ न कर पाए थे। 

आप नाचो, गाओ, पढ़ो, लिखो, सोचो.....। आप हर वो काम करो जो दुनिया आपको दिन के रोशनी में नहीं करने देती। क्योंकि.... काके! रात हमारी है। सिर्फ हमारी। 

और हाँ, आपको कैसा लगा ये पोस्ट ? नीचे बॉक्स में बता तो दीजिये। 

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