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Wednesday, August 31, 2016

हमें तुम पर 'शर्म' है, ऐ रियो के बैरंगों !

पूरे देश के साथ आप भी यह जानना चाहते होंगे कि रियो में हमारी इतनी बुरी दुर्गति क्यों हुई ? आप जानना चाहते होगें उन लोगों को, जो इस ट्रेजेडी के खलनायक हैं। शायद अपने फ्रेंड सर्किल में रियो पर डिस्कशन के दौरान उन इडियट्स को जी भर गालियां देने का प्लान भी बना रखा हो। खेलों में बुरे प्रदर्शन पर जब भी देश में बात होती है, तब सबसे आसान टारगेट होते हैं- खेल संगठनों को कब्जियाये राजनेता, खेल मंत्रालय के अफसर, उनकी लालफीताशाही की कहानियां व असहयोग आंदोलन से प्रभावित उनकी हरकतें। नीचे लिखे बिन्दु यह साबित करने के लिए काफी हैं कि इस बार चूक प्रशासनिक स्तर पर नहीं हुई है-


  • रियो ओलम्पिक की तैयारियों में कोई खोट न रह जाए और खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करें, इसके लिए खेल मंत्रालय ने टॉप्स यानी टारगेट ओलम्पिक पोडियम स्कीम नाम की एक विशेष समिति गठित की थी। प्रशासनिक गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अप्रैल से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक इस समिति की 54 बैठकें हुई।
  • इस समिति ने प्रत्येक खिलाड़ी से कहा था कि वे पूरे दुनिया में कहीं भी, किसी भी कोच से ट्रेनिंग ले सकते हैं। उसका पूरा खर्च मंत्रालय वहन करेगा। इसके लिए बाकायदा टॉप्स ने खिलाड़ियों से प्रपोजल मंगवाए थे।
  • ओलम्पिक के तैयारियों पर टॉप्स  ने पूरे 20 करोड़ रुपए खर्च किए।

फिर कहां रह गई खोट ?

खेल चाहे कोई भी हो उसमें हार-जीत का होना स्वभाविक पक्ष है। मगर इसके बावजूद कई खिलाड़ी ऐसे होते है जो भले ही जीत हासिल कर पाने में नाकाम रहें मगर अपने प्रदर्शन से सबको खुश होने का अवसर प्रदान करते है। इस बार हमारे पास ऐसे मौके बहुत कम आए। हमारी नाराजगी की स्वभाविक वजह यही है। ऐसा क्यों हुआ, इससे संबंधित कुछ तथ्य निम्न है, इससे आपको सारा मामला खुद ही समझ में आ जाएगा-

84 प्रतिशत खिलाड़ी अपना पिछला सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने में भी नाकाम रहे-

  • ओलम्पिक में खेलना किसी भी खिलाड़ी के लिए एक सपने जैसा होता है, जहां वह अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ देने के लिए दिन-रात एक कर देता है। देश के लिए एक अदद तमगा जीतने के लिए खिलाड़ी अपना सर्वस्व दांव पर लगा देता है। क्या हमारे खिलाड़ियों ने ऐसा किया था ?
  • रियो ओलम्पिक टीम में कुल 117 खिलाडी थे। हाॅकी में महिला व पुरुष टीम में शामिल 32 खिलाड़ियों को छोड़ दें, तो बचे कुल 85 खिलाड़ी । इन 85 खिलाड़ियों में से मात्र 13  खिलाड़ी ही अपने वर्ल्ड रैकिंग के अनुरूप या उससे बेहतर प्रदर्शन कर पाए।
  • कुल 34 ट्रैक या फील्ड एथलीटों में से मात्र 4 ने ही अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। 
  • लांग जम्पर अंकित शर्मा महीने भर पहले बनाये अपने 8.19 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्ड से आधा मीटर कम कूद पाए।
  • मेडल के प्रबल दावेदार टेबल टेनिस खिलाड़ी सौम्यजीत घोष वर्ल्ड रैकिंग में अपने से 126 पायदान नीचे के खिलाड़ी से हार गए।
  • वर्ल्ड रैकिंग में 72वें स्थान एक मात्र भारतीय जुडो खिलाड़ी अवतार सिंह 91वें पायदान के खिलाड़ी से हार गए।

....तो हमारे खाते में होता एक और सिल्वर मेडल
48 किलोग्राम भारवर्ग में वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने रियो ओलम्पिक से दो माह पहले पटियाला में सेलेक्शन ट्रायल्स के दौरान 192 किलोग्राम भार उठाकर नेशनल रिकॉर्ड कायम किया था। ओलम्पिक में वे मात्र 82 किग्रा उठा पायीं। 192 किग्रा भार उठाकर इंडोनेशियाई खिलाड़ी वहयूनी अगस्टिएनी ने रजत पदक अपने नाम कर लिया


पैसा ठूंसो, रियो जाओ, सेल्फी लो.....पर अपने परिवार के साथ 

रियो गए अनाड़ी जब देश की भद् पिटवा रहे थे, तब विवादित लेखिका शोभा डे ने ट्विट किया था-"रियो जाओ, सेल्फी लो और घर वापस लौट आओ।" 
तब उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई थी। जरा देखिए, कैसी-कैसी उच्च कोटि की धार्मिक गलियां मिलीं थीं उनको-





मुझे नहीं पता आप उनके बयान से कितना इत्तफाक रखते हैं। नीचे लिखे तथ्यों को गौर से पढ़िए, आपको उनकी बातें बहुत हद तक सही लगने लगेंगी। हां, यह सही है कि उनकी भाषा से लोगों को एतराज हो सकता है ।

  • डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया पिछले 2 साल से चोटिल चल रहीं थीं। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर राजस्थान विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। 22 मई को हुई टॉप्स कमेटी की मीटिंग बताती है कि अप्रैल में वो फिर से अपने फॉर्म में वापस लौट आई। टॉप्स स्कीम के तहत अमेरिका में अपने पति व कोच विजेन्दर सिंह के साथ ट्रेनिंग के लिए उन्होंने टॉप्स से 40 लाख रुपए मांगे। उन्हें रुपए दिए गए पर वे ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाईं
  • शूटिंग में हीना सिधू अपने पति, कोच व शूटिंग दल के प्रबंधक रौनक पंडित के साथ रियो गईं। उन्होंने तैयारियों के लिए सरकार से 1 करोड़ रुपए लिए। यह अलग बात है कि वे इतने मंहगे ट्रेनिंग के बाद भी वे फाइनल तक नहीं पहुंच पाईं। वे 10 मी. व 25 मी. श्रेणी में क्रमशः 14वें व 18वें स्थान पर रहीं।
  • ओलम्पिक के लगभग 50 दिन पहले सानिया मिर्जा की डबल्स पार्टनर प्रार्थना थाम्बरे ने साई से 60 लाख रुपए और मांगे, जबकि उनको 30 लाख रुपया मिल चुका था।
  • सानिया मिर्जा अपने मां ( टेनिस टीम की मैनजर) को रियो ले गईं।
  • डिस्कस थ्रोअर विकास गौड़ कोच के बदले अपने पिता शिव को अपने साथ रियो ले गए।
  • डिस्कस थ्रोअर सीमा अतिल अपने पति अंकुश को कोच के रूप में रियो ले गईं।
  • गोल्फर अदिति अशोक अपने पिता को कैडी के रूप में रियो ले गए।
  • रेस वॉकर सपना पूनिया और शॉट पुटर मनप्रीत कौर अपने-अपने पति को ट्रेनिंग के लिए पोलैंड अपने साथ ले गईं। सरकार ने दोनों का पूरा खर्च उठाया।

......और बोलते रहे झूठ

कभी साई से अधिक पैसे ठूंसने के लिए, तो कभी अपनी असफलता को छिपाने के लिए खिलाड़ी लगातार झूठ बोलते रहे।

  1. रियो का महाकुंभ शुरू होने के लगभग 15 दिन पहले तेज धावक दुती चंद ने खुले-आम कहा कि उनके पास जूते खरीदने तक के लिए पैसे नहीं हैं, जबकि टॉप्स के तहत उन्हें पहले ही 30 लाख रुपए मिल चुके थे। उसके बाद भी साई ने जूतों के लिए अलग से 2 लाख रुपए दिए।
  2. फिनिशिंग लाइन पर दौड़ते-दौड़ते गिर जाने के बाद सुखिर्यों में आईं मैराथन धावक ओ पी जैसा ने आरोप लगाया कि भारतीय दल ने उनके लिए पानी तक की व्यवस्था नहीं की थी, इसलिए ऐसा हुआ। रियो आयोजन समिति ने बाकायदा बयान जारी कर बताया कि पूरे 42 किमी के रास्ते में शुरूआत और अंत को छोड़कर 14 पानी के स्टॉल लगाए गए थे। उनकी साथी धावक कविता रावत और कोच ने भी उनके आरोप को झूठा बताया है।

         ये हैं गुदड़ी की ललियां - 

      अब उनकी कहानी जिन्होने देश का नाक कटने से बचाया-

पीवी संधु- टॉप्स से मात्र 44 लाख मांगे। देश में ही ट्रेनिंग हासिल की। सिल्वर मेडल जीत देश का मान रखा।

संधू का खेल देखने लायक था 

साक्षी मलिक- इस हरियाणवी छोरी को तैयारियों के लिए मात्र 12 लाख रुपए पर्याप्त लगे। देश में ही प्रशिक्षण प्राप्त किया।

और लास्ट बट नॉट द लीस्ट, दीपा करमाकर- देश की इस बेटी ने मेडल तो नहीं जिता मगर दिल सबका जीता है। 
दीपा को रियो की तैयारियों के लिए मात्र दो लाख रुपयों की जरूरत पड़ी।
सवाल ये नहीं है कि किसने कितने पैसे मांगे ? या अपने साथ किसको ले गए ? सवाल यह है कि इन सब के बाद उन्होंने रिजल्ट क्या दिया ? ध्यान रहे रिजल्ट केवल मेडल नहीं होते। रिजल्ट दिया है करमाकर ने, संधु ने। उन्होंने रियो में जो किया वो हमारे लिए कई गोल्ड से बढ़कर है। 
अब सवाल यह उठता है कि- 

  • क्या देश में योग्य खिलाडियों की कमी है ? या उन्ही खिलाडियों को आगे बढाया जाता है जो खेल अधिकारी व नेताओं के करीब हैं ? 
  • क्या नरसिंह यादव का रिओ में न खेल पाने की वजह आपसी कलह और राजनीति थी ?
  • महिला खिलाडियों के कोच बने उनके पति क्या कोच बनने का काबीलियत रखते हैं ?
  • क्या पूर्व खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल के असम चुनावों में व्यस्त रहने के कारण रिओ तैयारियों पर गलत असर पड़ा ?
  • जहाँ अधिकतर खिलाडियों को 40 से 50 लाख के आस-पास रूपये मिले वहीँ, हीना सिद्धू को 1 करोड़ कैसे मिल गए ?



इस पोस्ट में आपने ध्यान दिया होगा, बहुत सारे खिलाड़ियों के पति, मां या पिता ही कोच, प्रबंधक और न जाने क्या-क्या है। अगला पोस्ट खेल में पनप रहे इस परिवारवाद के पड़-ताल पर ही केंद्रित होगा।


Sunday, August 28, 2016

कम्यूनिकेशन गैप है जनसत्ता व इंडियन एक्सप्रेस के मैनेजमेण्ट में: मनोज मिश्रा



हिन्दी अखबार  'जनसत्ता ' की कहानी कमोबेश भारत देश जैसी है। जिसके अतीत में नीर-क्षीर की नदियां बहा करती थीं, वह आज अपने पहचान की लड़ाई लड़ रहा है। सोचिए, जनसत्ता का कोई जिम्मेदार व्यक्ति आपको मिल जाए तो आप उससे क्या जानना चाहेंगे ? कि जनसत्ता क्यों डूबता जा रहा है ? सोचिए और बताइए। संयोगवश  हमारी (मैं और राजीव ) मुलाकात  हुई  जनसत्ता दिल्ली के मेट्रो एडिटर मनोज मिश्र  से । हमने उनसे क्या पूछा, नीचे पढ़िए-   
सर, मेट्रो शहरों की रिपोर्टिंग अन्य क्षेत्रों की रिपोर्टिंग से अलग कैसे है ?

मेट्रो शहरों में आवागमन सुविधाजनक है। रिपोर्टर को कम क्षेत्रफल कवर करना होता है। रिपोर्टर आधुनिक उपकरणों के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। एक जगह जाने से कई काम निबट जाते हैं। इस तरह मेट्रो शहरों की रिपोर्टिंग आसान है। छोटे शहरों में कम विकास होने की वजह से रिपोर्टिंग थोड़ी मुश्किल है।

सोशल नेटवर्किंग साइटों ने रिपोर्टिंग को आसान कर दिया है, परन्तु  रिपोर्टर के पास प्रायोजित सामग्री आने लगी। ऐसे में रिपोर्टर इससे कैसे बचे ?

बिल्कुल सही कहा आपने। हमने जब पत्रकारिता शुरू की थी तो एक वर्जन के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। टेक्नालाॅजी के आने से चीजें आसान हो गयीं हैं। अब जैसे हर चीज का साइड इफैक्ट होता है, उसी तरह यह टेक्नालाॅजी का साइड इफैक्ट है। इससे बचने के दो ही तरीके हैं। अव्वल तो आप को घटनास्थल पर खुद जाना चाहिए। दूसरा, इस तरह के स्रोतों से मिली जानकारी को क्रास-चेक करके ही आगे बढ़ाएं।
जनसत्ता दिल्ली के मेट्रो एडिटर श्री मनोज मिश्र  हमसे मुखातिब होते हुए.


अक्सर किसी विशेष राजनीतिक दल को कवर करने वाले रिपोर्टर उस दल के प्रवक्ता के तरह बात करने लगते हैं। ऐसा क्यों ?

देखिए, मनुष्य विचारशील प्राणी है। कोई-न-कोई विचारधारा तो उसमें रहेगी ही। ऐसे में थोड़ा-बहुत झुकाव तो होता ही है, परन्तु खबरों में यह झुकाव नहीं दिखना चाहिए। न्यूज और व्यूज में अंतर बरकरार रखना चाहिए।

ऐसा देखा जा रहा कि अनेक समाचार-पत्र विश्लेषण के नाम पर न्यूज में व्यूज को मिला रहे हैं। यह कहां तक सही है  ?

यह बिल्कुल गलत है। यह पत्रकारिता के साथ अन्याय है।

एजेंसी के रिपोर्ट्स पर बढ़ती निर्भरता के दौर में खबरों का अलग-अलग एंगल कैसे निकालें ?

खबरों के लिए एजेंसी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। रिपोर्टिंग का ‘ए' ही घटनास्थल है। अलग-अलग समाचार पत्रों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु समाचार तो एक ही होना न..। बाकी एंगल तो खबर लिखने वाले उप-सम्पादक के नजरिए पर निर्भर करता है।

आशंका जताई जा रही है कि एजेंसियों की बढ़ती संख्या के कारण मीड़िया संस्थानों से रिपोर्टर का पद समाप्त हो जाएगा। आपकी क्या राय है ? 

(तपाक से)... अभी इतनी जल्दी खत्म नहीं होगा। लेकिन खतरा तो है।

सर, जनसत्ता के प्रसार संख्या में कमी का क्या कारण है ?


हमने प्रसार संख्या (सर्कुलेशन) पर कभी ध्यान नहीं दिया। हम उन्हीं लोगों को पढ़ाना चाहते हैं जो खबरों से इतर कुछ पढ़ना चाहते हैं। प्रभाष जोशी जी जब रिटायर हो रहे थे तब हमने उनका ध्यान इस ओर आकर्षित कराया था परंतु उन्होंने इस तरफ ध्यान नहीं दिया जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है।

एक ही समूह का होने के बावजूद इंडियन एक्सप्रेस में छपने वाली बड़ी खबरें जनसत्ता में दूसरे-तीसरे दिन छपती हैं। ऐसा क्यों ?

देखिए, जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के प्रबंधन में गैप आ गया है। पहले तो कुछ खबरें जनसत्ता में छपती थीं लेकिन वे इंडियन एक्सप्रेस में नहीं छपती थीं। मैं इस बारे में अपने संपादक जी से बात करुंगा।

मुकेश भारद्वाज जी के संपादकीय सत्ता में आने के साथ ही जनसत्ता कुछ मामलों में एनबीटी की राह चल पड़ा है। क्या जनसत्ता अपनी पहचान बदलना चाहता है ?

हां, ये सही है कि कुछ मामलों में जनसत्ता एनबीटी की राह पर है। कभी समाचार-पत्र जनसत्ता की राह चला करते थे, पर आज स्थिति उलट  है। पहचान बदलने के मामले पर....... मुझे लगता है कि अभी स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है।

हमारे पीढ़ी का पत्रकार या तो रिपोर्टर बनना चाहता है या एंकर। ऐसे में क्या डेस्क पर कुशल पत्रकारों का अकाल पड़ सकता है ?

डेस्क किसी भी संस्थान की रीढ़ की हड्डी है। संस्थान की सफलता बहुत हद तक उसके डेस्क पर निर्भर करती है। मैं मूलतः रिपोर्टर रहा हूं पर मैं मानता हूं कि किसी पत्रकार को प्रसिद्धि डेस्क से ही मिलती है। इंडियन एक्सप्रेस सहित कोई भी अखबार जो अच्छा कर रहा है, उनका डेस्क बहुत मजबूत है। एक एंकर या रिपोर्टर के पीछे बीस-बीस डेस्क के पत्रकार लगे होते हैं।

प्रभाष जोशी जी के समय की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में क्या अंतर है ?

जमीन-आसमान का अंतर  है। तब किसी को खुश करने के लिए खबरें नहीं लिखीं जाती थी। आज तो बाकायदा ट्रेंड सेट कर दिया गया है। हमारे अखबार में तो कम, अन्य अखबारों में तो डिक्टेट तक किया जाता है।

नवोदित पत्रकारों के लिए भविष्य की लिहाज से पत्रकारिता के किस बीट में अधिक संभावनाएं हैं ?

देखिए, दो चीजें हैं- एक तो सीखने के लिहाज से और दूसरा करियर की लिहाज से। सीखने के लिहाज से अपराध, पुलिस, कानून-व्यवस्था और राजनीति महत्वपूर्ण बीट हैं। मनोरंजन, फैशन, जीवन-शैली जैसे क्षेत्र उभरते हुए हैं इसीलिए इनमें करियर की संभावनाएं अधिक हैं।

Sunday, August 21, 2016

अफगानी सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्भीक कदम उठाये भारत : करज़ई

बतौर अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई को अपना दूसरा व अंतिम कार्यकाल पूरा किए हुए लगभग दो साल हो रहे हैं। लेकिन अफगानी राजनीति में वे अब भी एक प्रमुख शक्ति बने हुए हैं। उन्होंने अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस से पीएम के बलूचिस्तान पर बयानआईएस के खतरे से लेकर कश्मीर की वर्तमान स्थिति पर खुलकर बात की. मैंने इस साक्षात्कार को अनुदित करने की कोशिश की है. ताकि अच्छी सामग्री हिंदी के पाठक तक पहुँच सके. पेश है बातचीत का प्रमुख अंश-

पीएम नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में बलूचिस्तान के बारे बयान दिया है, वह भी लाल किले की प्रचीर से। आपके हिसाब से उनके इस बयान का क्या असर होगा ?

इसका मतलब है कि भारत इस क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और मानवाधिकारों के बारे में चिंतित है। यह बयान भारत के इस चाह को दर्शाता है कि बलूचिस्तान के लोग भी बेहतर करें। वे बंदूकों के फायरिंग, कट्टरवादी हमले व बमबारी से दूर कष्टरहित सामान्य जीवन जी सकें। बलूचिस्तान हमारे लिए कोई अलग मसला नहीं है। अफगानिस्तान में कट्टवाद वहीं से आता है। बलूचिस्तान हमसे भौगोलिक व मानसिक दोनों रूप से बहुत करीब है। हमें बलूची लोगों की शांति व विकास तक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। यह मानवाधिकर का मामला है जो हर बलूची का अधिकार है।

शायद पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इस मसले पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी है। क्या इस वजह से आने वाले दिनों में भारत-पाक सम्बन्धों में बदलाव देखने को मिलेगा?
यह भारतीय उपमहाद्वीप में महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा। यह कदम इस क्षेत्र में शांति व स्थिरता कायम करने व राज्य द्वारा नीतिगत तरीके से कट्टरवाद और अतिवाद को उपयोग करने की प्रथा को खत्म करने की दिशा में कारगर साबित होगा। हमें इस दिशा में मिलकर काम करना होगा।

शांति व विकास तक पहुँच हर बलूची का अधिकार है.

आईएस के उदय और इसके परिणाम को आप किस रूप में देखते हैं ? विशेषकर भारत के संदर्भ में भारतीय अधिकारियों से मिलने पर क्या आप इस बारे में बात करते हैं ?

बिल्कुल ! यह मुद्दा भारत और अफगानिस्तान के बीच वार्ता का थीम होता है। रुढ़िवाद और अतिवाद की वजह से जन-धन की भारी हानि हो रही है। भारत को आईएस को गम्भीरता से लेना चाहिए। हमारे क्षेत्र के लिए यह पूर्णतः विदेशी सोच है, अतः हमें मिलकर इससे निबटना चाहिए।

अगर हम भारतीय संदर्भ में देखें तो आईएस बाकीे आतंकी समूहों से अधिक घातक और खूंखार है। ऐसा क्यों?

आईएस आईएस अफगानी मूल का नहीं है और उसका तालिबान से कोई सम्बन्ध नहीं है। अत का उद्देश्य कहीं अधिक घातक है। तालिबान स्थानीय थे। मूलतः अफगानी।  आपको उनसे अत्यधिक सतर्क रहना होगा। आपको उनकी भारत में पहुंच और भारतीय हितों पर कुठाराघात को रोकना ही होगा। जैसा कि अभी वे अफगानिस्तान में कर रहे हैं।

बतौर राष्ट्रपति आपने सैनिक साजो-सामान की वो सूची भारत को सौंपी, जो आप भारत से चाहते हैं। कुछ हेलीकाप्टरों को छोड़कर सूची में शामिल अन्य साजो-सामान भारत अभी तक नहीं दे पाया है। क्या आपको लगता है भारत इस बारे में और अधिक कर सकता है ?

भारत को अफगानिस्तान के सैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खुलकर सामने आना चाहिए। मैं चाहता हूं कि अफगान सैन्य क्षमता को बढ़ाने के लिए भारत को कड़े कदम उठाए। इसे चमत्कारिक ही कहा जाएगा कि भारत, पाकिस्तान और अमेरिका दोनों के दृष्टिकोण से सहमत दिखता था। मैं चाहता हूं कि भारत अपने हितों और भारत-अफगान सम्बन्धों को ध्यान में रखकर उचित कदम उठाए। वर्तमान सरकार ने कुछ हेलीकाप्टर दिए हैं परन्तु हमें उनसे अधिक अपेक्षा है।

भारत अफगान नेशनल आर्मी को किस तरह के साजो-सामान उपलब्ध करा सकता है ? जिससे उसकी क्षमता को बढ़ाया जा सके?

भारत हमारे सेनाओं की स्थिति को बखूबी जानता है। सैनिक साजो-सामान से लेकर सैन्य प्रशिक्षण तक बहुत सारी चीजें हैं जिनको भारत उपलब्ध करवा सकता है। और ये चीजें भारत के पास हैं भी।

क्या आपको लगता है कि भारत पीएम मोदी के बलूचिस्तान पर बयान के बाद अफगानिस्तान को सैन्य सहायता के दिशा में अपेक्षाकृत अधिक काम कर रहा है?

मैं इस बात को लेकर अत्यधिक आशान्वित हूं कि भारत, अफगानिस्तान और अफगानी सेना के मजबूत करने के लिए और अधिक सहायता उपलब्ध कराएगा। हमें अपने पड़ोसी पाकिस्तान के साथ भी शांतिपूर्ण रिश्ते कायम करने होंगे।

इन दिनों कश्मीर उथल-पुथल से गुजर रहा है। इस पूरे मामले को आप कैसे देखते हैं ?
मैं आशा करता हूं कि वहां शांति स्थापित होगी। वहां खून-खराबा, अशांति व बाहरी हस्तक्षेप बन्द होगा।

इस समय आप पीएम नरेन्द्र मोदी को क्या संदेश देना चाहेंगे ?

अफगानिस्तान के प्रति भारतीय सहयोग के लिए हम उनके आभारी हैं। अफगानिस्तान पर उनका मजबूत स्टैंड, क्षेत्रीय मसलों पर उनके खुले और स्पष्ट विचारों का हम स्वागत करते हैं।
(इस पोस्ट का मकसद उन पाठकों तक क्वालिटी प्रोडक्ट पंहुचाना है जो अंग्रेजी में खुद असहज महसूस करते हैं.पूरा साक्षात्कार पढने के लिए क्लिक करें.)

Wednesday, May 4, 2016

वाह दीदी ! तू और तेरे गुंडे..

( पश्चिम बंगाल के चुनाव में हिंसा ओर मारकाट की घटनाएँ आम हैं पर जब पांचवीं  में  पढने  वाले  एक बच्चे को सिर्फ इसलिए पीट-पीट कर बेहोश कर दिया जाता है कि उसने खेलने के लिए किसी दल का बैनर फाड़ लिया था तो मानवता शर्मसार हो उठती है. जी हाँ ! पूर्वी कैनिंग विधानसभा सीट के हरिहरपुर गाँव में तृणमूल कोंग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ऐसा करामात किया है. पढ़ें उस 9 साल के नन्हे बच्चे की डायरी ....)

लगातार मिलते जनसमर्थन से दीदी के गुंडे के हौसले  सातवें आसमान पर हैं 


उस दिन अच्छी हवा चल रही थी. मैं पतंग उड़ाना चाहता था. अप्रैल महीने का अंत चल रहा था. मैं जानता था कि अब्बा के 3000 महीने के अल्प आय में से इस समय अम्मी पतंग के लिए रूपये देने से रहीं. तभी मेरी नज़र सामने के खम्भे पर हवा के थपेड़ों से फडफडाते हुए बैनर पर पड़ी. बस मिल गया. वह बैनर नहीं पतंग है. जैसे वो खम्भे पर न लटका हो, दूर आसमान में तारों से कबड्डी खेल रहा हो और मैं ! मैं अपने हाथों में उसकी डोर लिए हुए पड़ोस में खेलने गये एक छोटे बच्चे की माँ की तरह कह रहा हूँ कि तू बहुत थक गया है, आजा आराम कर ले फिर खेलने जाना. इन्ही हसीन ख्वाबों में डूबा मैं बरबस खम्भे की ओर चल पड़ा. खयाली पतंग की डोर अभी तक मेरे हाथों में थी. मैंने जोर लगा कर खींचा. बैनर धडाम की आवाज के साथ जमीन पर आ गिरा. इस बैनर से बड़ा पतंग बन सकता है. बड़ा.....वाला. इतना बड़ा जितना किसी के पास नही है. न शाकिर के पास, न मुन्नन के पास और न ही उस भूरे, घुंघराले बालों वाले अब्दुल के पास. मुझे नए प्रयोग करना अच्छा लगता है. मैं हर चीज में कुछ नया खोजता हूँ. ऐसा मेरे दादा ने  मुझे सिखाया है. मैं बना रहा हूँ ऐसा पतंग जो पानी बरसने पर भी उड़ सके जब सब अपने घरों में दुबके बैठे हों. मैं इसमें लगाउंगा, बहन शकीना के उस नीले दुपट्टे के टुकड़े को. जिसको बकरी ने खूंटी से खींचकर कुतर दिया था. मैं पतंग में बैनर के तीन गुब्बारे जैसे दिखने वाले फूलों को एकदम बीचो-बीच रखूँगा ताकि रिमझिम बारिश के बीच जब पतंग उड़े तो फूलों को मिल जाये पानी की फुहारें. और वे खुले नीले आसमान में उड़ते हुए मुझे कहें-“थैंक्यू”. अचानक मेरे तरफ पांच-छह लोगों की दौड़ने की आवाजें आने लगीं. वे कुछ बुदबुदा रहे हैं. नहीं शायद गरिया रहे है. धमाक-धमाक. फट-फट. फटाक-फटाक. भच्च....मुंह से लाल-लाल कुछ निकल पड़ा. कानों में सांय-सांय की आवाज़. सन्नाटा.... बेहोशी.
अपने बाबा के साथ पीड़ित शाहिल मुल्ला                (फोटो :इंडियन एक्सप्रेस) 
             मेरा नाम शाहिल मुल्ला है . मैं पांचवी में पढता हूँ. परिवार में 6 लोग हैं. मेरा घर पश्चिम बंगाल के हरिहरपुर गाँव में पड़ता है. अभी मैं अपने एक कोठरी के घर में चारपाई पर लेटा हूँ. कमरा छोटा है पर हम रह लेते हैं इसमें. दो लोग चारपाई पर सो जाते हैं बाकी सब जमीन में. आह! बहुत दर्द हो रहा है सिर में. लगता है जैसे किसी ने बड़ा सा पत्थर मेरे सर पर दे मारा हो. मेरे होंठ सूजे हुए हैं. माँ ज्यादा करवट नहीं लेने देती कहती है डॉक्टर ने मना किया है. कमर में चोट की वजह से. अम्मी के आँखों से आंसू निकल रहे हैं. वो बगल में बैठी है, जबसे मेरी आँख खुली है. वो मेरे माथे पर कपडे की पट्टी रख रही है. पट्टी गीली है. उसके आंसुओं से या पानी से ? पता नहीं. वे मुझे दीदी के उस गंदे आदमी अएजुल सरदार के पास ले गए थे. उसके सामने उन गुंडों ने मुझे बहुत मारा. बोले तुम्हारा बाप माकपा का मेंबर है. एक दिन हम तुम सब को जान से मार देंगे. मैं मार से बुरी तरह बेहोश हो गया था. मुन्नन कहता है कि बाबा मुझे गाँव के बाहर बड़े से खाली मैदान में से उठाकर लाये हैं. लोग कहते हैं कि वे ममता दीदी के आदमी थे. लोग दीदी को तो अच्छा कहते हैं फिर उनके आदमियों ने मुझे मारा क्यूँ ? मैंने क्या किया था? मैं तो केवल पतंग बनाना चाहता था. मैं अब कभी पतंग नहीं उड़ाउंगा, नहीं तो वो मुझे फिर से मारेंगे.


Monday, May 2, 2016

तीव्र आर्थिक विकास ओर मजदूर हितों के बीच संतुलन


हर वर्ष 1 मई को मजदूरों के नाम पर घडियाली आंसू बहाए जाते हैं. कहा जाता है कि भारत में इस परम्परा की शुरुवात मद्रास में 1 मई 1923 में लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान नामक संगठन ने किया. हर साल इस तारीख को मजलूमों से रहनुमाई रखने वाले लोग लाल झंडे के नीचे इक्कट्ठे होकर मजदूर हितों की बात करते हैं. इससे उनका हित कितना होता है, ये बाद का मसला है. लाल झंडे के देवता माने जाने वाले कार्ल मार्क्स ने कहा था कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ. एक होकर क्या करो ? तख्ता पलट कर दो. शासन पर अपना कब्ज़ा कर लो. चाहे इसके लिए तुम्हे खूनी रास्ता ही क्यों न अपनाना पड़े. दुनिया के अनेक देशों में ऐसा हुआ भी. चीन, रूस सहित दुनिया के अन्य देशों सहित भारत में पश्चिम बंगाल एवं केरल जैसे राज्यों में कम्युनिस्ट ओर मार्क्सवादी पार्टियों के नेतृत्व में सरकारें बनीं. यानि मजदूर वर्ग सत्ता में आ गया. सत्ता में आने के बाद मजदूरों का कल्याण होना चाहिए था पर क्या ऐसा हुआ ? चीन ओर रूस में श्रमिकों के शोषण की कहानियां किसी से छिपी नहीं है. कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल में लोगों की स्थिति बदतर ही हुई है. साफ है कि बाहर से लुभाने वाली मार्क्स की विचारधारा मजदूरों का कल्याण न कर सकी. मार्क्स की विचारधारा समस्या के समाधान में केवल एक पक्ष को शामिल करता है. जब बात श्रमिक की हो रही हो तो स्वामी को कैसे भुलाया जा सकता है ? क्या उद्योगपति के हितों की अनदेखी कर श्रमिक हितों की बात व्यवहारिक तरीके से की जा सकती है ? सेवक ओर स्वामी एक दुसरे के बिना अधूरे हैं. तो मालिक और मजदूर के हितों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? इस बात को समझने से पहले हमें यह समझना होगा कि वास्तव में दोनों चाहते क्या हैं? एक-दूसरे से उनकी अपेक्षाएं क्या हैं ? पहले बात श्रमिकों की. श्रमिक अपने श्रम का उचित और समय पर भुगतान चाहता है. साथ ही वह सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा की भी हसरत रखता है. क्या पता गाहे-बगाहे अगर कोई दुर्घटना घट जाये तो शेष जीवन या उसके न रहने के बाद उसके मातहत बीबी-बच्चे भूखों मरने को बेबस न हों. मोटा-मोटा बस इतना ही चाहता है मजदूर. अब बात उद्योगपति की. कोई भी व्यक्ति मुनाफा कमाने के लिए ही उद्योग शुरू करता है. जैसे-जैसे पूरी दुनिया में बाजारीकरण व निजीकरण का दबदबा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे माल को सस्ते दाम पर उपलब्ध कराने के साथ-साथ मुनाफा कमाने की चुनौती भी लगातार बढ़ती जा रही है. सस्ते और गुणवत्तापरक माल ही बाज़ारों में टिक पा रहे हैं. परोक्ष रूप से कहें तो बाज़ार में सस्ते ओर गुणवत्तापरक श्रम की जबरदस्त मांग है. यानि नियोक्ता को सस्ता ओर प्रशिक्षित श्रम चाहिए. बात यहीं से बिगड़ना शुरू होती है. बाज़ार में प्रशिक्षित श्रम की भरी किल्लत है. लोगों की काम करने की क्षमता कम है. अपने आपको मुनाफे में रखने के लिए उद्दमी काम का समय बढ़ा देता है जबकि सुविधाएँ काम करता है. वर्तमान युग के मजदूर ओर नियोक्ता हितों के सामने असल समस्या है-उद्योग में अकुशल श्रम का आना. इस समस्या का हल दोनों पक्षों को मिलकर निकलना होगा. हमें श्रम को उद्योग विशेष की प्रकृति एवं मांग के अनुरूप प्रशिक्षित करना होगा. तभी मजदूरों का भी भला हो सकेगा और तेजी से बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, पुल, बांध, सड़कें, ऊँची-ऊँची इमारतें, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आदि बन ओर पनप सकेंगी. आखिर विकास का हमारा यही तो पैमाना है.  

Sunday, April 17, 2016

राष्ट्रवाद

लगभग महीने भर पहले राजधानी के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में घटी देश विरोधी नारेबाजी की घटना ने राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह के बहस को जन्म दिया. जब बहस देशद्रोह बनाम राष्ट्रवाद पर छिड़ी तो देशद्रोह व राष्ट्रवाद के परिभाषा पर बहस छिड़ना भी लाजिमी था और ऐसा ही हुआ. आज देश का बौद्धिक खेमा राष्ट्रवाद के परिभाषा पर अलग-अलग खेमों में बंटा हुआ है. कन्हैय्या कुमार और उनके साथियों के गिरफ़्तारी के बाद तो जेएनयू में बाकायदा राष्ट्रवाद पर खुली कक्षाएं आयोजित की गयीं. राष्ट्रवाद मुख्य रूप से पश्चिम से आयातित संकल्पना है. वाम विचारधारा के विद्वान ऐसा ही मानते हैं. पश्चिम में औद्दोगिक क्रांति एवं साम्राज्यवाद के उदय के साथ ही राष्ट्रवाद की संकल्पना का उभार हुआ. पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल में उनके साझा आर्थिक हित थे.  पश्चिमी राष्ट्रवाद का उदय दुनिया के संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की मंसा की पृष्ठभूमि में हुआ. जिसने पूरी दुनिया को “हम” और “अन्य” में बाँट दिया. यह मूलतः बुर्जुआ संकल्पना थी. पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल में कुछ साझा पहचान थी . जैसे दुनिया पर कब्ज़ा ज़माने वालों की नस्ल गोरी थी . वे क्राइस्ट को मानते थे . भौगोलिक एकरूपता के कारण उनका खान-पान, वेश-भूषा सब एक जैसी थी. यानी पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल में समानता और एकरूपता थी. उन्होंने अपने आपको दुनिया में सबसे श्रेष्ठ घोषित किया. इस प्रकार राष्ट्रीय राज्यों का उदय खुद को एक-दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने की पृठभूमि में हुआ. पश्चिमी राष्ट्रवाद के विभाजनकारी स्वरुप को इसी बात से समझा जा सकता है कि मात्र धार्मिक असमानता के कारण यहूदियों को पश्चिमी देशों ने कभी अपने यहाँ टिकने न दिया.

              भारतीय राष्ट्रवाद अपने प्रकृति के कारण पश्चिमी संकल्पना से निहायत भिन्न है. हमारा राष्ट्रवाद भारतीय उपमहादीप के विविधताओं में मौजूद कुछ साझे तत्वों पर आधारित है. वाम विचारक मानते हैं कि भारत में राष्ट्रवाद की संकल्पना अंग्रेजों के आगमन के साथ आयी जो लगभग पश्चिमी ढांचे पर आधारित था. परन्तु अंग्रेजों के आगमन से पूर्व शेरशाह सूरी ने ग्रांड ट्रंक रोड बनवाई जो बहुत सारे राज्यों से होकर गुजरती थी. क्या इस घटना में राष्ट्रवाद के लक्षण नहीं मिलते ? क्या वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कोई सड़क कई देशों से बिना किसी सीमा और रोक-टोक के गुजर सकती है ? मूलरूप से भारतीय राष्ट्रवाद सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित है. इसमें ‘हम’ और ‘अन्य’ के विचार के लिए कोई स्थान नहीं है. भारतीय राष्ट्रवाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का उद्घोष करता है. भारतीय राष्ट्रवाद वैश्विक संसाधनों पर अधिकार ज़माने की बात नहीं करता और न ही ये नस्लीय, धार्मिक या जातीय समानता की बात करता है. यानी बहुलता इसके जड़ में बसी है. भारतीय राष्ट्रवाद के इसी विशेषता का परिणाम है कि हमारे देश में जिस भी जाति, नस्ल या धर्म के लोग आये हमने सबको स्वीकार किया. राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ को राष्ट्रवाद का अगुवा माना जाता है. वह खुद भी इस बात का उद्घोष करता है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उसका प्रमुख एजेंडा है और यही कारण है कि संघ के मानचित्र के अनुसार भारतीय राष्ट्र में वर्तमान भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश तक का क्षेत्र आता है. संघ दृष्टि में पूरा भारतीय उपमहादीप एक राष्ट्र है. इस प्रकार का राष्ट्रवाद समावेशी है. बहुलतावादी है. परन्तु दुर्भाग्य से वर्त्तमान समय में देश में राष्ट्रवाद के अर्थ को बेहद संकुचित कर दिया गया है. आज राष्ट्र का अर्थ चंद राष्ट्रीय प्रतीकों तक सिमट कर रह गया है जो भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उसके उद्गम स्थल पर ही झुठलाता है. सबसे मज़ेदार बात यह है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की झंडाबरदार आरएसएस की सहयोगी संस्थाएं ही यह काम कर रही हैं. मसलन अगर आप भारत माता को माता नहीं मानते तो आप राष्ट्रवादी नहीं हैं. अगर आप महिषासुर दिवस मनाते हैं तो आप राष्ट्रवादी नहीं हैं और चूँकि आप राष्ट्रवादी नहीं हैं इसलिए आप देशद्रोही हैं. निरपेक्ष आप रह ही नहीं सकते. राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र बाँटने वाले आपको निरपेक्ष रहने ही नहीं देंगे. उनके लिए स्त्री-पुरुष के बीच, दिन-रात के बीच कोई चीज आती ही नहीं है. राष्ट्रवाद पर छिड़ी वर्त्तमान बहस बौद्धिक समाज के भटकाव को ही नहीं वरन लोगों की संकुचित होती मानसिकता को भी प्रदर्शित करती है. वैसे भी राष्ट्रवाद की संकल्पना अपने उदयकाल से ही विवादों में रही है. अपेक्षाकृत अधिक उदार लोग दुनिया में किसी सीमा को नहीं स्वीकार करना चाहते हैं. पहली नज़र में यह लुभाती है पर क्या बिना किसी सामाजिक इकाई के आधुनिक सभ्य समाज की कल्पना की जा सकती है ? उदहारण सामने है. पश्चिमी देश अपने टूटते परिवारों से किस प्रकार जूझ रहे हैं. अतः समाज में राष्ट्र नामक इकाई का रहना तो आवश्यक है परन्तु वर्त्तमान विकृत राष्ट्रवाद समाज में कलह ही पैदा करेगा. बेहतर होगा यदि हम अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अति-उदार, बहुलतावादी माडल को लागू करने की दिशा में काम करें. यह भारत के साथ-साथ विश्व कल्याण के लिए भी उपयोगी होगा.  

Monday, March 14, 2016

प्रथम साक्षात्कार


उत्तर-प्रदेश सरकार पॉलीथीन प्रतिबन्ध को भले ही अमल में न ला पायी हो पर नोएडा का बिशनपुरा गाँव पॉलीथीन मुक्त ग्राम बनने की ओर अग्रसर है| खास बात यह है कि ये अभियान गाँव के लोगों द्वारा स्वेच्छा से चलाया जा रहा है| अभियान का नेतृत्व करने वाले रिटायर्ड नौसैन्य कर्मी रणवीर सिंह से अभियान के संदर्भ में बात कर रहें हैं शुभम |    

आपको इस तरह का सकारात्मक अभियान चलाने की प्रेरणा कहाँ से मिली?

आज हमारे चारों ओर जो गन्दगी दिखाई पड़ती है उसमे सबसे बड़ा योगदान पॉलीथीन का है| यह ऐसा अपशिष्ट है जिसका निस्तारण करना बहुत मुश्किल है| इस समस्या से निबटने के लिए हम लोगों ने अपने स्तर पर काम करना शुरू किया| बाद में सरकार का फैसला आया जिससे साहस और प्रोत्साहन मिला|

आपने इस कार्य के लिए लोगों को राजी कैसे किया?

प्रदूषण और इससे होने वाली बीमारियों से प्रत्येक व्यक्ति परेशान है लेकिन इससे निजात पाने के लिए  वह खुद कोई कदम नहीं उठा रहें है| हमने लोगों को इससे होने वाली हानियों से अवगत कराया| इसके लिए पूरे गाँव में हमने पोस्टर लगवाकर जागरूकता फैलाई| सबसे खास बात यह है कि इस गाँव की सामाजिक संरचना में तालमेल इतना अच्छा है कि पूरा गाँव आसानी से एक निर्णय पर पहुँच जाता है|

इस मुहिम के प्रति लोगों में क्या प्रतिक्रिया है?

सबसे पहले तो लोगों ने यही सवाल उठाया कि बहुत सारी चीजें जो पॉलीथीन में ही आती हैं उनका क्या करें? हमने लोगों को समझाया कि अपने स्तर पर हम जो कर सकते हैं तो वो तो करें पहले| आप देखिये तो 60 फीसद पॉलीथीन का प्रयोग कैरी बैग के रूप में होता है| हमारी बात को लोगों ने माना| इससे हमने गन्दगी के बड़े हिस्से को नियंत्रित कर लिया है|

तो आप पॉलीथीन रैपर्स से कैसे निबटेंगे?

यह तो बड़े स्तर की बात है| हम तो कहते हैं कि प्लास्टिक बंद कर दो| जब ये नहीं था तब भी तो लोग आराम से रह रहे थे| इसका कोई दूसरा विकल्प निकल आएगा| वैसे हमने उन चीजों का इस्तेमाल कम कर दिया है जो पॉलीथीन रैपर्स में आतीं हैं|

बिशनपुरा को आदर्श ग्राम बनाने के लिए आपकी और कौन-कौन सी योजनायें हैं?

देखिये, हम सभी क्षेत्रों पर ध्यान दे रहें हैं जिसमे कूड़ा निश्तारण, जल निकासी, भूमिगत विद्युतीकरण के अलावा समाज में बढती दूरी को कम करने एवं सांस्कृतिक पहचान बनाये रखने के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन करेंगे|

सुनने में आ रहा है कि इस मुहिम के जरिये आप चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं| यह किस हद तक सही है ?

चुनाव का इस मुहिम से कोई सम्बन्ध नहीं हैं| दोनों चीजें अलग-अलग हैं| सामजिक कार्यों सरोकारों से हमारा परिवार पहले से ही जुडा रहा है|

देश के अन्य ग्राम पंचायतों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?

देश की ग्राम पंचायतों को और अधिक स्वायत्ता और अधिकारों की मांग करनी चाहिए| हाँ, उन्हें पूरे रोडमैप के साथ काम करना चाहिए जिसमे जनसमर्थन अत्यंत आवश्यक है|

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 

Tuesday, September 8, 2015

मचाते रहो...

मचाते रहो

अपने देश ने कितनी ही बड़ी –बड़ी मिशाइलें क्यों ना बना ली हों | ज्ञान – विज्ञान के क्षेत्र में कितनी तरक्की क्यों न कर ली हो पर हम इन्फेक्शन रोकने का तरीका न इजाद कर पाए | अभीभूमि बिल और जीएसटी पर विपक्षी दलों का रोना- पीटना बंद नहीं हुआ था कि ये बीमारी जंगल के आग की तरह सब्जी मंडियों तक आ पंहुची |और कोई एसा है जो मंडी न जाता हो ? अब जो-जो मंडी में गया ,रोने –पीटने की बीमारी सबको होती गयी | फिर क्या था ? हर रशोई में हाय-तौबा मच गया | टी वी चैनलों के आँखों से इतना पानी निकला कि सरकार तक डूबने-उतराने लगी |जब ये कूं-कूहों कि आवाज हरखू काका के पास पहुंची तो उन्हें लगा कि देश पे कोई संकट आ गया है | उनकी राष्ट्रभक्ति जाग उठी | वो देश पर जीने मरने कि कसमें खाने लगे | परमियां....जैसे ही पता चला कि ये सारा रायता इस ‘पियाजिया’ ने फैला रखा है | हरखू काका चारों खाने चित्त ...|अब तो काका बड़े असमंजस में थे | उन्हेंसमझ में नहीं आ रहा था किउनके घर में सड़ने वाला प्याज जिसे ३ रूपये किलो से ज्यादा कोई लेने को तैयार नहीं होता था उसने बड़ी – बड़ीगाड़ियों में घूमने वाले इन पढ़े–लिखे साहबों के आँख में दम करके रखा हुआ है ? अपने प्रेमिकाओं से ब्रेकअप पर जश्न मनाने वाले इन साहसी साहबों को प्याज जैसी निगोड़ी चीज रुला कैसे सकती है | अरे ! ये तो कमाल हो गया | ये वही ‘पियाजिया’ हैना जिसे लेने कि बात पर बनिए-साहूकार मुंह एंठते फिरते थे | गाँव के सभी किसान जान गये कि प्याज ही वह चीज है जो इन साहबों के आँखों में दम कर सकती है नही तो इनके फटफटियों से निकलने वाले धुएं ने उनके नाक में दम करके रखा हुआ था | इन साहबों द्वारा प्याज कि इतनी उपेक्षा ठीक नहीं |काकाके तरह मुझे भी प्याज पे दया आ रही है |बेचारा.....| एकवीपी सिंह साहब का समय था | तूती बोलती थी उसकी| पूरे सब्जी बिरादरी में उसका कोई सानी न था | आंसुओं की नदियाँ बहा करती थीं | तबजुमला चला करता था “वीपी सिंह के देखो राज, 80 रुपया किलो प्याज” | जैसे ही सिंह साहब चलता बने वैसे ही प्याज महरानी का वैभव वैसे ही गायब हुआ जैसे पानी में डिस्प्रिन की गोली | भाजपा की तरह ही लम्बा वनवास झेलकर सत्ता में प्याजलौटी तो विपक्षियों से उनकी सुख-समृधि,उसका वैभव देखा  नहीं जाता| सबसे ज्यादा जलन तो पेट्रोल को हो रहा है |हो भी क्यों ना...? लोग उसे फेसबुकिया ताना जो मार रहे हैं | “जो लोग गाड़ी की टंकी फुल कराके खुशहो रहे हैं उन्हें मै बता दूँ कि अभी-अभीमैंने प्याज के पराठे खाएं हैं”-जैसे जुमलों से तो कान पक गया | वैसे अंदरखाने की बात बता रहा हूँ आपको | पेट्रोल को तो लोग बदनाम कर रहे हैं |असल साजिश तो आलू-टमाटर ने रची है | ‘राजा साहब’ की चर्चाकहीं हो ही नहीं रही |जिस गली देखो महरानी के जलवे हैं |
कवितायेँ,कहानियां और आरतियाँ तक बनने लगी महरानी के शान में | कहते हैं न समय पड़ने पे तीन नाम-परशू,परशुवा,परशुराम| वैसे जो लोग देश के परम्पराओं के बिगड़ने को लेकर चिंतित है उन्हें मै बता दूँ कि हमारी एक परंपरा जो सदियों से चली आ रही है वो न मिटी है न मिटेगी | हम ताली और गाली साथ-साथ देते हैं | मंदिर में ताली और बाहर निकलते ही गाली....| लेकिन महरानी के मामले में एक और परम्परा टूटी | यानी मंडी केबाहर तालीऔर मंडी केअन्दर गाली| बड़ी नाइंसाफी हुई है प्याज के साथ | आप उसे नाहक गरियाते फिरते हैं बिलकुल मोदीजी को गरियाने वालों कि तरह |आखिर प्याज आपसे कहने आया है कि आप उसे खाएं | इतने दिलजले हैं तो न खाएं | उसकीबला से |पर हजरत तुम तो ख’द ही बेजार हुए जाते हो | 80 रुपया लीटर पेट्रोल भरवा लोगे पर बस में कदम न रखोगे | डोमिनोज का पिज़्ज़ा तुम्हारे लिए सस्ता है | 200रुपये का इंटरनेटपैक डलवाते हो तब तुम्हारी जान ना जाती है | प्रेमिका के साथ रेस्टोरेंट में जाने पर वेटर को 100 रुपया टिप देने में तुम्हारी रसोई खतरे में नहीं पड़ती है| 12 पैसे कीमत से बनने वाली कोल्ड-ड्रिंक को 12 रूपये में खरीदने में अपनी शान समझते हो | उसके खिलाफ कभी झंडा नहीं उठाया तुमने | पर 1 रूपये के तंबाकू में चार दिन कामचलाने वाले किसान को उसके उपज का सही दाम मिले तो तुम मरे जाते हो | क्यों..? क्योंकि गाड़ी पे पत्नी को बैठाकर,मूंछों पे ताव धरके मोहल्ले से निकलते हो | अपनी बीबी के आँखों में धूल झोंककर दूसरी महिलायों से चैटियाते हो| ये सब तुमको मंहगा नहीं लगता क्योंकि ये सारी चीजें तुम्हारे ‘शान’ से जुडी हैं | और हम श्रेष्ठकुल के आर्यवंशी अपने ‘शान’ से समझौता नहीं कर सकते |लगातार मचाये जा रहे हो | सब तो वही कर रहे हैं|मै भी | मचाना तो लोगो की फितरत है |उन्हें बस नए-नए मसले मिलते रहें | मैंने अपने हिस्से का मचा लिया है अब आप भी मचाते रहो | क्या.? हल्ला......|

Thursday, August 13, 2015

धरती पर भगवान् .......धोखे मे इन्सान

धर्मक्षेत्र एवं कुकर्मक्षेत्र का पुराना एवं गहरा नाता रहा है | मनुष्य जब अपने हद दर्जे के कुत्सित कार्यों के फलस्वरूप समाज से बहिस्कार एवं विरोध सहते –सहते थक जाता है तो अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए वह धर्म का चोगा ओढ़ लेता है | उसके लिए यह ब्रम्हास्त्र है | यही वह पेशा है जिसमे तर्क –वितर्क की गुंजाइश बहुत कम होती है परन्तु सुरक्षा एवं सम्मान बढ़कर | चोगे को कितनी ही सावधानी से से पकड़ा जाए परन्तु आँधियों के झोके जब चोगा उठता है तो असली चेहरा सामने आ ही जाता है | ताजा घटनाक्रम को ही ले लें | आसाराम,रामपाल और निर्मल बाबा के कारगुजारियों ने जैसे महार्षि अगस्त, सुश्रवा , वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसा अनगिनत ऋषियों की महान परम्परा को कम पलीता लगाया था की सच्चिदानंद गिरी उर्फ़ सचिन दत्ता , राधे माँ एवं सारथी बाबा भी उस जमात में शामिल हो गए | हमारा देश इस बात का गवाह रहा है की यहाँ ऋषि- मुनियों की समृद्ध परम्परा रही है जिसने न सिर्फ धर्म , अध्यात्म जैसे अलौकिक क्षेत्रों में  ऊँचाइयों को छुआ बल्कि विज्ञान , स्वास्थ , राजनीति , कूटनीति आदि लौकिक विषयों में भी एक प्रतिमान स्थापित किया | “जब भी कोई व्यवस्था लम्बे समय तक चलती है तो वह भ्रष्ट हो जाती है |” ख्यातिप्राप्त कवि अलेक्जेंडर फ्रेजर की यह उक्ति धर्मनगरी पर भी बखूबी लागू हुई | अभी हल ही में चर्चा में आये आये तीन घटनाक्रमों को एक साथ समग्रता से देखने पर आस्था के नाम पर लोगों के साथ हो रहे छल का सम्पूर्ण चेहरा बेनकाब हो जाता है | मोटे तौर पर समाज उस व्यक्ति क संत का दर्जा देती है जिसमे काम , क्रोध , मद एवं लोभ जैसे सांसारिक विषयों को विजिटर कर लिया हो या उस दिशा में प्रयत्नशील हो | उपयुक्त कसौटी पर आज के बहुप्रचारित संतों को परखने की कोशिश करते हैं |
                        बीते ३१ जुलाई को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रयाग में नोयडा के बीयर बार , डिस्को और रियल एस्टेट का धंधा करने वाले जिन सचिन दत्ता उर्फ़ सच्चिदानंद गिरि का निरंजनी अखाड़ा के महामंडलेश्वर के रूप में जिस प्रकार पट्टाभिषेक हुआ ,वह संत समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है | उनके अभिषेक के समय दो – दो हेलीकाप्टरों से पुष्प वर्षा की गयी | सादा जीवन – उच्च विचार जैसे महहन परम्परा का गुणगान वे किस मुंह से करेंगे यह कहना मुश्किल है | पूरे कार्यक्रम के दौरान जिस तरह से उत्तर – प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह और ओमप्रकाश सिंह मौजूद रहे वह धर्म जगत – राजनीति – कर्पोरेट गठजोड़ दर्शाने के लिए पर्याप्त है | संत का जीवन लोगों के लिए मिशाल होता है | अखिल भारतीय अखाडा परिषद के विवादित राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरि की मेहरबानी से महामंडलेश्वर बने सचिन दत्ता के एक होटल बिल से पता चलता है की उन्होंने ५ दिन के लिए  ३८३९१२ रूपये चुकाए जिसमे खाने का बिल शामिल नही था | अक्सर विवादों में रहने वाले सचिन दत्ता के ऊपर पंजाब में धोकाधड़ी मुकदमा दर्ज है | मीडिया में आने वाली ख़बरों की माने तो महामंडलेश्वर बनवाने के एवज में सचिन ने उत्तर प्रदेश सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री को ऑडी कार उपहार स्वरूप भेंट की है | यह सारा खेल हिन्दु परम्पराओं के निर्वाहक साधू – संतों ने खेली | कायदे से वही व्यक्ति महामंडलेश्वर बन सकता है जो सम्बंधित अखाड़े से एक संत के रूप में कम से कम १० सालों से जुडा हो | साथ साथ धर्मशास्त्र का अच्छा ज्ञान होना चाहिए |सनातन धर्म के प्रति समर्पण के साथ साथ उसका निर्विवादित होना भी आवश्यक है | अब किस दिव्य दृष्टि से देखने पर महंत नरेन्द्र गिरि को सचिन में संतों के सारे लक्षण दिखाई दिए यह बात मीडिया को उनसे पूछना ही चाहिए | वैसे भी नरेन्द्र गिरि जी किस मुंह से सचिन से निर्विवादित होने की बात रखेंगे जबकि उनका अपना ही पद विवादों के घेरे में है | ध्यान देने की बात है की मीडिया में उछालने से पूर्व अखाड़े से सम्बंधित या किसी अन्य संत ने इस नियुक्ति के विरोध का साहस नही दिखाया | इससे दो बातें निकलकर सामने आतीं हैं –एक तो यह कि अपराधीकरण के कारण संत समाज में या तो हिटलरशाही मौजूद है या संत समाज के अधिकांश लोग एक जैसे ही हैं जो धर्म का चोगा ओढ़कर अपना व्यापार चलाते हैं और जो सच्चे संत हैं वो इस राजनीतिक दांव – पेंच एवं मीडिया के चमक दमक से बहुत दूर कहीं ब्रम्ह साधना और समाज निर्माण के कार्यों में लगे हैं | जो भी हो इस तरह की घटनाएँ ने सिर्फ करोड़ों हिन्दुओं के आस्था का मजाक बनाती हैं वरन स्वयं धर्म के विनाश का कारण भी बनती हैं | हालाँकि मामला गरमाने पर उन्हें निलंबित कर दिया गया परन्तु जैसा कहा गया कि वे २०-२२ सालों से अग्नि अखाड़े से जुड़े रहें हैं | अगर कोई इतने समय से जुडा रहा है तो निश्चित रूप से उसके बारे में सम्बंधित लोगों को उनकी योग्यता की पूरी जानकारी रही होगी फिर भी उनकी अयोग्यता के बावजूद उन्हें इस पद पर विभूषित क्यों किया गया इस यक्ष प्रश्न का उत्तर सम्बंधित लोगो को देना ही होगा |
                             दूसरा मामला प्रकाश मे तब आया जब स्वयं को दुर्गा का अवतार कहने वाली राधे मां ने अपने गलत कार्यों का विरोध करने वाले एक व्यक्ति को देर रात फोन करके प्रेमपूर्ण बातों मे उलझाने की कोशिश की | इसके बाद तो राधे माँ के करामातों की किताब पृष्ठ दर पृष्ठ खुलने लगा | पंचदशनाम जुना अखाड़ा के इस महामंडलेश्वर की मिनी स्कर्ट में फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो उठा |उनके ऊपर मुम्बई के कांदीवली थाने मे दहेज़ उत्पीडन हेतु उकसाने का मामला दर्ज हुआ और अश्लीलता फ़ैलाने के आरोप लगे | दरअसल वैश्वीकरण और बाजारीकरण ने जीवन के सभी क्षेत्रों को अपनी जद मे ले लिया है और धर्म भी इसका अपवाद नही रहा | उपरोक्त दोनों मामलों मे व्यवसाय भाव साफ – साफ दिखता है | आखिर जब व्यक्ति दीक्षित होकर संत बन गया तो उसके पास अपना कुछ भी नही रह जाता है उस स्थिति मे सचिन ने मंत्री जी को ऑडी भेंट की | कोई भी साधारण आधमी  भी समझ सकता है कि की यह एक तरह से सौदा था | हेलीकाप्टर से पुष्प वर्षा होने की घटना धार्मिक मामलों मे भी कारपोरेट के दखल को प्रदर्शित करता है | दूसरे मामले मे तो इसका निर्धारण करना मुस्किल हो जाता है कि यह धर्म से जुडा मसला है या किसी इवेंट मैनेजमेंट से जुड़ा मसला | हाल ही मे आतंकी हमला झेलने वाले पंजाब के गुरुदासपुर की रहने वाली दो बच्चों की माँ सुखविंदर के साथ ऐसा अचानक क्या घटित हुआ कि अपना सिलाई का धंधा छोड़ वह सन्यासिन बन बैठी ,वह भी तब जब हलवाई पेशे वाला उसका पति लंदन चला गया हो | दरअसल, सुखविंदर ने कभी मंदा पड़ने वाले धर्म के चोखे धधे को ताड लिया और धंध बदलकर राधे मां बन बैठी | अपने धंधे को बढ़ने के लिए राधे माँ ने अदभुद सूझ-बूझ का परिचय दिया | राधे माँ का वेबसाइट न सिर्फ उनके साक्षात् दुर्गा माँ होने की घोषणा करता है वरन उनके दिव्य दर्शन का निमंत्रण भी देता है | राधे माँ की चौकियों मे दर्शन के टोकन के लिए लगने वाली लम्बी क़तार किसी अच्छे खासे चलने वाले दुकान का एहसास कराती है | वहीँ चौकियों मे भजनों और फ़िल्मी गीतों पर बाजारू नाच के बीच भक्तों द्वारा माँ को किये जाने वाले  चुम्बनों को देखकर मन मे भ्रम पैदा होता है कि यह जागरण है या मुजरा |  माँ के दो खास शिष्यों मे से एक टल्ली बाबा तो केवल जागरणों की बुकिंग करता है |
                         तीसरा मामला उडीसा के सारथि बाबा से जुडा है जिनके ऊपर महिलाओं से अवैध सम्बन्ध रखने का आरोप है | हैदराबाद के एक होटल मे एक ही कमरे मे बाबा एक महिला के साथ रुका था और महिला को अपनी पत्नी बताया था |  
                          ऊपर के दोनों मामलों से सम्बंधित लोग या तो महामंडलेश्वर थे या बनाये जा रहे थे जिस पर विवाद हुआ | दरअसल, महामंडलेश्वर बनने के बाद पदासीन व्यक्ति को परोक्ष रूप से ही सही मिलती हैं | कुंभ पर्व पर होने वाली पेशवाई व शाही स्नान मे अखाडा के आचार्य पीठाधीश्वर के साथ महामंडलेश्वर रथ पर बैठकर निकलते हैं | चांदी का सिंहासन होता है और रत्नजडित क्षत्र उनकी शोभा बढ़ाते हैं |कैसी विडम्बना है कि भगवान अपने तिरपाल और कैलाश पर्वत पर ही खुश हैं और उनके तथाकथित भक्तों को चांदी का सिंहासन व क्षत्र की जरुरत पड रही है भक्ति पाने के लिए मज़ेदार बात यह है कि दोनों मामलों पर संतो के बीच गंभीर मतभेद देखने को मिला | दोनों मामलों मे आरोपियों की तरफदारी करने वाले लोगों मे से कोई भी परी अखाड़े के मान्यता के मुद्दे पर बोलने को तैयार नहीं है | दबी जुबान मे कई संत स्वीकार करते हैं कि वे धर्म – कर्म जैसे पुरुष  प्रधान क्षेत्रों मे महिलाओं की मौजूदगी मंजूर नहीं है | इन घटनाओं के आलोक मे यदि कोई अपने को नास्तिक न बनने का 10 कारण पूछे तो उनमे से शायद ही कोई बोलने की स्थिति मे हो |एसा नही है की यह स्थिति केवल हिन्दू धर्म मे है | चर्च मे पादरियों द्वारा छोटे बच्चों के साथ दुष्कर्म की घटनाओं को कौन भूला है ?ईसा के आदर्शों का गला कैसे घोटा जा रहा है इस सन्दर्भ मे एक घटना का उद्धरण समीचीन होगा | एक बार ब्रिटिश संसद मे वेश्यालयों को बंद कराने सम्बंधित बिल का यह कहते हुए विरोध किया था कि वेश्यालय ही वह जगह हैं जो चर्च मे जाने वाली हमारी बहू –बेटियों की इज्जत पादरियों से बचा सकते हैं |इसी तरह इस्लाम मे भी जारी होने वाले फतवे हास्यास्पद व आधारहीन होने के साथ साथ बिरादारी के तरक्की मे भी बाधक हैं |मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा कुरान की शिक्षाओं को तोड़ –मरोड़ कर पेश करने का ही नतीजा है कि पढ़े –लिखे युवा भी जिहाद के नाम पर हत्या बलात्कार जैसे कृत्यों से परहेज नही करते |
धर्म के नाम पर होने वाली ठगी व अत्याचार कोई नई बात नही है | यह समस्या आदिकाल से है | इस समस्या का हल भी लोगों की इच्छाशक्ति मे ही निहित है | वस्तुतः इस समस्या पर गहन चिंतन दुर्भाग्य से अभी तक नही हो पाया है |लोगो के आस्था के साथ खिलवाड़ करने वाले बाबा , मौलवियों एवं पादरियों का एक ही मकसद होता है कि कैसे वे लोगो के नज़र मे खुद को चमत्कारी सिद्ध कर पायें क्योकि दुनिया चमत्कार को ही नमस्कार करती है | हमें चमत्कारों पर विश्वास करना बंद करना होगा नही तो मुफ्तखोरी के चक्कर मे उडीसा के परिवार की तरह बाबाओं पर सब कुछ लुटाने के बाद आत्महत्या करने पर मजबूर होते रहेंगे | हमें धर्म की मूल भावना को समझना होगा न कि किसी व्यक्ति विशेष से अपने कल्याण की उम्मीद करना | “we must have a power to judge what is just,beautiful and hounrable.” – महान दार्शनिक सुकरात के इस बात को अगर हम अपने जिंदगी मे उतर लें तो कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होने वाले बाबा , मौलवियों को रोक सकेंगे |