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Tuesday, May 23, 2017

दलितों के धर्म बदलने से आपको क्या परेशानी है साहब?


आमतौर पर यह अपेक्षा की जाती है कि आप अपने जाति, समुदाय, धर्म, संप्रदाय, गाँव-जंवार, जिला आदि हर उस चीज के बारे में सकारात्मक बोलें या लिखें जिससे आप किसी न किसी तरीके से जुड़े हों. जैसे यदि आप ब्राह्मण हैं तो ब्राह्मणवाद के खिलाफ़ न बोलें, अगर दलित हैं तो दलितों द्वारा किए जा तरहे गलत कामों पर चुप्पी साध लें, अगर मुस्लिम हैं तो इस्लामिक आतंकवाद को इस्लामोफोबिया का नाम दे दें, अगर राष्ट्रवादी हैं तो वामपंथियों के केवल गलत कामों को बताएं और यदि वामपंथी हैं तो राष्ट्रवादियों को हिटलर की संतान, साम्प्रदायिक और न जाने क्या-क्या कहें. यानी एक अंगुली हमेशा दूसरी तरफ रखें. दरअसल यह जिंदगी जीने का एक अप्रोच है. रोजमर्रा के छोटी-छोटी बातों में आप इसे देख सकते हैं.


जिंदगी जीने का मेरा तरीका थोडा सा अलग है. मेरा मानना है दूसरे में गलती निकालने से पहले अपनी गलती ढूंढ लेना चाहिए. आप अपनी गलती ढूंढ का सही कर लीजिए मैं अपनी. मैंने कल फेसबुक पर जो पोस्ट लिखा उसमें आप यह अप्रोच देख सकते हैं. मैं स्वामी विवेकानंद के विचारों से काफी प्रभावित रहा हूँ. उन्होंने कहा था कि अगर किसी का दर्द समझना हो तो उसके स्थान पर खुद को रख के देखो. जब भी किसी दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक के साथ अन्याय होता है तो मुझे पीड़ा होती है क्योंकि मैं 1 मिनट के लिए उनके स्थान पे खुद को रख के सोचता हूँ. अगर आप मुझसे इस तरह के पोस्ट लिखने की अपेक्षा करते हैं तो मुझे क्षमा करें –




दलितों के धर्म छोड़ने से आप क्यों परेशान हैं?
मेरे पोस्ट पर लोग सबसे ज्यादा जिस बात पर उखड़े हैं वो है - दलितों को धर्म परिवर्तन का सुझाव देना. मुझे समझ में नहीं आता इसमें गलत क्या है? पूरी जिंदगी हम चीजों को छोड़ने और पकड़ने का ही काम करते हैं. दरअसल हमारी जिंदगी छोड़ने-पकड़ने से ही बनी है. गाँव में अच्छा स्कूल नहीं था इसलिए गाँव छोड़कर सबसे पास के किसी शहर में पढने आए. उस शहर में अच्छी उच्च शिक्षा नहीं मिल सकती थी इसलिए उसे छोड़कर बड़े शहर आए. शहर में एक कमरा ढूंढा रहने के लिए. कुछ समय बाद लगा की यह कमरा जम नहीं रहा है तो उसे छोड़ दूसरा पकड़ लिया. उस कमरे में 2 साल रहे. कमरा अपने घर जैसा लगने लगा. उससे प्रेम हो गया. फिर हमारी आमदनी बढ़ी तो हमने उस प्यारे कमरे को छोड़ फ्लैट ले लिया. जब इस शहर में अच्छी नौकरी नहीं मिली तो दूसरे शहर में चले गए. उससे भी अच्छी नौकरी विदेशों में मिली तो वहां चले गए. कॉलेज में एक गर्लफ्रेंड पटाई (शब्द पर आपको आपत्ति हो सकती है पर हमारे समाज में लड़की पटाई ही जाती है). कुछ समय बाद उससे अनबन होने लगी तो उसे छोड़ दिया किसी दूसरी लड़की को पकड़ लिया. मतलब ‘मूव ऑन’ कर लिया. जब कभी कोई मित्र किसी एक लड़की के प्यार में देवदास बन जाता है तो हम उसे यही तो सुझाते हैं – ‘मूव ऑन’. जब हमारा किसी से झगड़ा हो जाता है या हम किसी चीज पर अटक जाते हैं तो दोस्तों की सबसे ज्यादा दी जाने वाली सलाह ‘छोडो यार’ होती है. 

अब आप बताइए क्यों छोड़ा आपने उस गाँव को जिसने आपको पाल-पोस कर बड़ा किया? जिसके मिटटी में आप खेले-खाए? उस शहर को आपने क्यों छोड़ा जिसने आपको पहचान दी? उस कमरे को क्यों छोड़ा जो आपको घर जैसा लगने लगा था? उस शहर को आपने क्यूँ छोड़ा जहाँ आप अपने प्रेमिका के साथ हाथ में हाथ डालकर शहर की संकरी गलियों में घूमे थे? गोलगप्पे खाए थे? जहाँ आपने बड़े-बड़े सपने देखे थे? अपने देश को क्यों छोड़ा? अपने जन्म भूमि को क्यों छोड़ा? ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरीयसी’ का मन्त्र भूल गए आप? आपने अपनी प्रेमिका को क्यों छोड़ा? आपने दूसरी प्रेमिका क्यों बनाई?
उत्तर बहुत सरल है. हम किसी एक चीज में फंसना नहीं चाहते हैं. हम लगातार प्रगति करना चाहते हैं. क्यों? अच्छे जीवन के लिए. क्वालिटी लाइफ के लिए. वर्तमान आधुनिक युग में क्वालिटी लाइफ मानव की सारी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है. जब आप पूरी जिंदगी तमाम चीजों को छोड़ते रहे तो कोई दिक्कत नहीं और आज जब दलित आपकी बनाई हुई व्यवस्था में घुटन महसूस कर रहा है तो आप चाहते हैं की वह उस व्यवस्था को न छोड़े? हम कौन होते हैं किसी के जीवन की दिशा तय करने वाले? मेरा मन है माखनलाल में पढूं या आईआईएमसी में, नीला पहनूं या पीला, चावल खाऊं या रोटी, कमरे में रहूँ या फ्लैट में? आपको क्यों दिक्कत हो रही है? पुरानी व्यवस्था में मुझे जो दिक्कतें थीं उनके समाधान को आप आगे क्यों नहीं आए?

ख़बरों की दुनिया में रहने वाले लोगों को कम से कम दंगे से पहले सहारनपुर, वहां की स्थिति, राजपूतों द्वारा दलितों को एक बोर्ड न लगाने देना, उनको अम्बेडकर जयंती न मनाने देना, उनको शोभा यात्रा न निकालने देना, भीम सेना आदि के बारे में पता रहा ही होगा. आपने इनमें से कितने विषयों पर आपने लिखा? नहीं. तब आप इसको मुद्दा ही नहीं मानते थे क्योंकि यह कोई नई बात नहीं हो रही थी. सदियों से ऐसा चला आ रहा है. तब आप चुप रहे और आज जब दलित अपना निर्णय ले रहे हैं तो आप उन्हें सुझाव देने निकल पड़े. आज आप स्थिति संभालने की बात करते हैं. आज आपको हिंदुत्व, भाई चारा, इस्लामिक षडयन्त्र, विपक्षियों की चाल और न जाने क्या क्या दिखाई से रहा है.




कल से ही बहुत सारे मित्र मुझे बता रहे हैं की वो दलितों के साथ कोई भेदभाव नहीं करते हैं. उनको साथ बिठाकर खिलाते हैं. सही है मित्र आप उनके ऊपर एहसान कर रहे हैं. मुझे बताइए जरा आपके अब तक के मित्र मंडली में कितने दलित हैं? क्या आपने किसी दलित मित्र को अपने घर ले जाकर अपने थाली-गिलास में उनको खाना खिलाया है? कृष्ण-कन्हैया टाइप के भाई लोग जरा मुझे बताएं कि उनके पूर्व-प्रेमिकाओं में कितनी दलित लड़कियां थीं? या आप खुद दिमाग पर जोर डालिए और बताइए यदि आपके किसी मित्र किसी दलित लड़की से शादी किया हो?

मेरा एक मित्र है. शायद दलित है या पिछड़े वर्ग से है. मुझे स्पष्ट रूप से पता नहीं है. मैंने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की. हाँ इतना पता है कि उसकी प्रेमिका ब्राह्मण है. दोनों में काफी प्रेम था. बात शादी तक पंहुची. घर वालों ने लड़के की जाति सुनते ही मना कर दिया. बोले और किसी ऊंची जाति का होता तो चल भी जाता. यह नहीं हो सकता. क्यों नहीं हो सकता भाई? दलितों के धर्म परिवर्तन पर उखड़े लोग बताएं जरा आप किसी चमार लड़की से शादी करने को तैयार हैं? आप अभी जोश में भले ही बोल दें पर गारंटी ले सकता हूँ बाद में आप पलट जाएंगे.

दलितों के साथ किए जा रहे भेद-भाव को बहुत सारे लोग यह कह कर तर्कसंगत ठहरा रहे हैं कि दलित भी कुछ जातियों के साथ भेद-भाव करते हैं. यह तो ठीक वैसा ही है जैसे कोई विद्यार्थी यह कह कर अपने फेल होने क बचाव करे कि उसके अन्य साथी भी फेल हो गए हैं. यहाँ फिर से अप्रोच की बात आती है. आपका अप्रोच कहता है कि अपने समुदाय के नियम-कानून को किसी तरीके से न्यायसंगत ठहराओ जबकि मेरा मानना है कि अपने अन्दर सुधार कर उनके लिए दीपक बनो.

गड़े मुर्दे न उखाड़ो

अतीत में हुई गलतियों की जब भी चर्चा होती है तो लोगों का मुंह यह कहकर बंद करने का प्रयास किया जाता है कि गड़े मुर्दे न उखाड़ो. इसके पीछे भी एक बड़ा खेल है. अतीत की जिन बातों से प्रभावशाली समुदाय की आभा बढती है या कम से कम उनको कोई दिक्कत नहीं होती है, अतीत के ऐसे पन्नों को स्वर्णिम इतिहास, गौरवशाली, शौर्य से भरा, आदर्श और न जाने किन-किन नामों से अलंकृत किया जाता है जबकि जिन चीजों से उनको दिक्कत है उसे ‘गड़े मुर्दे’ बता नेपथ्य में धकेल दिया जाता है. मेरा मानना है ‘गड़े मुर्दों’ को समय-समय पर उखाड़ना बहुत जरूरी है. इससे हमारी वर्तमान और आने वाली पीढियां सबक लेती रहेंगी और आने वाले समय में ऐसी किसी घटना को रोका जा सकेगा. हासिमपुर घटना के सम्बन्ध में उस समय गाज़ियाबाद के एसपी रहे विभूति नारायण सिंह भी ऐसा ही मानते हैं. इसीलिए वे चाहते हैं कि हासिमपुर नरसंहार को समय-समय पर याद किया जाए.

समस्या कहाँ है?

हमारे साथ समस्या यह है कि हम दलितों से अपने आप को ऊपर रखना चाहते हैं. इसमें कुछ अलग नहीं है. यह मानव का स्वाभाव है. सभी को नैसर्गिक इच्छा होती है कि उसे किसी से श्रेष्ठ समझा जाए. चूँकि दलितों के ऊपर हमारे पूर्वजों ने मानसिक कब्ज़ा जमा रखा है तो हम उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं. अब आप कहेंगे आप ऐसी मानसिकता नहीं रखते. तो मायावती को गलियां कौन देता है? आज भी जातिसूचक गलियां किन जातियों के नाम पर दी जाति हैं. चमार, बेडिया, भंगी क्या है ये? मैं जब कक्षा 8 पंहुचा तब मुझे पता चला कि असल में ये जातियां हैं. जब मैं स्नातक में पंहुचा तब मुझे पता चला कि ‘बेडिया’ दरअसल किसी जनजाति का नाम है. पढ़े-लिखे और प्रगतिवादी मानसिकता के लोग भी दलितों के समस्याओं को कोई बड़ी समस्या के रूप में नहीं देखते क्योंकि उनके लिए यह कोई नई बात नहीं है. ये सब सदियों से चली आ रहा है. दूसरी तरफ जब कभी दलित धर्म छोड़ने की बात करते हैं तो हमें अपने धर्म की चिंता सताने लगती है. हिंदुत्व तुरंत खतरे में आ जाता है. उसके पीछे हमें षडयंत्र दिखने लगता है.

आपने क्या किया है दलितों के सम्मान के लिए



जो लोग मुझे दलितों के लिए ‘कुछ करने’ और समाज में जहर न बोने का ज्ञान दे रहे हैं उनसे एक सीधा सा सवाल है. आपने अपने स्तर पर दलितों के उत्थान के सम्मान के लिए क्या किया है. नीचे कमेंट बॉक्स में बताइए. मैं भी तो जानूं जरा. मैंने क्या किया है यह किसी दूसरे ब्लॉग पोस्ट में बताऊंगा.

मुझे गरियाते रहिए

संवाद का सबसे स्याह पहलू है उसे व्यक्तिगत स्तर पर ले जाना. यहाँ तक बहुत सारे लोग गलियां देने लगते हैं. कुछ गलियां बौद्धिक और साहित्यिक गलियां होती हैं तो कुछ सीधे माँ-बहन को समर्पित होती हैं लेकिन मेरे ऊपर इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. मेरा मानना है अगर आप पत्रकारिता करने आए हैं (सब लोग पत्रकारिता नहीं करने आए हैं. पत्रकारिता के नाम पर और भी बहुत सारे धंधे हैं) तो आपको गाली, थप्पड़ आदि के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए और इसमें मैं उस व्यक्ति की गलती नहीं मानता हूँ. उस बेचारे को अब तक जो बताया गया है उसको उसने सच मान लिया है और उस ‘सच’ से उसकी भावनाएं जुड़ गई हैं और भावनाओं का खेल तो आप जानते ही हैं.


...सो अपने आप को रोक के रखिए

मेरे बहुत सारे मित्रों को इस बात की चिंता है कि मैं अपने रास्ते से भटकता जा रहा हूँ, मैं अपनी सभ्यता, संस्कृति को भूल रहा हूँ और सबसे बड़ी चिंता कि मैं वामपंथी (यद्दपि मैंने अभी तक वामपंथ को पढ़ा, समझा नहीं है) होता जा रहा हूँ. दरअसल, जब मैंने माखनलाल में प्रवेश लिया था तो मैं ही ऐसी बातें किया करता था. दो सालों में पता नहीं कहाँ से यह सारा ‘जहर’ आकर मेरे मष्तिष्क में भर गया है. मेरी सलाह है कि आप अपने आप को बचा के रखिए. कहीं आप भी विश्वविद्यालय से निकलते-निकलते यही सब न हो जाएं. सो थोडा सावधान रहिए, अपनी संवेदनाओं को मार दीजिए, पढ़ना-लिखना बहुत न कीजिये, सच को मष्तिष्क में मत प्रवेश होने दीजिए, जिस खूंटे को पकड़ कर आए थे उससे बंधे रहिए. शायद आप बच जाएं.

(नोट: जिन लोगों ने परीक्षा के एक दिन पहले ब्लॉग लिखने में मेरा 2 घंटे समय बर्बाद करवाया है न... मां सरस्वती उनको माफ़ नहीं करेंगी.)


जय श्री राम! 

Sunday, May 21, 2017

क्या होगा 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता' के मेन्यू में ?

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नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के साथ ही राष्ट्रवादी पत्रकारिताका गाना गाया जा रहा है. ऐसी किसी भी खबर को दिखाने और प्रसारित करने की निंदा की जाने लगी है जिससे राष्ट्रहितको क्षति पंहुचती हो. पत्रकारिता के इस संकल्पना को मानने वालों पत्रकारोंकी लिस्ट लम्बी हो रही है. अब इसमें सिर्फ उगता भारत, डूबता सूरज जैसे दो टकिया समाचार संस्थान ही नहीं हैं बल्कि जी मीडिया जैसे बड़े घाघ शामिल हो गए हैं. सत्ता की मलाई चाटनी हो तो लोग क्या से क्या कर बैठते हैं जी ने तो सिर्फ राष्ट्रवादी पत्रकारिताको समर्पित जी हिंदुस्तान चैनल ही शुरू किया है.

अब सवाल यह उठता है कि राष्टवादी चैनल औरों से अलग कैसे होंगे? राष्ट्रवादी पत्रकारिता के मेन्यू में क्या होगा? जाहिर है राष्ट्रवाद का आधार गौ, गीता, गंगा और भारतीय संस्कृति है तो राष्ट्रवादी पत्रकारिताइन्हीं स्वर्णआधारों पर काम करेगी. वर्तमान पत्रकारिता और राष्ट्रवादी पत्रकारों की मांगों को देख-समझ कर राष्ट्रवादी पत्रकारिताके स्वरुप का अनुमान लगा रहा हूँ -
  • टीवी चैनलों के एंकर जय श्री रामके साथ कार्यक्रम की शुरूआत करेंगे. माथे पर टीका अनिवार्य होगा. पैनल डिस्कशन के दौरान हर पैनेलिस्ट को अपनी बात भारत माता की जयके साथ शुरू करना होगा और बीच-बीच में इसे दोहराते रहना होगा क्योंकि आज कल लोगों में देश प्रेम की भावना कभी भी गायब हो सकती है. भारत माता की जय का नारा उनको देशद्रोही होने से बचाए रखेगा.
  • सेना के ऊपर कोई भी सवाल नहीं उठाया जाएगा क्योंकि वो भारत माता के सच्चे लालहैं. सेना के सिपाहियों द्वारा किये गए रेप आदि को भारत माता की दूतों का प्रसाद माना जाएगा. इरोम जैसे लोगों को जेल में डालने के लिए सीरीज में कार्यक्रम तैयार किये जाएंगे.
  • गौ और गौ संरक्षण को चैनल अपने पालिसी का कोर बिंदु बनायेंगे. गायों पर विशेष कार्यक्रम बनाए जाएंगे. गायों का हक़ आदमी के हक़ से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा. हर हफ्ते न्यूज़रूम की गाय के गोबर से लिपाई होगी. हर पत्रकार को गौ-गोबर से बना साबुन और गौ-मूत्र से बनी सैम्पू लगानी होगी. गंगा पर भी विशेष फोकस होगा. गंगाजल के फायदे बताए जाएंगे. हाँ, गंगा की दुर्दशा पर कोई बात नहीं होगी क्योंकि इससे भाजपा सरकार की किरकिरी हो सकती है.

  •  चूँकि ‘राष्ट्रवादभाजपा की जागीर है इसीलिए उसको छोड़ बाकि सारी पार्टियों को देश हित में काम न करने वाला और विदेशी चंदे से चलने वाला माना जाएगा और इसके पक्ष में किसी भी तरीके से साक्ष्य इकट्ठा किया जाएंगे. भाजपा को देश के प्रत्येक राज्य में लाना पार्टी के साथ राष्ट्रवादीपत्रकारों की जिम्मेवारी होगी. सत्ता पक्ष से ज्यादा वार मृतप्राय विपक्ष पर किया जाएगा. विपक्षी पार्टियों के शासन के दौरान के गड़े मुर्दों को उखाड़ा जाएगा. भाजपा सरकारों की वाह-वाही की जाएगी. राष्ट्रवादी पत्रकार भाजपा हित को ही देशहित मानेंगे.
  • गाय हर प्रकार से समाज के लिए लाभदायक है इसीलिए गाय को मारना बिल्कुल गलत हुआ. इस दृष्टिकोण सेराष्ट्रवादीऔर रामजादोंद्वारा हरामजादोंके ऊपर की गई कार्यवाही को उचित माना जाएगा और भगवाधारियों द्वारा मुसलमानों की हत्या को नहीं दिखाया जाएगा या कम से कम दिखाया जाएगा.  


  • यह भी संभव है कि सबसे ज्यादा मुसलमानों को मारने वालों 'गुदड़ी के लालों' पर विशेष कार्यक्रम बनाये जायें. उनके इंटरव्यू को प्राइम टाइम में दिखाया जाए. ठीक वैसे ही जैसे किसी परीक्षा के टॉपर से उसके सफलता के राज पूछे जाते हैं.
  • किसी भी सूरत में भारत को हारता हुआ नहीं दिखाया जाएगा क्योंकि इससे भारतीयों का मनोबल गिर सकता है जो देश हित में नहीं है. मसलन भारतीय टीम पाकिस्तानियों को हर मैच में धूल चटाएगी, सैनिक पाकिस्तानियों को घुस कर मरेंगे, सैनिकों के सर अपने-आप कटने बंद हो जाएंगे.
  • एक विशेष कार्यक्रम चलाया जा सकता है जिसमें राष्ट्र चेतना के प्रखर गालीवादी लोग सोशल मीडिया पर वामियों और 'हिन्दू हितों के दुश्मनों' को पाठ पढ़ाने के 'गुरबताएंगे. विशेषकर गाली देने का हुनर सिखाया जाएगा.
  • आधुनिक पश्चिमी ज्ञान के स्थान पर वैदिक विज्ञान पर आधारित कार्यक्रम बनाये और दिखाए जायेंगे. इससे देशवासियों के मन में हमारे स्वर्ण अतीत के बारे में स्वाभिमान जगेगा.
  • पाकिस्तान और इस्लाम को सबसे ज्यादा बुरे तरीके से लताडने के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी.
  • एंकर राष्ट्रहितसे जुड़े मामलों का निपटारा खुद टीवी पर ही करेंगे क्योंकि राष्ट्रहित से जुड़े मामलों को लंबित करना सही नहीं माना जाएगा।
  • किसी भी ऐसे सवाल को टीवी पर नहीं दिखाया जाएगा जो संघ परिवार, भाजपा या मोदी को पसन्द न हो या उनके लिए असहज स्थिति पैदा कर सके.
  • राष्ट्रवादी संस्थान में काम करने वाले हर पत्रकार को पश्चिमी परिधानों का परित्याग कर भारतीय वस्त्र पहनने होंगे. महिलाओं को छोटे कपडे छोड़कर साड़ी पहननी होगी. चूँकि लाज महिला का आभूषण है इसीलिए हो सकता है कुछ टीवी चैनल महिला एंकरों का साड़ी के साथ घूँघट भी अनिवार्य कर दें. फिर हम लोग घूँघट वाली संस्कारी एंकर देख सकेंगे.




    • हर समाचार संस्थान के गेट पर भारत माता की विशाल प्रतिमा स्थापित की जाएगी ताकि संस्थान में प्रवेश करते ही राष्ट्रवाद की पर्याप्त खुराक उन्हें मिल जाए. न्यूज़रूम, कैंटीन और यहाँ तक कि वाशरूम में भी भारत माता की फोटो लगाई जाएगी ताकि किसी का राष्ट्रवाद धीमा न पड़ने पाए और कोई भी कामपंथी’ (वामपंथियों को उनके द्वारा दिया गया नाम) न बन सके.
    • दलित, आदिवासी, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले या समाज के किसी अन्य तबके के लोगों के हित में आवाज़ उठाने वालों को 'वामपंथी' तमगे से नवाज़ने में तनिक भी देरी नहीं लगाई जाएगी. 
    • ऐसे संस्थानों में चाय, काफी की जगह गंगाजल और गौ-मूत्र पिलाई जाएगी.
    • मोदी की चापलूसी एडिटर बनने की विशेष योग्यता होगी. रोज़ शाखा जाने वाले को ही रिपोर्टर बनाया जाएगा.
    • दलितों पर हो रहे किसी भी तरह के अत्याचार को नहीं दिखाया जाएगा क्योंकि इससे वैमनस्य फैलेगा जो देशहित में नहीं है. वैसे भी संघ दलितों के उत्थान के लिए तमाम तरह की योजनायें चला ही रहा है इसलिए मीडिया को इस विषय पर अपना समय व्यर्थ करने की जरूरत नहीं समझी जाएगी.
    • संस्थान के हर कर्मचारी को साल में एक बार लिखित रूप में अविरल देशभक्तिका शपथ पत्र देना होगा. संघ का कोई एक शिविर करना अनिवार्य किया जा सकता है.
    • आदिवासियों पर कोई ग्राउंड रिपोर्ट नहीं की जाएगी क्योंकि राष्ट्र हित में कुछ चीजें दबा लेनी चाहिए. विशेषकर वो जो बहुसंख्यकों के हित में न हों और आदिवासी बहुसंख्यकों के हित में नहीं हैं.
    • मोर्निंग स्लॉट में केवल गीता के उपदेश दिए जाएंगे. किसी और धर्म के उपदेशों को दिखाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि भारत के सभी लोगों का जड़ सनातन धर्म है. उनके पूर्वज भटक कर दूसरे धर्म में चले गए थे इसीलिए कायदे से वे सभी सनातनी ही हुए और गीता का उपदेश ही उनके लिए हितकारी होगा.
    • सरकार से एक कदम जाकर उसके शानदारयोजनाओं की जानकारी दी जाएगी. जैसे दो हज़ार के नोट में चिप लगाया गया था.
    • गद्दारगाँधी और नेहरू की फोटो न्यूज़रूम से हटाकर वीर सावरकर, गोडसे और बल्लभ भाई पटेल के चित्र लगेंगे. संघ चालक और मोदी तो परम पूज्यनीय होंगे ही.


    सरकार भी नहीं हटेगी पीछे
    सरकार भी देशभक्त पत्रकरों को मदद करने में अपना हाथ पीछे नहीं खींचेगी. उन्हें हर तरह की सुविधाएँ मुहैय्या करायी जाएंगी.
    • मसलन ऐसे 'सपूतों' को सुरक्षा दी जा सकती है. जैसे सुधीर चौधरी को जेड श्रेणी सुरक्षा दी गई है. पत्रकार सुरक्षा घेरे में पत्रकारिता करेंगे.
    • ऐसे पत्रकारोंको प्रेस कांफ्रेंस तक में जाने की जरूरत नहीं  होगी. विज्ञप्ति उनके दफ्तर पहुंचा दी जाएगी.
    • एनडीटीवी जैसे देशद्रोही चैनलों को एक दिन के लिए नहीं हमेशा के लिए बंद किया जाएगा. रवीश जेल जाएंगे.
    • सरकार वरिष्ठ और बड़े नामोंवाले पत्रकारोंकी एक समिति गठित कर सकती है जो संस्थानों के कार्यक्रमों और चाटुकारों’ (अब इन फीचरों के साथ मैं उनको पत्रकार नहीं कह सकता. सॉरी.) को राष्ट्रवादीहोने का प्रमाण पत्र देंगे.

    बढ़िया है न पत्रकारिता का राष्ट्रवादी मॉडल मॉडल?

    Sunday, May 14, 2017

    ...तो मां बनने को तैयार हैं आप?

    सुबह से ही सोशल साइट्स पर मदर्स डे से सम्बंधित पोस्ट पढ़ रहा हूँ. हर कोई अपने-अपने तरीके से मां के प्रति अपना प्रेम प्रकट कर रहा है. कोई मोबाइल में पड़े हजारों फ़ोटोज़ के बीच अपने मां को ढूंढ रहा है तो कोई फोटो के ऊपर लिखने के लिए अच्छा कैप्शन ढूंढ रहा है. कई लोग यह नहीं तय कर पा रहे कि मां की कौन सी फोटो डालें जिस पर लोग 'गॉर्जियस', 'ब्यूटीफुल', 'अवसम' जैसे कमेंट करें. मां के प्रति हमारी भावनाएं आज उफान पर हैं. आज हमारे भावनाओं के समंदर में ज्वार उठ खड़ा हुआ है. ज्वार के साथ एक बड़ी दिक्कत है. इसकी नियति में भाटा हो जाना लिखा है.

    बरसाती केवल मेढक ही नहीं होते, हमारे ज़ज्बात भी बरसाती होते हैं. अलग-अलग दिन, अलग-अलग तरह की बारिश होती है और हर बारिश के हिसाब से हम खुद को बदल लेते हैं. आज मदर्स डे की बारिश है, कल फादर्स डे की होगी, परसों वैलेंटाइन डे की, नरसों टेडी डे की और उसके बाद रोज़  डे, थैंक्यू  और पता नहीं कितने और डे... मदर्स डे को मां सबसे ऊपर है, वैलेंटाइन डे को प्यार सबसे ऊपर होगा और टेडी डे को जिंदगी में टेडी सबसे महत्वपूर्ण चीज बन जाएगी। हर नए दिन में नई प्राथमिकताएं।

    भावनाएं सेंसेक्स हैं, रोज नई ऊंचाइयों पर होती हैं. हम निवेशक हैं. हमें लगता है यही वह पॉइंट है जहाँ सबसे ज्यादा फायदा है. हर दिन हम अपने हिस्से की भावनाओं को किसी ‘डे’ नामक ब्रोकर से तुडवाकर उसे बाजारू बना देते हैं.

    मैं उलझन में हूँ. मुझे क्या करना चाहिए? अपनी भावनाओं को बाजारू बना दूँ? एक फोटो अपलोड करके कुछ अच्छा सा लिख दूँ? क्या मां बस एक फोटो है और हमारे जीवन में उसका योगदान बस कैप्शन तक सीमित है? क्या हम मां को किसी एक देह, फोटो, किसी याद तक समेट सकते हैं? मेरी मां कौन है? सिर्फ वो जिसने मुझे जन्म दिया?
    (फोटो क्रेडिट: juliapelish.com)

    नहीं। 'मां' शब्द की अभिव्यक्ति मात्र उस महिला से नहीं हो सकती जिसने मुझे जन्म दिया है. कोई भी भौतिक वस्तु मां शब्द को नहीं निरूपित कर सकती है. मां एक भावना है, एक विचार है. मां एक खूबसूरत अहसास है. एक ऐसा एहसास जो हर अच्छे-बुरे वक्त में हमारे साथ परछाई के तरह चलता है.

    याद कीजिए जब कभी रात के 10 बजे किसी सूनसान सड़क पर किसी डरी-सहमी लड़की को देखकर आपके मन में उसके प्रति चिंता के भाव आयें थे। वो चिंता नहीं थी आपका ममत्व था. उस समय आप आप नहीं थे. उस समय आप मां हो गए थे. जब उस डरी लड़की ने सड़क पर गुजर रही किसी गाड़ी की हेडलाइट के उजाले में आपके आँखों में कुछ देखकर आपके बैक सीट पर धीरे से बैठ गयी थी। तब उसने आपके आँखों में मां देखा था. जब आपका कोई मित्र एसएससी में चौथी बार सिर्फ 2 नंबर से लटक जाने के बाद फूट-फूट कर रो रहा था. आपने उसे संभाला था. उसे हिम्मत न हारने वाले किस्से सुनाये थे, आपने उसका सिर अपने कंधे पर रखकर उसके बालों में प्यार से हाथ फेरा था और उसके साथ जब आप भी फूट कर रोए थे. तब आप आप नहीं थे. आप मां हो गए थे. आप तब भी मां थे जब आपने किसी दलित, आदिवासी, गरीब, किसान के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद किया था.

    हम सब के भीतर 'कुछ' मां है. किसी के अन्दर थोड़ा ज्यादा किसी के अन्दर थोड़ा कम. हमें अपने अन्दर के मां को पहचानना है. अपने अन्दर के 'मां' वाले हिस्से को थोड़ा बढ़ाना है. मां के नाम पर रोज़ निकालने वालीं हजारों गालियों को बंद करना है. अगर हम यह सब कर पाए तो मदर्स डे की सार्थकता होगी. नहीं तो यह 'डे' बरसात बन जाएगा और हम मेंढक, डे प्रोडक्ट हो जाएगा और हम खरीदार।

    तो बताइए आप मां बनाने को लिए तैयार हैं?

    Friday, April 21, 2017

    देश कौन बनाता है ?


    देश कौन बनाता है ? सिर्फ हम, आप, सड़क पर सोने वाले लोग, दारु पीकर हंगामा करने वाली लड़कियां, राह चलते महिलाओं में चैन खोजने वाले दढ़ियल लड़के, हर बात में 'भारत माता की जय' बोलने देशभक्त, गौ -रक्षा के नाम पर मुसलमानों को मारने वाले लोग या फेसबुक पर तू -तू मैं- मैं करने वाले बुद्धिजीवी ?

    नहीं। देश बनता है उन तमाम लोगों से जो चुप-चाप अपने धुन में मगन, छोटे-बड़े कामों में मस्त हैं। बिना इस बात की परवाह किए कि लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं। उन्ही तमाम लोगों में है वो सुरीली आँखों वाली लड़की। बाकी दुनिया से बेफिक्र, मध्यम कद, गोरा बदन, कमर तक लम्बे बाल सुर्ख लाल गालों वाली वह लड़की जब सुबह - सुबह तिकोनिया पार्क में योग करती है तो पार्क के किनारे चलते लोगों की निगाहें बरबस खिंची चली आती हैं. पार्क के किनारे चना बेचने वाले राजू ने एक दिन बातों - बातों में मुझे बताया की सुबह -सुबह उसके दुकान पर जो भीड़ लगती है, असल में उसके चाहने वालों की भीड़ है.


    मैंने पड़ोस में रहने वाले शर्मा जी को देखा है। वो रोज सुबह-सुबह नातिन को स्कूल छोड़ने के बाद राजू के दुकान पर चने जरूर खाते हैं। सिपाही की नौकरी के लिए दौड़ वाले लड़के पार्क के के रिंग रोड का हर चक्कर लगाने के बाद रूककर उसे देख लेना जैसे अपना राष्ट्रीय कर्तव्य समझते हों। उसके योगा क्लास में 'योगियों' की भीड़ में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है। उसके कद्रदानों में हर उम्र, जाति-धर्म और समुदाय के लोग हैं। जब वह कोबरा पोज़ मारती है तो एक पल के लिए आस-पास जीवन थम सा जाता है। क्या उसे इस बात का इल्म तक होगा कि ठाकुर जोरावर सिंह की आँखे उसके छरहरे बदन को स्कैन करती हैं। पास खड़े लोग इस बात का इंतज़ार करते रहते हैं कि कब वह कैमल पोज़ मारे और वे उसके वक्षों का दर्शन करके वे खुद को कृतार्थ कर सकें।


    सारी बातों से बेखबर वो अपने काम में मगन रहती है। सुरीली आँखों वाली लड़की जाने -अनजाने हमें बहुत कुछ सिखाती है। वह हमें दूसरों के बातों की परवाह किये बगैर अपने काम में मगन रहना सिखाती है। वो हमें सिखाती है कि देश सेवा केवल 'भारत माता की जय' बोलकर या फेसबुक पर 'संस्कृति की रक्षा' के लिए झगड़ने से नहीं होता है। अपने हिस्से के काम को ईमानदारी से करना ही देशसेवा है।  


    Saturday, February 11, 2017

    पत्रकारों का निष्कासन, नए रंगरूट और विश्वसनीयता का संकट

    अभी दो दिन से सोशल मीडिया पर बंगाल के नामी मीडिया समूह आनंद बाज़ार पत्रिका से दो सौ पत्रकारों के निकले जाने की खबर चर्चित हो रही है. सोशल मीडिया के की खबर को इसलिए उद्धृत करना पड़ रहा है क्योंकि मीडिया से सम्बंधित अधिकतर ख़बरों को खबरनवीस गटक जाते हैं. अंग्रेजी में नवाचार व मूल्यों की पत्रकारिता करने के लिए स्थापित ‘द क्विंट’ को छोड़ दें तो किसी ठीक-ठाक मीडिया समूह ने इस खबर को रिपोर्ट नहीं किया. ‘द क्विंट’ की भी रिपोर्ट ‘निकाले जायेंगे’ के आधार पर है. सोशल मीडिया पर विभिन्न संस्थाओं के रिपोर्टर व अन्य कर्मियों के पोस्ट की मानें तो आनंद बाज़ार पत्रिका व उसके अंग्रेजी दैनिक ‘द टेलीग्राफ’ से लगभग 200 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. 10 दिसंबर को लिखे गए एक ‘द क्विंट’ के खबर के अनुसार आनंद बाज़ार पत्रिका में कुल 1200 कर्मचारियों में से लगभग 40 से 50 प्रतिशत कर्मचारियों को बाहर का रास्ता देखना था. यानी आने वाले दिनों में और भी कर्मचारी निकाले गए. खबर के अनुसार, अंदरखाने के लोगों ने बताया कि आनंद बाज़ार पत्रिका ने कुछ समय पहले समूह के अख़बार, टीवी चैनल और अन्य माध्यमों का खर्च कम करने व आमदनी बढ़ाने के लिए अमेरिकी कंपनी ‘हे कंसल्टेंसी लिमिटेड’ के साथ हाथ मिलाया था. अपनी रिपोर्ट में हे ने यह नायाब तरीका सुझाया. इससे कुछ ही समय पहले अंग्रेजी दैनिक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने अपने छह संस्करण बंद कर दिए. एक अनुमान के मुताबिक इन संस्करणों में काम करने वाले वाले लोगों की संख्या 200 के आस-पास है. छोटे से आकार की मीडिया इंडस्ट्री में 400 अनुभवी लोगों को पचा पाना काफी दुष्कर कार्य है.
    (फोटो क्रेडिट - www.eremedia.com)
              
    अब मामला आता है नए पत्रकारों का. एक अनुमान के मुताबिक अकेले दिल्ली-एनसीआर में 100 से ज्यादा मीडिया कॉलेज हैं जहाँ से हर साल हजारों की संख्या में नए रंग-रूट निकलते हैं. हाल के दिनों में मीडिया जगत में हो रही छटनी और उथल-पुथल से इतना तो तय है कि मीडिया संस्थानों में नयी भर्तियों पर ग्रहण लग गए हैं. सवाल यह है कि बड़ी हसरत के साथ पत्रकार बनाने के सपना और दुनिया बदलने की जिद लेकर दिल्ली आये नवजवानों का क्या होगा? उनके जिद्द का क्या होगा? क्या उन्हें कहीं जगह मिलेगी या मजबूर होकर उन्हें पत्रकारिता के नाम पर गोरखधंधा चलाना पड़ेगा. या फिर ट्रेनिंग व इंटर्नशिप के नाम पर और अधिक लम्बे समय तक शोषण झेलने के लिए अभिशप्त होना पड़ेगा. अगर कहीं नियुक्ति हो भी गयी तो किस कीमत पर? क्या मानकों के अनुसार उन्हें वेतन मिला पायेगा? मुझे एक बड़े हिंदी अख़बार के कुछ लोगों ने बताया कि संस्थान में लम्बे समय तक जमे पत्रकारों को निकालकर नए लोगों को इसलिए रखा जा रहा है क्योंकि उन्हें वेतन कम देना पड़ेगा. मतलब साफ़ है कि मीडिया व मीडियाकर्मियों को और बुरे दिन देखना अभी शेष है.  

    एक तरफ रोटी के लिए कोहराम मचा हुआ है तो दूसरी तरफ मीडिया शिक्षण संस्थओं में मोटी रकम पाने वाले शिक्षकों व प्रोफेसरों को ‘मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर’ चिंता खाए जा रही है. मीडिया के कार्यप्रणाली पर स्वघोषित राष्ट्रीय स्तर की गोष्ठियां फैशन बन गयी हैं. सोशल मीडिया पर खबरें शिकायती तेवर के साथ साझा की जा रही हैं. ‘भांड मीडिया’, ‘बिकाऊ मीडिया’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो गया है. अपने नौकरी पर उल्टी लटकती तलवार के साथ किसी पत्रकार से मात्र सच बोलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? संस्थानों में बैठे लोग बखूबी जान रहे हैं कि सम्पादकीय सत्ता का किस प्रकार हनन हुआ है और प्रबंधन का प्रभाव किस हद तक बढ़ गया है. संस्थाओं में एचआर की भूमिका कक्षा के मास्टर सी हो गयी है. नौकरी पर संकट का आलम यह है कि वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने एक बार कहा था कि ‘जरा सा झुकने’ को कहने पर पत्रकार ‘रेंगने’ लगते हैं. प्रबंधन में बैठे लोग चाहते हैं कि ख़बरों को इस प्रकार लिखा जाए जिससे सरकार की कृपा बनी रहे और अधिक से अधिक विज्ञापन मिल सके. यहाँ यह रेखांकित करना आवश्यक है कि पिछले विधानसभा चुनावों से ही आनंद बाज़ार पत्रिका समूह और पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल में छद्म-युद्ध चल रहा था जिससे समूह को सरकारी विज्ञापन बंद हो गए थे. यह समस्या बाजारीकरण, पूंजीवादी व्यवस्था का बढ़ता चलन और मंदी के साथ-साथ उतना ही सामाजिक भी है. दुनिया में कोई भी वस्तु मुफ्त नहीं मिलती है फिर समाचारों को क्यों मुफ्त में बांटा जा रहा है? जिस चीज को मुफ्त में बांटने की होड़ हो उसमे कुछ खोट तो होगा ही. हम एक अच्छा भी और ‘सस्ता भी’ तो छोडिए ‘मुफ्त का’ पाना चाहते हैं. अगर हम मुक्त मीडिया चाहते हैं तो उसके लिए हमें भुगतान करना ही होगा, नहीं तो हमें मीडिया पर घडियाली आंसू बहाना बंद कर देना चाहिए.

    Monday, November 14, 2016

    बचपन : अनकही कहानियां डायरी के पन्नों से…

    माँ ! आज चारों तरफ बाल दिवस ही धूम-धड़ाके के बीच आपको कुछ बताना है। कुछ कहना है जो आजतक नहीं कह पाया।
    आप हमेशा चाहती थीं न कि मैं पढ़लिखकर कर डॉक्टर बनूँ। मुझे याद है एक बार आपने कहा था। शायद इसीलिए आपने मुझे २ साल की उम्र से ही पढ़ना शुरू कर दिया था घर पर। मुझे आज भी याद है उस बड़े से आँगन के दृश्य। बिल्कुल वैसे ही,  जैसे पिक्चर की रील चलती है। आपका घंटों तक मुझे पढ़ाना। छोटी-छोटी गलतियों पर मुझे मुर्गा बनाना। घडी से देखकर आधे घंटे के लिए खेलने जाने देना,  वो भी तमाम प्रतिबंधों के साथ। “आधे घंटे का मतलब, आधे घंटे”, “घर दूर मत जाना, दुआरे पे खेलना”, “सूद के लड़कों के साथ न देखूं  आपको “, “पिंटू के साथ भी मत खेलना, गलियां देता घूमता है”… आपके नसीहतों की फेहरिस्त लंबी थी। मैं जनता हूँ  आप मुझे पूर्ण बनाना चाहती थी। आप मुझे ऐसा चाँद बनाना चाहती थी जिसमें दाग न हो। लेकिन मेरा भी अपना बचपन था माँ। मैं भी खेलना चाहता था गाँव के तमाम ‘सूद’ लड़कों की तरह। बिलकुल नंगे होकर पूरे गांव में घूमना चाहता था। धूल में लोटना चाहता था लेकिन जरा सा कपडे गन्दे हो जाने पर आप मुझे डांटती थी। मैं जाना चाहता था; खेत जोतने वाले ग्वाल बप्पा (यादव होने के कारण मैं उन्हें ग्वाल बप्पा कहता था) के साथ, उत्तर वाले खेतों में। उस हवेली से घर की चहरदीवारें मेरे लिए सलाखों से काम नहीं थी। आप मुझे संस्कारी बनाना चाहती थी। आप मुझे ऐसा बालक बनाना चाहती थी जिसको देखकर लोग अपने बच्चों को उलाहना दें। ऐसा होता भी था पर मैं खुश था। हमेशा मरा सा रहता था । मेरे अन्दर का दर्द आप समझ नहीं पाईं। मैं आपसे कुछ कह भी नही पाता था।  डरता था मैं आपसे। आप मुझे भोर ४ बजे ही उठा देती थी। रामायण के पाठ करवाती थी। मैंने आपको ‘बालक को संस्कारी कैसे बनाएं’ जैसी किताबें पढ़ते अक्सर देखा करता था। मैं आपके मन्तव्य पर कोई सवाल नहीं उठा रहा हूँ। वो तो सवालों से परे है। आप बहुत अच्छी माँ हो। आप हर हाल में मुझे सफलता के बुलंदियों पर पंहुचाना चाहती थी पर मैं मशीन नहीं था। मैं आपके  मन्तव्य को तब भी भली प्रकार से समझता था और आज भी। आपकी उस तपस्या में बदले की भावना थी। मैं आपके अंदर जल रहे आग के धधक को भली-भांति महसूस कर सकता था। आप उन लोगों को हराना चाहती थी जिन्होंने केवल स्त्री होने के कारण आपको सताया था। मैं ये भी जनता हूँ कि आप अस्तित्व लड़ाई लड़ रही थी और उस लड़ाई में मैं एक हथियार था। आप हथियार को चमका कर पैना बनाने में कोई कसर नही छोड़ना चाहती थी। आपके संघर्षों के बीज हैं मुझमें। मैं उन्हें पहचान सकता हूँ। जैसा हमेशा होता है। हर लड़ाई में महिलाएं और बच्चे पिसते हैं। मैं भी परिवार के इस लड़ाई में पिसा। मेरा बचपन इस शीत युद्ध में मारा गया। 
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    आप मुझे अपने क्लास से स्कूल में भेजना चाहती थी पर वहां दिनों अच्छे स्कूल की बात सोचना भी पाप था। गाँव में अच्छे तालीम की व्यवस्था नहीं थी। उन दिनों स्कूल के नाम पर गांव से २ किलोमीटर दूर प्राइमरी स्कूल था। आपने कुछ दिन भेज मुझे था उस स्कूल में, जहाँ पंडित जी खटिया पर लेट कर सोते थे और हफ्ते-हफ्ते पर नहाने वाले लड़के खेलने के साथ भैंस चराने का ‘ओवर टाइम’ करते थे। पिद्दी-पिद्दी से लड़के लड़कियों से हर ‘वो’ सवाल पूछते जो गांव के बैठकों में ठहाके बटोरने के काम आती थीं। एक दिन तो हद ही हो गयी। जगराम के लड़के ने रास्ते में मुझसे बंगळाहिन चाची (गाँव के मुस्लिम समाज की नाई की पत्नी, जो बंगाल से लाई गयीं थी) को गाली दिलवा दिया। मुझे क्या पता था कि उसका इतना गन्दा मतलब होता है। फिर आपने मुझे घर से दूर पापा और चाचा के पास भेज दिया। मात्र तीन साल का था मैं। मैंने कभी आपको बताया नही पर मैं कई दिनों तक छुप-छुप कर रोता रहा था। आखिर पापा मम्मी तो नहीं हो सकते न। पता है ? जब सप्ताह के अंत में पापा आपके पास गाँव जाते थे, तब चाचा मुझे कमरे में बंद करके घूमने चले जाते थे। पूरी रात के लिए…और मैं रोता रहता था कमरे के अंदर। जिंदगी और मौत से जूझते एक लैंप के उजाले में। डरता था मैं उस कमरे में…जब भूतों की कहानियां याद आती थीं। डर से रोता, चिल्लाता था और फिर थक कर सो जाता था। भूखे पेट। सबसे ज्यादा डर तो तब लगता था, जब मैं बंद दरवाजे के नीचे जमीन और लकड़ी के बीच के चीर को देखता था। मुझे हमेशा लगता था कि उसी चीरे से सांप आएगा। सांप मुझे न काट पाए इसके लिए मैं बेड से नीचे पांव नहीं रखता था। मुझे पता है कि आप भी मेरे लिए रोती थी घर पर। मुझे संस्कारी और सफल बनाने के लिए ही आप यह सब कर रही थी। आपके इस निर्माण में मेरे बचपन का विनाश हो गया माँ। आज चाहते हुए भी मैं ‘मिसिंग चाइल्डहुड’ नही लिख पा रहा हूँ। मैं जब भी अपने बचपन के बारे में सोचता हूँ तो आप मुझे विलेन लगती हैं। आपसे अच्छी तो आंटी थी। मुझे अपने दोस्त की तरह रखती थीं वो। शायद इसीलिए मैं उनसे इतना प्यार करता हूँ। मैं जानता हूँ कि जब कभी आप इसे पढ़ोगी तो आपको  दुःख होगा पर ये सच माँ। मेरा बचपन मरुभूमि में उगे नागफनी सा है और उसका साफ़ प्रभाव मेरे व्यक्तित्व पर दिखता है। उसे मैं चाह कर भी भुला नहीं सकता। जब कभी मैं दुनियादारी से बेफिकर होकर बच्चों को खेलते देखता हूँ तो मेरे आँखों में आंसू आ जाते हैं। आप दुनिया की सबसे अच्छी माँ हो और मुझे फख्र है कि मैंने आपके कोख से जन्म लिया। यह बात सिर्फ इसलिए नहीं कह रहा कि आप मेरी माँ हो बल्कि उसके पीछे कारण हैं। इस दुनिया में आपके लिए मुझसे बढ़कर कुछ नही और मेरे लिए आपसे बढ़कर कुछ नही पर जाने-अनजाने मेरा बचपन आपके हाथों नष्ट हुआ है और यह मैं कहूंगा। हाँ, मुझे इस बात का बराबर अफ़सोस है कि मैं आपकी आकांक्षाओं पर खरा नही उतर पाया। आपके स्वर्णिम जीवन इतिहास में मेरा वजूद लडे बिना हार मान लेने योद्धा सा है।

    Tuesday, October 11, 2016

    ...लो आज जान ही लो, क्या है तालिबानी आदेश

    सितंबर 1996 में काबुल में सोवियत सेना पर विजय के बाद तालिबान ने काबुल में पर्चे बंटवाए।  जो सन्देश पर्चे में लिखा था थी, वही सन्देश रेडियो और सड़कों पर आहिस्ता दौड़ते टोयोटा ट्रकों के ऊपर बंधे लाउडस्पीकर से भी सुनाई दे रहा था।  गौर से पढ़िए इन संदेशों को।  इन्ही को दुनिया तालिबानी आदेश के नाम से जानती है -

    ( ध्यान से पढ़िएगा )
    हमारा वतन अब इस्लामिक अफगान अमीरात के नाम से जाना जाएगा। ये वे नियम हैं जिन्हें हम लागू करेंगे और आप लोग उसका पालन करेंगे-


    1. सभी नागरिकों को दिन में पांच बार नमाज़ अदा करना होगा। अगर नमाज़ के वक्त आप कोई और काम करते पकडे जाते हैं तो आपकी पिटाई  होनी तय है।   
    2. सभी मर्दों को अपनी दाढ़ी बढ़ानी होगी। दाढ़ी की सही नाप ठुड्डी से एक बंधी मुट्ठी के बराबर माना जाएगा।  अगर ऐसा नहीं करोगे तो पीटे जाओगे। 
    3. सभी लड़के पगड़ी बांधेंगे। एक से लेकर छठवीं जमात तक के बच्चे काली पगड़ी बांधेंगे। इससे ऊपर जमात में पढ़ने वाले लड़के सफ़ेद पगड़ी बांधेंगे। लड़कों को इस्लामिक कपडे पहनने होंगे। कुर्ते के बटन  हमेशा बंद रहना चाहिए। 
    4. आज से संगीत प्रतिबंधित किया जाता है। 
    5. नृत्य भी  प्रतिबंधित  किया  जाता है। 
    6. ताश खेलना, शतरंज खेलना, जुआ खेलना और पतंग उड़ाना भी मना है। 
    7. किताबें लिखना, फिल्म देखना और चित्रकारी करना भी प्रतिबंधित है। 
    8. अगर तोता या कोई अन्य पक्षी पालोगे, तो पीटे जाओगे।  जिस पक्षी को  पालोगे  उसे  मौत  के घाट उतार दिया जाएगा।  
    9. अगर चोरी करोगे तो कलाई सहित हाथ काट लिए जायेंगे। अगर दोबारा चोरी करोगे तो पैर  भी काट डाले जायेंगे। 
    10. अगर तुम मुस्लिम नही हो तो तुम ऐसी किसी भी जगह पूजा नहीं कर सकते जहाँ तुम्हे कोई मसलमान देख सकता हो। अगर ऐसा हुआ तो जेल की हवा खाओगे। पिटाई होगी सो अलग से। अगर तुम किसी मुस्लिम को अपने धर्म में परिवर्तित करते हुए पकडे जाओगे तो फांसी पर चढ़ा दिया जायेगा।

    महिलाओं का उद्धार करता एक तालिब 
















    महिलाएं (ख़वातीन) ध्यान दें-


    1. तुम लोग हमेशा अपने घर के अंदर रहोगी। महिलाओं का सड़कों पर निरुद्देश्य घूमना कतई  सही नही है। अगर तुम बाहर जाती हो तो तुम्हारे साथ कोई महरम (पुरुष संबंधी) होना चाहिए। अगर तुम सड़कों पर अकेली घुमते मिली तो पीटकर घर भेज जायेगा।
    2. किसी भी हालात में तुम अपना चेहरा नहीं दिखाओगी। तुम जब घर से भी बहार निकलोगी तो तुम्हे बुर्का पहनना होगा। अगर ऐसा नहीं करोगी तो पिटाई होगी। 
    3. कॉस्मेटिक का प्रयोग  प्रतिबंधित  है। 
    4. आभूषण पहनना भी मना है। 
    5. महिलाएं भड़कीले और चमकीले  कपडे नही पहनेंगी।   
    6. तुम तब तक नही बोलोगी जब तक कि बोलने के लिए कहा न जाए।  
    7. कुछ भी हो जाए तुम कभी भी मर्दों से आँख  नहीं मिलाओगी। 
    8. सार्वजनिक जगहों पर तुम्हारा हंसना  सख्त मना है। अगर ऐसा करोगी तो पीटी जाओगी। 
    9. नाखून में नेल पॉलिश नहीं लगाना है। अगर किसी के नाखून में नेल पॉलिश लगा मिला तो वह अपनी अंगुली से हाथ धो बैठेगा। 
    10. लड़कियां का स्कूल जाना मना है। लड़कियों के सारे स्कूल जल्द ही बंद कर दिए जायेंगे। 
    11. महिलाएओं का घर से बाहर काम करना मना है। 
    12. अगर व्यभिचार या छिनालपन (Adultery)करती पकड़ी गयी तो पत्थर मार-मार के मौत के घात उतार दिया जायेगा। 
    सुनो। ध्यान से सुन लो।  अल्लाह हो अकबर।

    क्या अफगानिस्तान के बारे में और अधिक जानने की इच्छा है? यदि हाँ तो कॉमेंट बॉक्स में 'YES' लिखें। अफगानिस्तान के बारे में आपको रोचक जानकारियों से अवगत कराया जायेगा।
     

    Tuesday, September 13, 2016

    जेएनयू अध्यक्ष कॉमरेड मोहित के नाम खुला पत्र

    आदरणीय कॉमरेड मोहित पाण्डेय जी,
    जानकर हर्ष हुआ कि आप उसी विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हैं जहाँ मैं अभी पढ़ रहा हूँ। यानि आप मेरे अग्रज हुए। अपनी संस्कृति (जिसे आप मनुवादी कहते हैं) के अनुसार चूँकि हम अपने से बड़ों को प्रणाम करके उनका अभिवादन करते हैं, मन कर रहा है कि आपको प्रणाम करूँ।  पर डर लगता है कि कहीं आप मुझे ब्राह्मणवादी या मनुवादी न ठहरा दें...। फिर कैसे आपका अभिवादन करूँ ? मुझे पता है.., आपको 'लाल सलाम' पसंद आएगा।  पर लाल सलाम पेश करने वालों ने देश-दुनिया में जो कुछ किया है उससे मेरा मन विचलित हो जाता है।  मुझे लगता है कि जिस दिन इस लाल सलाम के नारे में दुनिया के करोड़ों बेगुनाह लोगों के खून की सड़ांध आपके नथुनों तक पहुंचेगी, इस्तेकबाल करने वाले ये लफ्ज़ आपको माँ-बहन की गाली से बढ़कर लगने लगेंगे।  ऐसा मैं हरगिज़ नहीं चाहूंगा। आपका अज़नबी अनुज होने के साथ-साथ मैं उस विद्यार्थी परिषद् का सदस्य भी रहा हूँ जिसकी आपने जेएनयू से अर्थी निकाल दी। मैंने आपके अध्यक्षीय चुनावी भाषण को सुना है। उसमें आपने कहा था कि जेएनयू ही देश में असली प्रतिपक्ष है। यानि आप विपक्ष की महत्ता को मानते हैं।परंतु पता नहीं क्यों आप लोगों को अपने विश्वविद्यालय में प्रतिपक्ष की मौजूदगी नहीं बर्दाश्त हो रही। असल में मानव अधिकार, प्रतिपक्ष, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यहाँ तक की लोकतंत्र...। आप लोगों के मुंह से ये सारी बातें केवल नारों में अच्छा लगता है। आप जिस विचारधारा के झंडाबरदार बने हैं, उसने पूरी दुनिया में इन मूल्यों के साथ कैसा बलात्कार किया है, यह बात किसी से छुपी नहीं है। खैर, आपके अर्थी निकालने या पुतला दहन करने से विद्यार्थी परिषद् का अस्तित्व नहीं खत्म हो जाता। हमारा बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत इस बात का गवाह है कि जेएनयू से हम जाने वाले नहीं, अपितु हम आने वाले हैं। आप और आपके लोगों का यह घिनौना कृत्य आपकी 'खोखली और मृतप्राय' होती विचारधारा का संकेत है। हाँ, खोखली और मृतप्राय...। इन्ही दो शब्दों से काम चला रहा हूँ। आपकी जमात के विद्वानों ने असहिष्णुता की परिभाषा देते हुए इसका मतलब बताया था - किसी दूसरे के विचारों को न सुनना।  आपकी परिभाषा के अनुसार कायदे से आपको 'असहिष्णु' कहना चाहिए। परंतु सहिष्णुता और असहिष्णुता का  सर्टीफिकेट बाँटने वाली एजेंसियों पर भी तो आपके कुनबे का ही एकाधिकार है।

    माखनलाल विवि से पढ़े हैं पंडित जी

    बहरहाल, आप और आपके संगठन को जीत की हार्दिक शुभकामनाएं। कहते हैं सफलता अपने साथ नई जिम्मेदारियां लेकर आती है। इस जीत के बाद आपकी जिम्मेदारियां भी बढ़ीं हैं। बड़े दुर्भाग्य की बात है, आप के संगठन से देशप्रेमियों को कोई उम्मीद नहीं रह गयी है। आपके ऊपर सबसे बड़ी जिम्मेदारी है उस मर गई उम्मीद को दोबारा जिन्दा करना।  आपका अनुज होने के नाते आपसे कुछ शिकायतें हैं, कुछ सलाह, तो कुछ सवाल भी।  उम्मीद है आप मेरी
     बातों पर जरूर गौर करेंगे-




    • उम्मीद है कि आपके कार्यकाल के दौरान 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के नारों से जेएनयू परिसर नहीं गूंजेगा। महोदय, आप सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाइए, हम आपके साथ हैं। आप कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में मानवाधिकारों के हनन और उन पर हो रही ज्यादतियों पर आवाज़ उठाइए, हम आपके साथ हैं।  आपको #ऑक्यूपाई यूजीसी जैसा कोई और आंदोलन चलाना होगा तो हमको जरूर बुलाइयेगा। मैं क्या, देश का अधिकतर नौजवान आपके साथ खड़ा मिलेगा।  पर बड़े भाई ! बड़ा दर्द होता है... जब आप लोग देश को तोड़ने की बात करते हो। 1 रूपये की माचिस पर भी टैक्स देकर देश को समर्थ बनाने में लगे हम लोग देश के टुकड़े होने की बात नहीं सुन सकते।  
    • भैया, ये मनुवाद-मनुवाद का खेल खेलना बंद कर दीजिये।  मनुवाद के नाम पर गुमराह मत कीजिये देश के नौजवानों को।  हमने आज तक कभी मनुस्मृति को अपनी आँखों से देखा नहीं है, छूने की बात तो छोड़ ही दीजिये।  दिल पर हाथ रखके बताइयेगा, जेएनयू आने से पहले मनुस्मृति को कभी पढ़ा था आपने? जिस मनुस्मृति को हमने देखा नहीं, छुआ नहीं, उसको जलाकर, उसका नाम बार-बार उछालकर आप लोग क्या साबित करना चाहते हो ?
    • ये जो लाल और नीले रंग (लाल-वामपंथ, नीला-आंबेडकरवाद) को एक करने की योजना आप लोग बना रहे हैं, उससे आप लोगों का राजनीतिक हित तो सध जायेगा, पर इस देश का बड़ा नुकसान हो जाएगा। हम मानते हैं कि हमारी वर्ण व्यवस्था में समय के साथ खामियां आ गयी थीं। आज हम उनसे लगातार लड़ रहे हैं और वो धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं । दलितों में बदले की भावना भड़काकर उन्हें हमसे लड़ाइए मत। अपने इस 'वर्ग संघर्ष' की संकल्पना में थोड़ा बदलाव कीजिए।  
    • जेएनयू से आप लोग समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर आंदोलन, सभा, गोष्ठी वगैरह करते रहते हैं। अवाम पर हो रहे जुल्मों-शितम की आवाज़ को बुलंद करते रहे हैं। फलस्तीनियों के लिए आप लोगों का प्यार जग-जाहिर है; होना भी चाहिए। पर कभी बेचारे तिब्बतियों, बलूचों, पाकिस्तानी हिंदुओं, यूक्रेनियों और कुर्दों का भी हाल-चाल ले लीजिए। 
    • कश्मीरियों के दर्द को आप के जमात के लोग अपना दर्द समझते रहे  हैं, एक नज़र अभागे कश्मीरी पंडितों पर भी डाल दीजिये।  आप के भाई लोगों ने तो उन गरीबों की ओर से मुंह मोड़ रखा है।  उम्मीद है आप उनके हकों-हुकूक की आवाज़ उठाएंगे।
    • जेएनयू में मुझ जैसे गरीब छात्र अपने माँ-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए बड़ी उम्मीद से पढ़ने आते हैं। आप से निवेदन है कि उन बेचारों का कैंपस प्लेसमेंट होने दें। हर छात्र आपकी तरह क्रन्तिकारी नहीं हो सकता। अपने विधारधारा के चक्की में उसे न पीसिए।
    • आप निर्भीक और नवाचारी लोग हैं। कृपया कभी संघ और विद्यार्थी परिषद्  के उन निर्दोष कार्यकर्ताओं की आवाज़ भी बनिए, जिन्हें केरल और पश्चिम बंगाल में आपके लोग सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार देते हैं क्योंकि उनकी विचारधारा आपसे मेल नहीं खाती।  
    • निवेदिता मेनन आपके धड़े की फायरब्रांड प्रोफेसर हैं। पता नहीं क्यों कभी-कभी मेरा मन कहता है कि 'प्रोफ़ेसर' शब्द को दोबारा परिभाषित करना चाहिए। उन तक मेरा सन्देश पहुंचाइएगा कि कश्मीर, अरुणाचल या देश का कोई अन्य भाग हमारे लिए महज़ एक जमीन का टुकड़ा नहीं है। उससे हमारी भावनाएं जुडी हैं।  हज़ारों वर्ष पुरानी अपनी संस्कृति और सभ्यता से उनसे हम गुंथे हुए हैं।  इस देश की एकता और अखण्डता के लिए देश के नौजवानों ने अपना बलिदान दिया है,जेएनयू में जनता के मोटे पैसों पर बैठकर जहर नहीं उगला है।  उन्हें कहियेगा की गलत तथ्य प्रस्तुत कर लोगों को गुमराह न करें।
                                                                       और हाँ, ये ग़लतफ़हमी कभी मत पालियेगा कि आपने जेएनयू को जीत लिया है। जेएनयू आपका अंतिम किला है जिसे आप लोग बस बचाने में सफल हो पाए हैं। सोचिये एक अकेला विद्यार्थी परिषद् आप लोगों के लिए इतना बड़ा खतरा हो गया कि आप लोगों को आपस में हाथ मिलाना पड़ा। क्या ये आपकी रणनीतिक और नैतिक हार नहीं ? वैसे, देश की जनता 9 फ़रवरी को इतनी जल्दी नहीं भूलने वाली। अतः संभलकर चलिए अब, नहीं तो केरल से भी हाथ धो बैठेंगे। फ़िलहाल आशा करते हैं, लोगों को लड़ाने की बजाय आप उनकी आवाज बनेंगे। 

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    Sunday, September 11, 2016

    ख़त लिखता हूँ

    मैं लेखक नहीं हूँ, और न ही मैं बनना चाहता हूँ. फिर भी मैं लिखूंगा, ऐसी कवितायेँ, जिनका कोई अर्थ न होगा। मैं लिखूंगा, ऐसी कहानियां , जिनकी कोई परिणति न होगी.. मैं ऐसी गजलें भी लिखूंगा, जिसमे न सुर होगा न ताल। मैं लिखूंगा और लगातार लिखूंगा... क्योंकि मुझे लेना है बदला, और चिढाना भी है, उस "मैं" को , जिसने किया है मेरे साथ भेदभाव.. मुझे, लेखकीय गुण न देकर..
    मैं लिखूंगा.. रातों में, बरसातों में, किसी सूनी सड़को पे, या किसी तैरते सपने पर.. मैं खोजूंगा, तन्हाइयों में खुद को, इस कलम से, उन शब्दों को .. जिसने उड़ाया था, मज़ाक मेरे "मैं" होने का.. मैं थिरकाउंगा, कीबोर्ड पर अपनी अँगुलियों को.. मैं सहलाउंगा, बिना अर्थो की अपनी रचनानाओं को.. हाँ जनता हूँ ना, ये भी नहीं छपेगी.. फिर भी मैं लिखूंगा, उन तमाम प्रेम पत्रों की तरह, जिनको हर बार मोड़कर छुपा देता हूँ, तकिये के लिहाफ़ में.. मैं लिखूंगा, क्योंकि उम्मीद है, शायद ये छपेंगी एक दिन, या मेरा खत पहुंचेगा, उस शख्स तक, जिसे बताना चाहता हूँ ढेर सारी बातें.. नहीं! मैं लेखक नहीं हूँ, क्योंकि मैं कविता नहीं खत लिखता हूँ..

    Friday, September 2, 2016

    ....क्योंकि रात हमारी है, काके !

    रात में जगना एक अलग अहसास देता है। रात में सोने वालों को शायद पता भी न हो कि वे सो कर कितना कुछ खो रहे हैं ? रात के आगोश में आप वो तमाम काम कर सकते हैं जो जालिम दिन का उजाला नहीं करने देता। रात में आप सोच सकते हैं। अपने घर के आराम बिस्तर पर सोती हुई उस लड़की के बारे में जिसके लिए आपने गलियों के चक्कर काटे, मोहल्ले के 'अच्छे लड़कों' वाली छोटी सी लिस्ट में से अपना नाम कटवाया। जिसके लिए कोचिंग की अपनी क्लास को छोड़कर रास्ते में अपनी साइकिल लगाए खडे रहे ताकि उस चांद का एक झलक पा सकें। हां, बिल्कुल ! रात में आप उस चांद से चेहरे को जी भर कर याद कर सकते हैं जिसके लिए आप रात-रात तक जागे हैं। इस उम्मीद में कि शायद उसका फोन आ जाए। आप उन यादों को ताजा कर सकते हैं जब पहली बार आप मिले थे उससे। गली के उस मोड़ पर, जिसके किनारे सरकारी गोदाम की जर्जर होती दीवार पर ‘देखो गधा मूत रहा है‘ लिखा होने के बावजूद पेट भर कर मूता करते थे । जैसे वे खुद को गधा मानने को तैयार न थे। या फिर लेखक की इस ज्यादती पर ‘पुरस्कार वापसी' सरीखा आन्दोलन चला रहे थे।
    साभार :www.pinterest.com
    याद कीजिए रोज नाक बिचका कर पार करने वाली उस जगह पर आप कैसे खडे थे। घण्टों.......। क्योंकि उस समय आपके साथ कोई था, जिसकी कमी आपको आज तक खलती है। इसी रात में आप उस मनहूस समय को भी याद कर सकते हैं जब आप ने उसकी मजबूरी समझे बिना उसको बेवफा से शुरू करके र’डी तक फकत गालियां दी थी आपने। उस गलती के लिए रात में आप अपने आप को गरिया सकते हैं, झपड़िया सकते हैं। आप कुछ भी कर सकते हैं। रात में । आप सुट्टा मारिए, या मेरी तरह नए हैं तो जेब से निकालिए कमला पसंद की वो पुड़िया।  जो आप एक बार खरीद कर पांच बार खाते हैं। निकालिए और फांका मार लीजिए, बिना इसके परवाह किए कि कोई आपको देख लेगा। स्पेशियली वो जो आपको आज-कल कनखियों से देखा करती है। रात अपना यार है। इसके आगोश में खता होने का कोई चांस नहीं है बाॅस।  आप खुलकर खेलिए। अपने आप से। दारू से। सिगरेट से। या फिर किसी हसीन लड़की के तस्वीर से। देखिए आप। वो फिल्में जिसे दिन में देखने पर लोग मुंह बिचकाते हैं। या फिर कोई और दिव्य क्रिया कीजिए। इस निपट अकेले में। अरे नहीं! यह अकेलापन नहीं। यही तो वह महफिल है जहां हमारी आपकी सुनी जाती है। रात की महफिल आपकी है। दिन की ? अमां मियां ! वो महफिल किसी की हो पर आपकी तो नहीं है। हर कोई अपना सुनाए जा रहा है। आपको सुनने में कौन दिलचस्पी रखता है। मित्र ! यह भी बढ़िया मजाक है। मित्रता के नाम पर दिखावा है। हर कोई अपनी सुनाना चाहता है। महफिल है आपके यादों की। यही वो समय है जब आप अपने आप से, अपने वजूद से मिल सकते हैं। नहीं, घबराइए मत। इस समय आपको टोकने वाला कोई नहीं होगा। 
    आप पढ़ सकते हैं तुलसीदास से लेकर खुशवंत सिंह और चेतन भगत तक। इंडिया टुडे से लेकर मनोहर कहानियां तक। आप निजात पाए रहेंगे, उस बिन मांगे सलाहों से जो पढ़ने में भी अच्छा बुरा का भेद करते हैं। आप सावरकर को भी पढ़िए और लावोस्की को भी। इस समय ऐसा कोई नहीं जो आपके हाथ में किसी किताब विशेष को देखकर राष्ट्रवादी या वामपंथी नामक बाजार में आई नई गालियों से नवाज दे। यही वो समय है जब आप मुक्त होकर सोच सकते हैं। आपके विचारों में डीटीसी बसों के हाॅर्न का शोर नहीं होगा। सड़क पर किसी बाइक के आगे आ जाने पर न ही कोई लट्ठमार कर्कश जट्ट आवाज  सुनाई देगी- ‘अबे भों*ड़ी ! अंधा है के।' 
    या फिर, लिखिए....। महबूब की यादें रूमानी। पहले सेक्स की कहानी। वो लड़की अंजानी। कोई फितरत पुरानी।  या लिखिए उस पल की डायरी, जब आपको लव लेटर का जवाब थप्पड़ से मिला था। या फिर बचपन वह डर लिखिए जब चाचा आपको अकेले कमरे में बन्द कर घूमने चले गए थे और आपको लग रहा था कि बस अभी सांप लकड़ी के पल्ले और दरवाजे के बीच उस पतली सी दरार से आएगा और आपको धर दबोचेगा। अरे! उस हालात के मारे गरीब चोर के आंखों की कहानी लिखो न। जो 50 किलो गेहूं चुराने पर चैराहे पर सरेआम पीटा गया था। आप चाहते हुए भी कुछ न कर पाए थे। 

    आप नाचो, गाओ, पढ़ो, लिखो, सोचो.....। आप हर वो काम करो जो दुनिया आपको दिन के रोशनी में नहीं करने देती। क्योंकि.... काके! रात हमारी है। सिर्फ हमारी। 

    और हाँ, आपको कैसा लगा ये पोस्ट ? नीचे बॉक्स में बता तो दीजिये। 

    Wednesday, August 31, 2016

    हमें तुम पर 'शर्म' है, ऐ रियो के बैरंगों !

    पूरे देश के साथ आप भी यह जानना चाहते होंगे कि रियो में हमारी इतनी बुरी दुर्गति क्यों हुई ? आप जानना चाहते होगें उन लोगों को, जो इस ट्रेजेडी के खलनायक हैं। शायद अपने फ्रेंड सर्किल में रियो पर डिस्कशन के दौरान उन इडियट्स को जी भर गालियां देने का प्लान भी बना रखा हो। खेलों में बुरे प्रदर्शन पर जब भी देश में बात होती है, तब सबसे आसान टारगेट होते हैं- खेल संगठनों को कब्जियाये राजनेता, खेल मंत्रालय के अफसर, उनकी लालफीताशाही की कहानियां व असहयोग आंदोलन से प्रभावित उनकी हरकतें। नीचे लिखे बिन्दु यह साबित करने के लिए काफी हैं कि इस बार चूक प्रशासनिक स्तर पर नहीं हुई है-


    • रियो ओलम्पिक की तैयारियों में कोई खोट न रह जाए और खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करें, इसके लिए खेल मंत्रालय ने टॉप्स यानी टारगेट ओलम्पिक पोडियम स्कीम नाम की एक विशेष समिति गठित की थी। प्रशासनिक गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अप्रैल से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक इस समिति की 54 बैठकें हुई।
    • इस समिति ने प्रत्येक खिलाड़ी से कहा था कि वे पूरे दुनिया में कहीं भी, किसी भी कोच से ट्रेनिंग ले सकते हैं। उसका पूरा खर्च मंत्रालय वहन करेगा। इसके लिए बाकायदा टॉप्स ने खिलाड़ियों से प्रपोजल मंगवाए थे।
    • ओलम्पिक के तैयारियों पर टॉप्स  ने पूरे 20 करोड़ रुपए खर्च किए।

    फिर कहां रह गई खोट ?

    खेल चाहे कोई भी हो उसमें हार-जीत का होना स्वभाविक पक्ष है। मगर इसके बावजूद कई खिलाड़ी ऐसे होते है जो भले ही जीत हासिल कर पाने में नाकाम रहें मगर अपने प्रदर्शन से सबको खुश होने का अवसर प्रदान करते है। इस बार हमारे पास ऐसे मौके बहुत कम आए। हमारी नाराजगी की स्वभाविक वजह यही है। ऐसा क्यों हुआ, इससे संबंधित कुछ तथ्य निम्न है, इससे आपको सारा मामला खुद ही समझ में आ जाएगा-

    84 प्रतिशत खिलाड़ी अपना पिछला सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने में भी नाकाम रहे-

    • ओलम्पिक में खेलना किसी भी खिलाड़ी के लिए एक सपने जैसा होता है, जहां वह अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ देने के लिए दिन-रात एक कर देता है। देश के लिए एक अदद तमगा जीतने के लिए खिलाड़ी अपना सर्वस्व दांव पर लगा देता है। क्या हमारे खिलाड़ियों ने ऐसा किया था ?
    • रियो ओलम्पिक टीम में कुल 117 खिलाडी थे। हाॅकी में महिला व पुरुष टीम में शामिल 32 खिलाड़ियों को छोड़ दें, तो बचे कुल 85 खिलाड़ी । इन 85 खिलाड़ियों में से मात्र 13  खिलाड़ी ही अपने वर्ल्ड रैकिंग के अनुरूप या उससे बेहतर प्रदर्शन कर पाए।
    • कुल 34 ट्रैक या फील्ड एथलीटों में से मात्र 4 ने ही अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। 
    • लांग जम्पर अंकित शर्मा महीने भर पहले बनाये अपने 8.19 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्ड से आधा मीटर कम कूद पाए।
    • मेडल के प्रबल दावेदार टेबल टेनिस खिलाड़ी सौम्यजीत घोष वर्ल्ड रैकिंग में अपने से 126 पायदान नीचे के खिलाड़ी से हार गए।
    • वर्ल्ड रैकिंग में 72वें स्थान एक मात्र भारतीय जुडो खिलाड़ी अवतार सिंह 91वें पायदान के खिलाड़ी से हार गए।

    ....तो हमारे खाते में होता एक और सिल्वर मेडल
    48 किलोग्राम भारवर्ग में वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने रियो ओलम्पिक से दो माह पहले पटियाला में सेलेक्शन ट्रायल्स के दौरान 192 किलोग्राम भार उठाकर नेशनल रिकॉर्ड कायम किया था। ओलम्पिक में वे मात्र 82 किग्रा उठा पायीं। 192 किग्रा भार उठाकर इंडोनेशियाई खिलाड़ी वहयूनी अगस्टिएनी ने रजत पदक अपने नाम कर लिया


    पैसा ठूंसो, रियो जाओ, सेल्फी लो.....पर अपने परिवार के साथ 

    रियो गए अनाड़ी जब देश की भद् पिटवा रहे थे, तब विवादित लेखिका शोभा डे ने ट्विट किया था-"रियो जाओ, सेल्फी लो और घर वापस लौट आओ।" 
    तब उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई थी। जरा देखिए, कैसी-कैसी उच्च कोटि की धार्मिक गलियां मिलीं थीं उनको-





    मुझे नहीं पता आप उनके बयान से कितना इत्तफाक रखते हैं। नीचे लिखे तथ्यों को गौर से पढ़िए, आपको उनकी बातें बहुत हद तक सही लगने लगेंगी। हां, यह सही है कि उनकी भाषा से लोगों को एतराज हो सकता है ।

    • डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया पिछले 2 साल से चोटिल चल रहीं थीं। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर राजस्थान विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। 22 मई को हुई टॉप्स कमेटी की मीटिंग बताती है कि अप्रैल में वो फिर से अपने फॉर्म में वापस लौट आई। टॉप्स स्कीम के तहत अमेरिका में अपने पति व कोच विजेन्दर सिंह के साथ ट्रेनिंग के लिए उन्होंने टॉप्स से 40 लाख रुपए मांगे। उन्हें रुपए दिए गए पर वे ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाईं
    • शूटिंग में हीना सिधू अपने पति, कोच व शूटिंग दल के प्रबंधक रौनक पंडित के साथ रियो गईं। उन्होंने तैयारियों के लिए सरकार से 1 करोड़ रुपए लिए। यह अलग बात है कि वे इतने मंहगे ट्रेनिंग के बाद भी वे फाइनल तक नहीं पहुंच पाईं। वे 10 मी. व 25 मी. श्रेणी में क्रमशः 14वें व 18वें स्थान पर रहीं।
    • ओलम्पिक के लगभग 50 दिन पहले सानिया मिर्जा की डबल्स पार्टनर प्रार्थना थाम्बरे ने साई से 60 लाख रुपए और मांगे, जबकि उनको 30 लाख रुपया मिल चुका था।
    • सानिया मिर्जा अपने मां ( टेनिस टीम की मैनजर) को रियो ले गईं।
    • डिस्कस थ्रोअर विकास गौड़ कोच के बदले अपने पिता शिव को अपने साथ रियो ले गए।
    • डिस्कस थ्रोअर सीमा अतिल अपने पति अंकुश को कोच के रूप में रियो ले गईं।
    • गोल्फर अदिति अशोक अपने पिता को कैडी के रूप में रियो ले गए।
    • रेस वॉकर सपना पूनिया और शॉट पुटर मनप्रीत कौर अपने-अपने पति को ट्रेनिंग के लिए पोलैंड अपने साथ ले गईं। सरकार ने दोनों का पूरा खर्च उठाया।

    ......और बोलते रहे झूठ

    कभी साई से अधिक पैसे ठूंसने के लिए, तो कभी अपनी असफलता को छिपाने के लिए खिलाड़ी लगातार झूठ बोलते रहे।

    1. रियो का महाकुंभ शुरू होने के लगभग 15 दिन पहले तेज धावक दुती चंद ने खुले-आम कहा कि उनके पास जूते खरीदने तक के लिए पैसे नहीं हैं, जबकि टॉप्स के तहत उन्हें पहले ही 30 लाख रुपए मिल चुके थे। उसके बाद भी साई ने जूतों के लिए अलग से 2 लाख रुपए दिए।
    2. फिनिशिंग लाइन पर दौड़ते-दौड़ते गिर जाने के बाद सुखिर्यों में आईं मैराथन धावक ओ पी जैसा ने आरोप लगाया कि भारतीय दल ने उनके लिए पानी तक की व्यवस्था नहीं की थी, इसलिए ऐसा हुआ। रियो आयोजन समिति ने बाकायदा बयान जारी कर बताया कि पूरे 42 किमी के रास्ते में शुरूआत और अंत को छोड़कर 14 पानी के स्टॉल लगाए गए थे। उनकी साथी धावक कविता रावत और कोच ने भी उनके आरोप को झूठा बताया है।

             ये हैं गुदड़ी की ललियां - 

          अब उनकी कहानी जिन्होने देश का नाक कटने से बचाया-

    पीवी संधु- टॉप्स से मात्र 44 लाख मांगे। देश में ही ट्रेनिंग हासिल की। सिल्वर मेडल जीत देश का मान रखा।

    संधू का खेल देखने लायक था 

    साक्षी मलिक- इस हरियाणवी छोरी को तैयारियों के लिए मात्र 12 लाख रुपए पर्याप्त लगे। देश में ही प्रशिक्षण प्राप्त किया।

    और लास्ट बट नॉट द लीस्ट, दीपा करमाकर- देश की इस बेटी ने मेडल तो नहीं जिता मगर दिल सबका जीता है। 
    दीपा को रियो की तैयारियों के लिए मात्र दो लाख रुपयों की जरूरत पड़ी।
    सवाल ये नहीं है कि किसने कितने पैसे मांगे ? या अपने साथ किसको ले गए ? सवाल यह है कि इन सब के बाद उन्होंने रिजल्ट क्या दिया ? ध्यान रहे रिजल्ट केवल मेडल नहीं होते। रिजल्ट दिया है करमाकर ने, संधु ने। उन्होंने रियो में जो किया वो हमारे लिए कई गोल्ड से बढ़कर है। 
    अब सवाल यह उठता है कि- 

    • क्या देश में योग्य खिलाडियों की कमी है ? या उन्ही खिलाडियों को आगे बढाया जाता है जो खेल अधिकारी व नेताओं के करीब हैं ? 
    • क्या नरसिंह यादव का रिओ में न खेल पाने की वजह आपसी कलह और राजनीति थी ?
    • महिला खिलाडियों के कोच बने उनके पति क्या कोच बनने का काबीलियत रखते हैं ?
    • क्या पूर्व खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल के असम चुनावों में व्यस्त रहने के कारण रिओ तैयारियों पर गलत असर पड़ा ?
    • जहाँ अधिकतर खिलाडियों को 40 से 50 लाख के आस-पास रूपये मिले वहीँ, हीना सिद्धू को 1 करोड़ कैसे मिल गए ?



    इस पोस्ट में आपने ध्यान दिया होगा, बहुत सारे खिलाड़ियों के पति, मां या पिता ही कोच, प्रबंधक और न जाने क्या-क्या है। अगला पोस्ट खेल में पनप रहे इस परिवारवाद के पड़-ताल पर ही केंद्रित होगा।