आदरणीय कॉमरेड मोहित पाण्डेय जी,
जानकर हर्ष हुआ कि आप उसी विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हैं जहाँ मैं अभी पढ़ रहा हूँ। यानि आप मेरे अग्रज हुए। अपनी संस्कृति (जिसे आप मनुवादी कहते हैं) के अनुसार चूँकि हम अपने से बड़ों को प्रणाम करके उनका अभिवादन करते हैं, मन कर रहा है कि आपको प्रणाम करूँ। पर डर लगता है कि कहीं आप मुझे ब्राह्मणवादी या मनुवादी न ठहरा दें...। फिर कैसे आपका अभिवादन करूँ ? मुझे पता है.., आपको 'लाल सलाम' पसंद आएगा। पर लाल सलाम पेश करने वालों ने देश-दुनिया में जो कुछ किया है उससे मेरा मन विचलित हो जाता है। मुझे लगता है कि जिस दिन इस लाल सलाम के नारे में दुनिया के करोड़ों बेगुनाह लोगों के खून की सड़ांध आपके नथुनों तक पहुंचेगी, इस्तेकबाल करने वाले ये लफ्ज़ आपको माँ-बहन की गाली से बढ़कर लगने लगेंगे। ऐसा मैं हरगिज़ नहीं चाहूंगा। आपका अज़नबी अनुज होने के साथ-साथ मैं उस विद्यार्थी परिषद् का सदस्य भी रहा हूँ जिसकी आपने जेएनयू से अर्थी निकाल दी। मैंने आपके अध्यक्षीय चुनावी भाषण को सुना है। उसमें आपने कहा था कि जेएनयू ही देश में असली प्रतिपक्ष है। यानि आप विपक्ष की महत्ता को मानते हैं।परंतु पता नहीं क्यों आप लोगों को अपने विश्वविद्यालय में प्रतिपक्ष की मौजूदगी नहीं बर्दाश्त हो रही। असल में मानव अधिकार, प्रतिपक्ष, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यहाँ तक की लोकतंत्र...। आप लोगों के मुंह से ये सारी बातें केवल नारों में अच्छा लगता है। आप जिस विचारधारा के झंडाबरदार बने हैं, उसने पूरी दुनिया में इन मूल्यों के साथ कैसा बलात्कार किया है, यह बात किसी से छुपी नहीं है। खैर, आपके अर्थी निकालने या पुतला दहन करने से विद्यार्थी परिषद् का अस्तित्व नहीं खत्म हो जाता। हमारा बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत इस बात का गवाह है कि जेएनयू से हम जाने वाले नहीं, अपितु हम आने वाले हैं। आप और आपके लोगों का यह घिनौना कृत्य आपकी 'खोखली और मृतप्राय' होती विचारधारा का संकेत है। हाँ, खोखली और मृतप्राय...। इन्ही दो शब्दों से काम चला रहा हूँ। आपकी जमात के विद्वानों ने असहिष्णुता की परिभाषा देते हुए इसका मतलब बताया था - किसी दूसरे के विचारों को न सुनना। आपकी परिभाषा के अनुसार कायदे से आपको 'असहिष्णु' कहना चाहिए। परंतु सहिष्णुता और असहिष्णुता का सर्टीफिकेट बाँटने वाली एजेंसियों पर भी तो आपके कुनबे का ही एकाधिकार है।
बहरहाल, आप और आपके संगठन को जीत की हार्दिक शुभकामनाएं। कहते हैं सफलता अपने साथ नई जिम्मेदारियां लेकर आती है। इस जीत के बाद आपकी जिम्मेदारियां भी बढ़ीं हैं। बड़े दुर्भाग्य की बात है, आप के संगठन से देशप्रेमियों को कोई उम्मीद नहीं रह गयी है। आपके ऊपर सबसे बड़ी जिम्मेदारी है उस मर गई उम्मीद को दोबारा जिन्दा करना। आपका अनुज होने के नाते आपसे कुछ शिकायतें हैं, कुछ सलाह, तो कुछ सवाल भी। उम्मीद है आप मेरी बातों पर जरूर गौर करेंगे-
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जानकर हर्ष हुआ कि आप उसी विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हैं जहाँ मैं अभी पढ़ रहा हूँ। यानि आप मेरे अग्रज हुए। अपनी संस्कृति (जिसे आप मनुवादी कहते हैं) के अनुसार चूँकि हम अपने से बड़ों को प्रणाम करके उनका अभिवादन करते हैं, मन कर रहा है कि आपको प्रणाम करूँ। पर डर लगता है कि कहीं आप मुझे ब्राह्मणवादी या मनुवादी न ठहरा दें...। फिर कैसे आपका अभिवादन करूँ ? मुझे पता है.., आपको 'लाल सलाम' पसंद आएगा। पर लाल सलाम पेश करने वालों ने देश-दुनिया में जो कुछ किया है उससे मेरा मन विचलित हो जाता है। मुझे लगता है कि जिस दिन इस लाल सलाम के नारे में दुनिया के करोड़ों बेगुनाह लोगों के खून की सड़ांध आपके नथुनों तक पहुंचेगी, इस्तेकबाल करने वाले ये लफ्ज़ आपको माँ-बहन की गाली से बढ़कर लगने लगेंगे। ऐसा मैं हरगिज़ नहीं चाहूंगा। आपका अज़नबी अनुज होने के साथ-साथ मैं उस विद्यार्थी परिषद् का सदस्य भी रहा हूँ जिसकी आपने जेएनयू से अर्थी निकाल दी। मैंने आपके अध्यक्षीय चुनावी भाषण को सुना है। उसमें आपने कहा था कि जेएनयू ही देश में असली प्रतिपक्ष है। यानि आप विपक्ष की महत्ता को मानते हैं।परंतु पता नहीं क्यों आप लोगों को अपने विश्वविद्यालय में प्रतिपक्ष की मौजूदगी नहीं बर्दाश्त हो रही। असल में मानव अधिकार, प्रतिपक्ष, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यहाँ तक की लोकतंत्र...। आप लोगों के मुंह से ये सारी बातें केवल नारों में अच्छा लगता है। आप जिस विचारधारा के झंडाबरदार बने हैं, उसने पूरी दुनिया में इन मूल्यों के साथ कैसा बलात्कार किया है, यह बात किसी से छुपी नहीं है। खैर, आपके अर्थी निकालने या पुतला दहन करने से विद्यार्थी परिषद् का अस्तित्व नहीं खत्म हो जाता। हमारा बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत इस बात का गवाह है कि जेएनयू से हम जाने वाले नहीं, अपितु हम आने वाले हैं। आप और आपके लोगों का यह घिनौना कृत्य आपकी 'खोखली और मृतप्राय' होती विचारधारा का संकेत है। हाँ, खोखली और मृतप्राय...। इन्ही दो शब्दों से काम चला रहा हूँ। आपकी जमात के विद्वानों ने असहिष्णुता की परिभाषा देते हुए इसका मतलब बताया था - किसी दूसरे के विचारों को न सुनना। आपकी परिभाषा के अनुसार कायदे से आपको 'असहिष्णु' कहना चाहिए। परंतु सहिष्णुता और असहिष्णुता का सर्टीफिकेट बाँटने वाली एजेंसियों पर भी तो आपके कुनबे का ही एकाधिकार है।
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माखनलाल विवि से पढ़े हैं पंडित जी |
- उम्मीद है कि आपके कार्यकाल के दौरान 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के नारों से जेएनयू परिसर नहीं गूंजेगा। महोदय, आप सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाइए, हम आपके साथ हैं। आप कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में मानवाधिकारों के हनन और उन पर हो रही ज्यादतियों पर आवाज़ उठाइए, हम आपके साथ हैं। आपको #ऑक्यूपाई यूजीसी जैसा कोई और आंदोलन चलाना होगा तो हमको जरूर बुलाइयेगा। मैं क्या, देश का अधिकतर नौजवान आपके साथ खड़ा मिलेगा। पर बड़े भाई ! बड़ा दर्द होता है... जब आप लोग देश को तोड़ने की बात करते हो। 1 रूपये की माचिस पर भी टैक्स देकर देश को समर्थ बनाने में लगे हम लोग देश के टुकड़े होने की बात नहीं सुन सकते।
- भैया, ये मनुवाद-मनुवाद का खेल खेलना बंद कर दीजिये। मनुवाद के नाम पर गुमराह मत कीजिये देश के नौजवानों को। हमने आज तक कभी मनुस्मृति को अपनी आँखों से देखा नहीं है, छूने की बात तो छोड़ ही दीजिये। दिल पर हाथ रखके बताइयेगा, जेएनयू आने से पहले मनुस्मृति को कभी पढ़ा था आपने? जिस मनुस्मृति को हमने देखा नहीं, छुआ नहीं, उसको जलाकर, उसका नाम बार-बार उछालकर आप लोग क्या साबित करना चाहते हो ?
- ये जो लाल और नीले रंग (लाल-वामपंथ, नीला-आंबेडकरवाद) को एक करने की योजना आप लोग बना रहे हैं, उससे आप लोगों का राजनीतिक हित तो सध जायेगा, पर इस देश का बड़ा नुकसान हो जाएगा। हम मानते हैं कि हमारी वर्ण व्यवस्था में समय के साथ खामियां आ गयी थीं। आज हम उनसे लगातार लड़ रहे हैं और वो धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं । दलितों में बदले की भावना भड़काकर उन्हें हमसे लड़ाइए मत। अपने इस 'वर्ग संघर्ष' की संकल्पना में थोड़ा बदलाव कीजिए।
- जेएनयू से आप लोग समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर आंदोलन, सभा, गोष्ठी वगैरह करते रहते हैं। अवाम पर हो रहे जुल्मों-शितम की आवाज़ को बुलंद करते रहे हैं। फलस्तीनियों के लिए आप लोगों का प्यार जग-जाहिर है; होना भी चाहिए। पर कभी बेचारे तिब्बतियों, बलूचों, पाकिस्तानी हिंदुओं, यूक्रेनियों और कुर्दों का भी हाल-चाल ले लीजिए।
- कश्मीरियों के दर्द को आप के जमात के लोग अपना दर्द समझते रहे हैं, एक नज़र अभागे कश्मीरी पंडितों पर भी डाल दीजिये। आप के भाई लोगों ने तो उन गरीबों की ओर से मुंह मोड़ रखा है। उम्मीद है आप उनके हकों-हुकूक की आवाज़ उठाएंगे।
- जेएनयू में मुझ जैसे गरीब छात्र अपने माँ-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए बड़ी उम्मीद से पढ़ने आते हैं। आप से निवेदन है कि उन बेचारों का कैंपस प्लेसमेंट होने दें। हर छात्र आपकी तरह क्रन्तिकारी नहीं हो सकता। अपने विधारधारा के चक्की में उसे न पीसिए।
- आप निर्भीक और नवाचारी लोग हैं। कृपया कभी संघ और विद्यार्थी परिषद् के उन निर्दोष कार्यकर्ताओं की आवाज़ भी बनिए, जिन्हें केरल और पश्चिम बंगाल में आपके लोग सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार देते हैं क्योंकि उनकी विचारधारा आपसे मेल नहीं खाती।
- निवेदिता मेनन आपके धड़े की फायरब्रांड प्रोफेसर हैं। पता नहीं क्यों कभी-कभी मेरा मन कहता है कि 'प्रोफ़ेसर' शब्द को दोबारा परिभाषित करना चाहिए। उन तक मेरा सन्देश पहुंचाइएगा कि कश्मीर, अरुणाचल या देश का कोई अन्य भाग हमारे लिए महज़ एक जमीन का टुकड़ा नहीं है। उससे हमारी भावनाएं जुडी हैं। हज़ारों वर्ष पुरानी अपनी संस्कृति और सभ्यता से उनसे हम गुंथे हुए हैं। इस देश की एकता और अखण्डता के लिए देश के नौजवानों ने अपना बलिदान दिया है,जेएनयू में जनता के मोटे पैसों पर बैठकर जहर नहीं उगला है। उन्हें कहियेगा की गलत तथ्य प्रस्तुत कर लोगों को गुमराह न करें।
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उम््दा लेखन भाई ।। कोशिश जारी रखे ।।
ReplyDeleteशुक्रिया बंधु
Deleteये वामपंथ विचारधारा जैसे देश दुनिया से खत्म होती जा रही है उसे देख कर लगता है कि भारत में भी ये अपनी अंतिम सांसे गिन रही है। जिस तरह बुझता दिया बुझने से पहले तेज हो जाता है उसी तरह ये विचारधारा भी अब अपने पतन की राह पर है इनके गठजोड से यह बात साबित हो गई है कि यह विचारधारा भारत में अब अपनी अंतिम सांसे गिन रही है।
ReplyDeletejot bujne se pahle lo tej hoti he
ReplyDeleteएमसीयू से निकले पंडित जी,
ReplyDeleteशानदार मित्र बहुत उम्दा।
आभार मित्र. जुड़े रहिए.
Deleteउम्दा लेख श्री जी ये जेनयू गैंग इतने में सायद कान पे जू रेंगे गी ये नहीं लगता मुझे
ReplyDeleteये गैंग कुछ वक्त में कनैया को भी रस्ते से हटवा सकता है ताकि
इनको लोगो में त्रुस्टिकरं करने का मोका मिले ये कुछ
महीनो में संभव सायद हो भी सकता है
जहा तक में सोच रहा हु उष हिसाब से
और कलबुगी की ह्त्या का भी कही ना कही इनके तार जरूर जुड़े है ये बात अलग है की अभी
तक ये सामने नहीं आया सबूत