पूरे देश के साथ आप भी यह जानना चाहते होंगे कि रियो में हमारी इतनी बुरी दुर्गति क्यों हुई ? आप जानना चाहते होगें उन लोगों को, जो इस ट्रेजेडी के खलनायक हैं। शायद अपने फ्रेंड सर्किल में रियो पर डिस्कशन के दौरान उन इडियट्स को जी भर गालियां देने का प्लान भी बना रखा हो। खेलों में बुरे प्रदर्शन पर जब भी देश में बात होती है, तब सबसे आसान टारगेट होते हैं- खेल संगठनों को कब्जियाये राजनेता, खेल मंत्रालय के अफसर, उनकी लालफीताशाही की कहानियां व असहयोग आंदोलन से प्रभावित उनकी हरकतें। नीचे लिखे बिन्दु यह साबित करने के लिए काफी हैं कि इस बार चूक प्रशासनिक स्तर पर नहीं हुई है-
- रियो ओलम्पिक की तैयारियों में कोई खोट न रह जाए और खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करें, इसके लिए खेल मंत्रालय ने टॉप्स यानी टारगेट ओलम्पिक पोडियम स्कीम नाम की एक विशेष समिति गठित की थी। प्रशासनिक गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अप्रैल से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक इस समिति की 54 बैठकें हुई।
- इस समिति ने प्रत्येक खिलाड़ी से कहा था कि वे पूरे दुनिया में कहीं भी, किसी भी कोच से ट्रेनिंग ले सकते हैं। उसका पूरा खर्च मंत्रालय वहन करेगा। इसके लिए बाकायदा टॉप्स ने खिलाड़ियों से प्रपोजल मंगवाए थे।
- ओलम्पिक के तैयारियों पर टॉप्स ने पूरे 20 करोड़ रुपए खर्च किए।
फिर कहां रह गई खोट ?
खेल चाहे कोई भी हो उसमें हार-जीत का होना स्वभाविक पक्ष है। मगर इसके बावजूद कई खिलाड़ी ऐसे होते है जो भले ही जीत हासिल कर पाने में नाकाम रहें मगर अपने प्रदर्शन से सबको खुश होने का अवसर प्रदान करते है। इस बार हमारे पास ऐसे मौके बहुत कम आए। हमारी नाराजगी की स्वभाविक वजह यही है। ऐसा क्यों हुआ, इससे संबंधित कुछ तथ्य निम्न है, इससे आपको सारा मामला खुद ही समझ में आ जाएगा-
84 प्रतिशत खिलाड़ी अपना पिछला सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने में भी नाकाम रहे-
- ओलम्पिक में खेलना किसी भी खिलाड़ी के लिए एक सपने जैसा होता है, जहां वह अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ देने के लिए दिन-रात एक कर देता है। देश के लिए एक अदद तमगा जीतने के लिए खिलाड़ी अपना सर्वस्व दांव पर लगा देता है। क्या हमारे खिलाड़ियों ने ऐसा किया था ?
- रियो ओलम्पिक टीम में कुल 117 खिलाडी थे। हाॅकी में महिला व पुरुष टीम में शामिल 32 खिलाड़ियों को छोड़ दें, तो बचे कुल 85 खिलाड़ी । इन 85 खिलाड़ियों में से मात्र 13 खिलाड़ी ही अपने वर्ल्ड रैकिंग के अनुरूप या उससे बेहतर प्रदर्शन कर पाए।
- कुल 34 ट्रैक या फील्ड एथलीटों में से मात्र 4 ने ही अपना सर्वश्रेष्ठ दिया।
- लांग जम्पर अंकित शर्मा महीने भर पहले बनाये अपने 8.19 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्ड से आधा मीटर कम कूद पाए।
- मेडल के प्रबल दावेदार टेबल टेनिस खिलाड़ी सौम्यजीत घोष वर्ल्ड रैकिंग में अपने से 126 पायदान नीचे के खिलाड़ी से हार गए।
- वर्ल्ड रैकिंग में 72वें स्थान एक मात्र भारतीय जुडो खिलाड़ी अवतार सिंह 91वें पायदान के खिलाड़ी से हार गए।
....तो हमारे खाते में होता एक और सिल्वर मेडल
48 किलोग्राम भारवर्ग में वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने रियो ओलम्पिक से दो माह पहले पटियाला में सेलेक्शन ट्रायल्स के दौरान 192 किलोग्राम भार उठाकर नेशनल रिकॉर्ड कायम किया था। ओलम्पिक में वे मात्र 82 किग्रा उठा पायीं। 192 किग्रा भार उठाकर इंडोनेशियाई खिलाड़ी वहयूनी अगस्टिएनी ने रजत पदक अपने नाम कर लिया।
पैसा ठूंसो, रियो जाओ, सेल्फी लो.....पर अपने परिवार के साथ
रियो गए अनाड़ी जब देश की भद् पिटवा रहे थे, तब विवादित लेखिका शोभा डे ने ट्विट किया था-"रियो जाओ, सेल्फी लो और घर वापस लौट आओ।"
तब उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई थी। जरा देखिए, कैसी-कैसी उच्च कोटि की धार्मिक गलियां मिलीं थीं उनको-
तब उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई थी। जरा देखिए, कैसी-कैसी उच्च कोटि की धार्मिक गलियां मिलीं थीं उनको-
मुझे नहीं पता आप उनके बयान से कितना इत्तफाक रखते हैं। नीचे लिखे तथ्यों को गौर से पढ़िए, आपको उनकी बातें बहुत हद तक सही लगने लगेंगी। हां, यह सही है कि उनकी भाषा से लोगों को एतराज हो सकता है ।
- डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया पिछले 2 साल से चोटिल चल रहीं थीं। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर राजस्थान विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। 22 मई को हुई टॉप्स कमेटी की मीटिंग बताती है कि अप्रैल में वो फिर से अपने फॉर्म में वापस लौट आई। टॉप्स स्कीम के तहत अमेरिका में अपने पति व कोच विजेन्दर सिंह के साथ ट्रेनिंग के लिए उन्होंने टॉप्स से 40 लाख रुपए मांगे। उन्हें रुपए दिए गए पर वे ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाईं।
- शूटिंग में हीना सिधू अपने पति, कोच व शूटिंग दल के प्रबंधक रौनक पंडित के साथ रियो गईं। उन्होंने तैयारियों के लिए सरकार से 1 करोड़ रुपए लिए। यह अलग बात है कि वे इतने मंहगे ट्रेनिंग के बाद भी वे फाइनल तक नहीं पहुंच पाईं। वे 10 मी. व 25 मी. श्रेणी में क्रमशः 14वें व 18वें स्थान पर रहीं।
- ओलम्पिक के लगभग 50 दिन पहले सानिया मिर्जा की डबल्स पार्टनर प्रार्थना थाम्बरे ने साई से 60 लाख रुपए और मांगे, जबकि उनको 30 लाख रुपया मिल चुका था।
- सानिया मिर्जा अपने मां ( टेनिस टीम की मैनजर) को रियो ले गईं।
- डिस्कस थ्रोअर विकास गौड़ कोच के बदले अपने पिता शिव को अपने साथ रियो ले गए।
- डिस्कस थ्रोअर सीमा अतिल अपने पति अंकुश को कोच के रूप में रियो ले गईं।
- गोल्फर अदिति अशोक अपने पिता को कैडी के रूप में रियो ले गए।
- रेस वॉकर सपना पूनिया और शॉट पुटर मनप्रीत कौर अपने-अपने पति को ट्रेनिंग के लिए पोलैंड अपने साथ ले गईं। सरकार ने दोनों का पूरा खर्च उठाया।
......और बोलते रहे झूठ
कभी साई से अधिक पैसे ठूंसने के लिए, तो कभी अपनी असफलता को छिपाने के लिए खिलाड़ी लगातार झूठ बोलते रहे।
- रियो का महाकुंभ शुरू होने के लगभग 15 दिन पहले तेज धावक दुती चंद ने खुले-आम कहा कि उनके पास जूते खरीदने तक के लिए पैसे नहीं हैं, जबकि टॉप्स के तहत उन्हें पहले ही 30 लाख रुपए मिल चुके थे। उसके बाद भी साई ने जूतों के लिए अलग से 2 लाख रुपए दिए।
- फिनिशिंग लाइन पर दौड़ते-दौड़ते गिर जाने के बाद सुखिर्यों में आईं मैराथन धावक ओ पी जैसा ने आरोप लगाया कि भारतीय दल ने उनके लिए पानी तक की व्यवस्था नहीं की थी, इसलिए ऐसा हुआ। रियो आयोजन समिति ने बाकायदा बयान जारी कर बताया कि पूरे 42 किमी के रास्ते में शुरूआत और अंत को छोड़कर 14 पानी के स्टॉल लगाए गए थे। उनकी साथी धावक कविता रावत और कोच ने भी उनके आरोप को झूठा बताया है।
ये हैं गुदड़ी की ललियां -
अब उनकी कहानी जिन्होने देश का नाक कटने से बचाया-

पीवी संधु- टॉप्स से मात्र 44 लाख मांगे। देश में ही ट्रेनिंग हासिल की। सिल्वर मेडल जीत देश का मान रखा।
| संधू का खेल देखने लायक था |
और लास्ट बट नॉट द लीस्ट, दीपा करमाकर- देश की इस बेटी ने मेडल तो नहीं जिता मगर दिल सबका जीता है।
दीपा को रियो की तैयारियों के लिए मात्र दो लाख रुपयों की जरूरत पड़ी।
सवाल ये नहीं है कि किसने कितने पैसे मांगे ? या अपने साथ किसको ले गए ? सवाल यह है कि इन सब के बाद उन्होंने रिजल्ट क्या दिया ? ध्यान रहे रिजल्ट केवल मेडल नहीं होते। रिजल्ट दिया है करमाकर ने, संधु ने। उन्होंने रियो में जो किया वो हमारे लिए कई गोल्ड से बढ़कर है।
अब सवाल यह उठता है कि-
- क्या देश में योग्य खिलाडियों की कमी है ? या उन्ही खिलाडियों को आगे बढाया जाता है जो खेल अधिकारी व नेताओं के करीब हैं ?
- क्या नरसिंह यादव का रिओ में न खेल पाने की वजह आपसी कलह और राजनीति थी ?
- महिला खिलाडियों के कोच बने उनके पति क्या कोच बनने का काबीलियत रखते हैं ?
- क्या पूर्व खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल के असम चुनावों में व्यस्त रहने के कारण रिओ तैयारियों पर गलत असर पड़ा ?
- जहाँ अधिकतर खिलाडियों को 40 से 50 लाख के आस-पास रूपये मिले वहीँ, हीना सिद्धू को 1 करोड़ कैसे मिल गए ?
इस पोस्ट में आपने ध्यान दिया होगा, बहुत सारे खिलाड़ियों के पति, मां या पिता ही कोच, प्रबंधक और न जाने क्या-क्या है। अगला पोस्ट खेल में पनप रहे इस परिवारवाद के पड़-ताल पर ही केंद्रित होगा।


