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Wednesday, August 31, 2016

हमें तुम पर 'शर्म' है, ऐ रियो के बैरंगों !

पूरे देश के साथ आप भी यह जानना चाहते होंगे कि रियो में हमारी इतनी बुरी दुर्गति क्यों हुई ? आप जानना चाहते होगें उन लोगों को, जो इस ट्रेजेडी के खलनायक हैं। शायद अपने फ्रेंड सर्किल में रियो पर डिस्कशन के दौरान उन इडियट्स को जी भर गालियां देने का प्लान भी बना रखा हो। खेलों में बुरे प्रदर्शन पर जब भी देश में बात होती है, तब सबसे आसान टारगेट होते हैं- खेल संगठनों को कब्जियाये राजनेता, खेल मंत्रालय के अफसर, उनकी लालफीताशाही की कहानियां व असहयोग आंदोलन से प्रभावित उनकी हरकतें। नीचे लिखे बिन्दु यह साबित करने के लिए काफी हैं कि इस बार चूक प्रशासनिक स्तर पर नहीं हुई है-


  • रियो ओलम्पिक की तैयारियों में कोई खोट न रह जाए और खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन करें, इसके लिए खेल मंत्रालय ने टॉप्स यानी टारगेट ओलम्पिक पोडियम स्कीम नाम की एक विशेष समिति गठित की थी। प्रशासनिक गम्भीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अप्रैल से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक इस समिति की 54 बैठकें हुई।
  • इस समिति ने प्रत्येक खिलाड़ी से कहा था कि वे पूरे दुनिया में कहीं भी, किसी भी कोच से ट्रेनिंग ले सकते हैं। उसका पूरा खर्च मंत्रालय वहन करेगा। इसके लिए बाकायदा टॉप्स ने खिलाड़ियों से प्रपोजल मंगवाए थे।
  • ओलम्पिक के तैयारियों पर टॉप्स  ने पूरे 20 करोड़ रुपए खर्च किए।

फिर कहां रह गई खोट ?

खेल चाहे कोई भी हो उसमें हार-जीत का होना स्वभाविक पक्ष है। मगर इसके बावजूद कई खिलाड़ी ऐसे होते है जो भले ही जीत हासिल कर पाने में नाकाम रहें मगर अपने प्रदर्शन से सबको खुश होने का अवसर प्रदान करते है। इस बार हमारे पास ऐसे मौके बहुत कम आए। हमारी नाराजगी की स्वभाविक वजह यही है। ऐसा क्यों हुआ, इससे संबंधित कुछ तथ्य निम्न है, इससे आपको सारा मामला खुद ही समझ में आ जाएगा-

84 प्रतिशत खिलाड़ी अपना पिछला सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने में भी नाकाम रहे-

  • ओलम्पिक में खेलना किसी भी खिलाड़ी के लिए एक सपने जैसा होता है, जहां वह अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ देने के लिए दिन-रात एक कर देता है। देश के लिए एक अदद तमगा जीतने के लिए खिलाड़ी अपना सर्वस्व दांव पर लगा देता है। क्या हमारे खिलाड़ियों ने ऐसा किया था ?
  • रियो ओलम्पिक टीम में कुल 117 खिलाडी थे। हाॅकी में महिला व पुरुष टीम में शामिल 32 खिलाड़ियों को छोड़ दें, तो बचे कुल 85 खिलाड़ी । इन 85 खिलाड़ियों में से मात्र 13  खिलाड़ी ही अपने वर्ल्ड रैकिंग के अनुरूप या उससे बेहतर प्रदर्शन कर पाए।
  • कुल 34 ट्रैक या फील्ड एथलीटों में से मात्र 4 ने ही अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। 
  • लांग जम्पर अंकित शर्मा महीने भर पहले बनाये अपने 8.19 मीटर के राष्ट्रीय रिकॉर्ड से आधा मीटर कम कूद पाए।
  • मेडल के प्रबल दावेदार टेबल टेनिस खिलाड़ी सौम्यजीत घोष वर्ल्ड रैकिंग में अपने से 126 पायदान नीचे के खिलाड़ी से हार गए।
  • वर्ल्ड रैकिंग में 72वें स्थान एक मात्र भारतीय जुडो खिलाड़ी अवतार सिंह 91वें पायदान के खिलाड़ी से हार गए।

....तो हमारे खाते में होता एक और सिल्वर मेडल
48 किलोग्राम भारवर्ग में वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने रियो ओलम्पिक से दो माह पहले पटियाला में सेलेक्शन ट्रायल्स के दौरान 192 किलोग्राम भार उठाकर नेशनल रिकॉर्ड कायम किया था। ओलम्पिक में वे मात्र 82 किग्रा उठा पायीं। 192 किग्रा भार उठाकर इंडोनेशियाई खिलाड़ी वहयूनी अगस्टिएनी ने रजत पदक अपने नाम कर लिया


पैसा ठूंसो, रियो जाओ, सेल्फी लो.....पर अपने परिवार के साथ 

रियो गए अनाड़ी जब देश की भद् पिटवा रहे थे, तब विवादित लेखिका शोभा डे ने ट्विट किया था-"रियो जाओ, सेल्फी लो और घर वापस लौट आओ।" 
तब उनके इस बयान की काफी आलोचना हुई थी। जरा देखिए, कैसी-कैसी उच्च कोटि की धार्मिक गलियां मिलीं थीं उनको-





मुझे नहीं पता आप उनके बयान से कितना इत्तफाक रखते हैं। नीचे लिखे तथ्यों को गौर से पढ़िए, आपको उनकी बातें बहुत हद तक सही लगने लगेंगी। हां, यह सही है कि उनकी भाषा से लोगों को एतराज हो सकता है ।

  • डिस्कस थ्रोअर कृष्णा पूनिया पिछले 2 साल से चोटिल चल रहीं थीं। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर राजस्थान विधानसभा का चुनाव भी लड़ा। 22 मई को हुई टॉप्स कमेटी की मीटिंग बताती है कि अप्रैल में वो फिर से अपने फॉर्म में वापस लौट आई। टॉप्स स्कीम के तहत अमेरिका में अपने पति व कोच विजेन्दर सिंह के साथ ट्रेनिंग के लिए उन्होंने टॉप्स से 40 लाख रुपए मांगे। उन्हें रुपए दिए गए पर वे ओलम्पिक के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाईं
  • शूटिंग में हीना सिधू अपने पति, कोच व शूटिंग दल के प्रबंधक रौनक पंडित के साथ रियो गईं। उन्होंने तैयारियों के लिए सरकार से 1 करोड़ रुपए लिए। यह अलग बात है कि वे इतने मंहगे ट्रेनिंग के बाद भी वे फाइनल तक नहीं पहुंच पाईं। वे 10 मी. व 25 मी. श्रेणी में क्रमशः 14वें व 18वें स्थान पर रहीं।
  • ओलम्पिक के लगभग 50 दिन पहले सानिया मिर्जा की डबल्स पार्टनर प्रार्थना थाम्बरे ने साई से 60 लाख रुपए और मांगे, जबकि उनको 30 लाख रुपया मिल चुका था।
  • सानिया मिर्जा अपने मां ( टेनिस टीम की मैनजर) को रियो ले गईं।
  • डिस्कस थ्रोअर विकास गौड़ कोच के बदले अपने पिता शिव को अपने साथ रियो ले गए।
  • डिस्कस थ्रोअर सीमा अतिल अपने पति अंकुश को कोच के रूप में रियो ले गईं।
  • गोल्फर अदिति अशोक अपने पिता को कैडी के रूप में रियो ले गए।
  • रेस वॉकर सपना पूनिया और शॉट पुटर मनप्रीत कौर अपने-अपने पति को ट्रेनिंग के लिए पोलैंड अपने साथ ले गईं। सरकार ने दोनों का पूरा खर्च उठाया।

......और बोलते रहे झूठ

कभी साई से अधिक पैसे ठूंसने के लिए, तो कभी अपनी असफलता को छिपाने के लिए खिलाड़ी लगातार झूठ बोलते रहे।

  1. रियो का महाकुंभ शुरू होने के लगभग 15 दिन पहले तेज धावक दुती चंद ने खुले-आम कहा कि उनके पास जूते खरीदने तक के लिए पैसे नहीं हैं, जबकि टॉप्स के तहत उन्हें पहले ही 30 लाख रुपए मिल चुके थे। उसके बाद भी साई ने जूतों के लिए अलग से 2 लाख रुपए दिए।
  2. फिनिशिंग लाइन पर दौड़ते-दौड़ते गिर जाने के बाद सुखिर्यों में आईं मैराथन धावक ओ पी जैसा ने आरोप लगाया कि भारतीय दल ने उनके लिए पानी तक की व्यवस्था नहीं की थी, इसलिए ऐसा हुआ। रियो आयोजन समिति ने बाकायदा बयान जारी कर बताया कि पूरे 42 किमी के रास्ते में शुरूआत और अंत को छोड़कर 14 पानी के स्टॉल लगाए गए थे। उनकी साथी धावक कविता रावत और कोच ने भी उनके आरोप को झूठा बताया है।

         ये हैं गुदड़ी की ललियां - 

      अब उनकी कहानी जिन्होने देश का नाक कटने से बचाया-

पीवी संधु- टॉप्स से मात्र 44 लाख मांगे। देश में ही ट्रेनिंग हासिल की। सिल्वर मेडल जीत देश का मान रखा।

संधू का खेल देखने लायक था 

साक्षी मलिक- इस हरियाणवी छोरी को तैयारियों के लिए मात्र 12 लाख रुपए पर्याप्त लगे। देश में ही प्रशिक्षण प्राप्त किया।

और लास्ट बट नॉट द लीस्ट, दीपा करमाकर- देश की इस बेटी ने मेडल तो नहीं जिता मगर दिल सबका जीता है। 
दीपा को रियो की तैयारियों के लिए मात्र दो लाख रुपयों की जरूरत पड़ी।
सवाल ये नहीं है कि किसने कितने पैसे मांगे ? या अपने साथ किसको ले गए ? सवाल यह है कि इन सब के बाद उन्होंने रिजल्ट क्या दिया ? ध्यान रहे रिजल्ट केवल मेडल नहीं होते। रिजल्ट दिया है करमाकर ने, संधु ने। उन्होंने रियो में जो किया वो हमारे लिए कई गोल्ड से बढ़कर है। 
अब सवाल यह उठता है कि- 

  • क्या देश में योग्य खिलाडियों की कमी है ? या उन्ही खिलाडियों को आगे बढाया जाता है जो खेल अधिकारी व नेताओं के करीब हैं ? 
  • क्या नरसिंह यादव का रिओ में न खेल पाने की वजह आपसी कलह और राजनीति थी ?
  • महिला खिलाडियों के कोच बने उनके पति क्या कोच बनने का काबीलियत रखते हैं ?
  • क्या पूर्व खेल मंत्री सर्वानंद सोनोवाल के असम चुनावों में व्यस्त रहने के कारण रिओ तैयारियों पर गलत असर पड़ा ?
  • जहाँ अधिकतर खिलाडियों को 40 से 50 लाख के आस-पास रूपये मिले वहीँ, हीना सिद्धू को 1 करोड़ कैसे मिल गए ?



इस पोस्ट में आपने ध्यान दिया होगा, बहुत सारे खिलाड़ियों के पति, मां या पिता ही कोच, प्रबंधक और न जाने क्या-क्या है। अगला पोस्ट खेल में पनप रहे इस परिवारवाद के पड़-ताल पर ही केंद्रित होगा।


Sunday, August 28, 2016

कम्यूनिकेशन गैप है जनसत्ता व इंडियन एक्सप्रेस के मैनेजमेण्ट में: मनोज मिश्रा



हिन्दी अखबार  'जनसत्ता ' की कहानी कमोबेश भारत देश जैसी है। जिसके अतीत में नीर-क्षीर की नदियां बहा करती थीं, वह आज अपने पहचान की लड़ाई लड़ रहा है। सोचिए, जनसत्ता का कोई जिम्मेदार व्यक्ति आपको मिल जाए तो आप उससे क्या जानना चाहेंगे ? कि जनसत्ता क्यों डूबता जा रहा है ? सोचिए और बताइए। संयोगवश  हमारी (मैं और राजीव ) मुलाकात  हुई  जनसत्ता दिल्ली के मेट्रो एडिटर मनोज मिश्र  से । हमने उनसे क्या पूछा, नीचे पढ़िए-   
सर, मेट्रो शहरों की रिपोर्टिंग अन्य क्षेत्रों की रिपोर्टिंग से अलग कैसे है ?

मेट्रो शहरों में आवागमन सुविधाजनक है। रिपोर्टर को कम क्षेत्रफल कवर करना होता है। रिपोर्टर आधुनिक उपकरणों के द्वारा एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। एक जगह जाने से कई काम निबट जाते हैं। इस तरह मेट्रो शहरों की रिपोर्टिंग आसान है। छोटे शहरों में कम विकास होने की वजह से रिपोर्टिंग थोड़ी मुश्किल है।

सोशल नेटवर्किंग साइटों ने रिपोर्टिंग को आसान कर दिया है, परन्तु  रिपोर्टर के पास प्रायोजित सामग्री आने लगी। ऐसे में रिपोर्टर इससे कैसे बचे ?

बिल्कुल सही कहा आपने। हमने जब पत्रकारिता शुरू की थी तो एक वर्जन के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। टेक्नालाॅजी के आने से चीजें आसान हो गयीं हैं। अब जैसे हर चीज का साइड इफैक्ट होता है, उसी तरह यह टेक्नालाॅजी का साइड इफैक्ट है। इससे बचने के दो ही तरीके हैं। अव्वल तो आप को घटनास्थल पर खुद जाना चाहिए। दूसरा, इस तरह के स्रोतों से मिली जानकारी को क्रास-चेक करके ही आगे बढ़ाएं।
जनसत्ता दिल्ली के मेट्रो एडिटर श्री मनोज मिश्र  हमसे मुखातिब होते हुए.


अक्सर किसी विशेष राजनीतिक दल को कवर करने वाले रिपोर्टर उस दल के प्रवक्ता के तरह बात करने लगते हैं। ऐसा क्यों ?

देखिए, मनुष्य विचारशील प्राणी है। कोई-न-कोई विचारधारा तो उसमें रहेगी ही। ऐसे में थोड़ा-बहुत झुकाव तो होता ही है, परन्तु खबरों में यह झुकाव नहीं दिखना चाहिए। न्यूज और व्यूज में अंतर बरकरार रखना चाहिए।

ऐसा देखा जा रहा कि अनेक समाचार-पत्र विश्लेषण के नाम पर न्यूज में व्यूज को मिला रहे हैं। यह कहां तक सही है  ?

यह बिल्कुल गलत है। यह पत्रकारिता के साथ अन्याय है।

एजेंसी के रिपोर्ट्स पर बढ़ती निर्भरता के दौर में खबरों का अलग-अलग एंगल कैसे निकालें ?

खबरों के लिए एजेंसी पर निर्भर नहीं होना चाहिए। रिपोर्टिंग का ‘ए' ही घटनास्थल है। अलग-अलग समाचार पत्रों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं परन्तु समाचार तो एक ही होना न..। बाकी एंगल तो खबर लिखने वाले उप-सम्पादक के नजरिए पर निर्भर करता है।

आशंका जताई जा रही है कि एजेंसियों की बढ़ती संख्या के कारण मीड़िया संस्थानों से रिपोर्टर का पद समाप्त हो जाएगा। आपकी क्या राय है ? 

(तपाक से)... अभी इतनी जल्दी खत्म नहीं होगा। लेकिन खतरा तो है।

सर, जनसत्ता के प्रसार संख्या में कमी का क्या कारण है ?


हमने प्रसार संख्या (सर्कुलेशन) पर कभी ध्यान नहीं दिया। हम उन्हीं लोगों को पढ़ाना चाहते हैं जो खबरों से इतर कुछ पढ़ना चाहते हैं। प्रभाष जोशी जी जब रिटायर हो रहे थे तब हमने उनका ध्यान इस ओर आकर्षित कराया था परंतु उन्होंने इस तरफ ध्यान नहीं दिया जिसका खामियाजा हमें भुगतना पड़ रहा है।

एक ही समूह का होने के बावजूद इंडियन एक्सप्रेस में छपने वाली बड़ी खबरें जनसत्ता में दूसरे-तीसरे दिन छपती हैं। ऐसा क्यों ?

देखिए, जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के प्रबंधन में गैप आ गया है। पहले तो कुछ खबरें जनसत्ता में छपती थीं लेकिन वे इंडियन एक्सप्रेस में नहीं छपती थीं। मैं इस बारे में अपने संपादक जी से बात करुंगा।

मुकेश भारद्वाज जी के संपादकीय सत्ता में आने के साथ ही जनसत्ता कुछ मामलों में एनबीटी की राह चल पड़ा है। क्या जनसत्ता अपनी पहचान बदलना चाहता है ?

हां, ये सही है कि कुछ मामलों में जनसत्ता एनबीटी की राह पर है। कभी समाचार-पत्र जनसत्ता की राह चला करते थे, पर आज स्थिति उलट  है। पहचान बदलने के मामले पर....... मुझे लगता है कि अभी स्थिति बहुत स्पष्ट नहीं है।

हमारे पीढ़ी का पत्रकार या तो रिपोर्टर बनना चाहता है या एंकर। ऐसे में क्या डेस्क पर कुशल पत्रकारों का अकाल पड़ सकता है ?

डेस्क किसी भी संस्थान की रीढ़ की हड्डी है। संस्थान की सफलता बहुत हद तक उसके डेस्क पर निर्भर करती है। मैं मूलतः रिपोर्टर रहा हूं पर मैं मानता हूं कि किसी पत्रकार को प्रसिद्धि डेस्क से ही मिलती है। इंडियन एक्सप्रेस सहित कोई भी अखबार जो अच्छा कर रहा है, उनका डेस्क बहुत मजबूत है। एक एंकर या रिपोर्टर के पीछे बीस-बीस डेस्क के पत्रकार लगे होते हैं।

प्रभाष जोशी जी के समय की पत्रकारिता और आज की पत्रकारिता में क्या अंतर है ?

जमीन-आसमान का अंतर  है। तब किसी को खुश करने के लिए खबरें नहीं लिखीं जाती थी। आज तो बाकायदा ट्रेंड सेट कर दिया गया है। हमारे अखबार में तो कम, अन्य अखबारों में तो डिक्टेट तक किया जाता है।

नवोदित पत्रकारों के लिए भविष्य की लिहाज से पत्रकारिता के किस बीट में अधिक संभावनाएं हैं ?

देखिए, दो चीजें हैं- एक तो सीखने के लिहाज से और दूसरा करियर की लिहाज से। सीखने के लिहाज से अपराध, पुलिस, कानून-व्यवस्था और राजनीति महत्वपूर्ण बीट हैं। मनोरंजन, फैशन, जीवन-शैली जैसे क्षेत्र उभरते हुए हैं इसीलिए इनमें करियर की संभावनाएं अधिक हैं।

Sunday, August 21, 2016

अफगानी सैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्भीक कदम उठाये भारत : करज़ई

बतौर अफगानी राष्ट्रपति हामिद करजई को अपना दूसरा व अंतिम कार्यकाल पूरा किए हुए लगभग दो साल हो रहे हैं। लेकिन अफगानी राजनीति में वे अब भी एक प्रमुख शक्ति बने हुए हैं। उन्होंने अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रेस से पीएम के बलूचिस्तान पर बयानआईएस के खतरे से लेकर कश्मीर की वर्तमान स्थिति पर खुलकर बात की. मैंने इस साक्षात्कार को अनुदित करने की कोशिश की है. ताकि अच्छी सामग्री हिंदी के पाठक तक पहुँच सके. पेश है बातचीत का प्रमुख अंश-

पीएम नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में बलूचिस्तान के बारे बयान दिया है, वह भी लाल किले की प्रचीर से। आपके हिसाब से उनके इस बयान का क्या असर होगा ?

इसका मतलब है कि भारत इस क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता और मानवाधिकारों के बारे में चिंतित है। यह बयान भारत के इस चाह को दर्शाता है कि बलूचिस्तान के लोग भी बेहतर करें। वे बंदूकों के फायरिंग, कट्टरवादी हमले व बमबारी से दूर कष्टरहित सामान्य जीवन जी सकें। बलूचिस्तान हमारे लिए कोई अलग मसला नहीं है। अफगानिस्तान में कट्टवाद वहीं से आता है। बलूचिस्तान हमसे भौगोलिक व मानसिक दोनों रूप से बहुत करीब है। हमें बलूची लोगों की शांति व विकास तक पहुंच सुनिश्चित करनी होगी। यह मानवाधिकर का मामला है जो हर बलूची का अधिकार है।

शायद पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने इस मसले पर सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी है। क्या इस वजह से आने वाले दिनों में भारत-पाक सम्बन्धों में बदलाव देखने को मिलेगा?
यह भारतीय उपमहाद्वीप में महत्वपूर्ण बदलाव लाएगा। यह कदम इस क्षेत्र में शांति व स्थिरता कायम करने व राज्य द्वारा नीतिगत तरीके से कट्टरवाद और अतिवाद को उपयोग करने की प्रथा को खत्म करने की दिशा में कारगर साबित होगा। हमें इस दिशा में मिलकर काम करना होगा।

शांति व विकास तक पहुँच हर बलूची का अधिकार है.

आईएस के उदय और इसके परिणाम को आप किस रूप में देखते हैं ? विशेषकर भारत के संदर्भ में भारतीय अधिकारियों से मिलने पर क्या आप इस बारे में बात करते हैं ?

बिल्कुल ! यह मुद्दा भारत और अफगानिस्तान के बीच वार्ता का थीम होता है। रुढ़िवाद और अतिवाद की वजह से जन-धन की भारी हानि हो रही है। भारत को आईएस को गम्भीरता से लेना चाहिए। हमारे क्षेत्र के लिए यह पूर्णतः विदेशी सोच है, अतः हमें मिलकर इससे निबटना चाहिए।

अगर हम भारतीय संदर्भ में देखें तो आईएस बाकीे आतंकी समूहों से अधिक घातक और खूंखार है। ऐसा क्यों?

आईएस आईएस अफगानी मूल का नहीं है और उसका तालिबान से कोई सम्बन्ध नहीं है। अत का उद्देश्य कहीं अधिक घातक है। तालिबान स्थानीय थे। मूलतः अफगानी।  आपको उनसे अत्यधिक सतर्क रहना होगा। आपको उनकी भारत में पहुंच और भारतीय हितों पर कुठाराघात को रोकना ही होगा। जैसा कि अभी वे अफगानिस्तान में कर रहे हैं।

बतौर राष्ट्रपति आपने सैनिक साजो-सामान की वो सूची भारत को सौंपी, जो आप भारत से चाहते हैं। कुछ हेलीकाप्टरों को छोड़कर सूची में शामिल अन्य साजो-सामान भारत अभी तक नहीं दे पाया है। क्या आपको लगता है भारत इस बारे में और अधिक कर सकता है ?

भारत को अफगानिस्तान के सैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए खुलकर सामने आना चाहिए। मैं चाहता हूं कि अफगान सैन्य क्षमता को बढ़ाने के लिए भारत को कड़े कदम उठाए। इसे चमत्कारिक ही कहा जाएगा कि भारत, पाकिस्तान और अमेरिका दोनों के दृष्टिकोण से सहमत दिखता था। मैं चाहता हूं कि भारत अपने हितों और भारत-अफगान सम्बन्धों को ध्यान में रखकर उचित कदम उठाए। वर्तमान सरकार ने कुछ हेलीकाप्टर दिए हैं परन्तु हमें उनसे अधिक अपेक्षा है।

भारत अफगान नेशनल आर्मी को किस तरह के साजो-सामान उपलब्ध करा सकता है ? जिससे उसकी क्षमता को बढ़ाया जा सके?

भारत हमारे सेनाओं की स्थिति को बखूबी जानता है। सैनिक साजो-सामान से लेकर सैन्य प्रशिक्षण तक बहुत सारी चीजें हैं जिनको भारत उपलब्ध करवा सकता है। और ये चीजें भारत के पास हैं भी।

क्या आपको लगता है कि भारत पीएम मोदी के बलूचिस्तान पर बयान के बाद अफगानिस्तान को सैन्य सहायता के दिशा में अपेक्षाकृत अधिक काम कर रहा है?

मैं इस बात को लेकर अत्यधिक आशान्वित हूं कि भारत, अफगानिस्तान और अफगानी सेना के मजबूत करने के लिए और अधिक सहायता उपलब्ध कराएगा। हमें अपने पड़ोसी पाकिस्तान के साथ भी शांतिपूर्ण रिश्ते कायम करने होंगे।

इन दिनों कश्मीर उथल-पुथल से गुजर रहा है। इस पूरे मामले को आप कैसे देखते हैं ?
मैं आशा करता हूं कि वहां शांति स्थापित होगी। वहां खून-खराबा, अशांति व बाहरी हस्तक्षेप बन्द होगा।

इस समय आप पीएम नरेन्द्र मोदी को क्या संदेश देना चाहेंगे ?

अफगानिस्तान के प्रति भारतीय सहयोग के लिए हम उनके आभारी हैं। अफगानिस्तान पर उनका मजबूत स्टैंड, क्षेत्रीय मसलों पर उनके खुले और स्पष्ट विचारों का हम स्वागत करते हैं।
(इस पोस्ट का मकसद उन पाठकों तक क्वालिटी प्रोडक्ट पंहुचाना है जो अंग्रेजी में खुद असहज महसूस करते हैं.पूरा साक्षात्कार पढने के लिए क्लिक करें.)