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Tuesday, May 23, 2017

दलितों के धर्म बदलने से आपको क्या परेशानी है साहब?


आमतौर पर यह अपेक्षा की जाती है कि आप अपने जाति, समुदाय, धर्म, संप्रदाय, गाँव-जंवार, जिला आदि हर उस चीज के बारे में सकारात्मक बोलें या लिखें जिससे आप किसी न किसी तरीके से जुड़े हों. जैसे यदि आप ब्राह्मण हैं तो ब्राह्मणवाद के खिलाफ़ न बोलें, अगर दलित हैं तो दलितों द्वारा किए जा तरहे गलत कामों पर चुप्पी साध लें, अगर मुस्लिम हैं तो इस्लामिक आतंकवाद को इस्लामोफोबिया का नाम दे दें, अगर राष्ट्रवादी हैं तो वामपंथियों के केवल गलत कामों को बताएं और यदि वामपंथी हैं तो राष्ट्रवादियों को हिटलर की संतान, साम्प्रदायिक और न जाने क्या-क्या कहें. यानी एक अंगुली हमेशा दूसरी तरफ रखें. दरअसल यह जिंदगी जीने का एक अप्रोच है. रोजमर्रा के छोटी-छोटी बातों में आप इसे देख सकते हैं.


जिंदगी जीने का मेरा तरीका थोडा सा अलग है. मेरा मानना है दूसरे में गलती निकालने से पहले अपनी गलती ढूंढ लेना चाहिए. आप अपनी गलती ढूंढ का सही कर लीजिए मैं अपनी. मैंने कल फेसबुक पर जो पोस्ट लिखा उसमें आप यह अप्रोच देख सकते हैं. मैं स्वामी विवेकानंद के विचारों से काफी प्रभावित रहा हूँ. उन्होंने कहा था कि अगर किसी का दर्द समझना हो तो उसके स्थान पर खुद को रख के देखो. जब भी किसी दलित, आदिवासी या अल्पसंख्यक के साथ अन्याय होता है तो मुझे पीड़ा होती है क्योंकि मैं 1 मिनट के लिए उनके स्थान पे खुद को रख के सोचता हूँ. अगर आप मुझसे इस तरह के पोस्ट लिखने की अपेक्षा करते हैं तो मुझे क्षमा करें –




दलितों के धर्म छोड़ने से आप क्यों परेशान हैं?
मेरे पोस्ट पर लोग सबसे ज्यादा जिस बात पर उखड़े हैं वो है - दलितों को धर्म परिवर्तन का सुझाव देना. मुझे समझ में नहीं आता इसमें गलत क्या है? पूरी जिंदगी हम चीजों को छोड़ने और पकड़ने का ही काम करते हैं. दरअसल हमारी जिंदगी छोड़ने-पकड़ने से ही बनी है. गाँव में अच्छा स्कूल नहीं था इसलिए गाँव छोड़कर सबसे पास के किसी शहर में पढने आए. उस शहर में अच्छी उच्च शिक्षा नहीं मिल सकती थी इसलिए उसे छोड़कर बड़े शहर आए. शहर में एक कमरा ढूंढा रहने के लिए. कुछ समय बाद लगा की यह कमरा जम नहीं रहा है तो उसे छोड़ दूसरा पकड़ लिया. उस कमरे में 2 साल रहे. कमरा अपने घर जैसा लगने लगा. उससे प्रेम हो गया. फिर हमारी आमदनी बढ़ी तो हमने उस प्यारे कमरे को छोड़ फ्लैट ले लिया. जब इस शहर में अच्छी नौकरी नहीं मिली तो दूसरे शहर में चले गए. उससे भी अच्छी नौकरी विदेशों में मिली तो वहां चले गए. कॉलेज में एक गर्लफ्रेंड पटाई (शब्द पर आपको आपत्ति हो सकती है पर हमारे समाज में लड़की पटाई ही जाती है). कुछ समय बाद उससे अनबन होने लगी तो उसे छोड़ दिया किसी दूसरी लड़की को पकड़ लिया. मतलब ‘मूव ऑन’ कर लिया. जब कभी कोई मित्र किसी एक लड़की के प्यार में देवदास बन जाता है तो हम उसे यही तो सुझाते हैं – ‘मूव ऑन’. जब हमारा किसी से झगड़ा हो जाता है या हम किसी चीज पर अटक जाते हैं तो दोस्तों की सबसे ज्यादा दी जाने वाली सलाह ‘छोडो यार’ होती है. 

अब आप बताइए क्यों छोड़ा आपने उस गाँव को जिसने आपको पाल-पोस कर बड़ा किया? जिसके मिटटी में आप खेले-खाए? उस शहर को आपने क्यों छोड़ा जिसने आपको पहचान दी? उस कमरे को क्यों छोड़ा जो आपको घर जैसा लगने लगा था? उस शहर को आपने क्यूँ छोड़ा जहाँ आप अपने प्रेमिका के साथ हाथ में हाथ डालकर शहर की संकरी गलियों में घूमे थे? गोलगप्पे खाए थे? जहाँ आपने बड़े-बड़े सपने देखे थे? अपने देश को क्यों छोड़ा? अपने जन्म भूमि को क्यों छोड़ा? ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरीयसी’ का मन्त्र भूल गए आप? आपने अपनी प्रेमिका को क्यों छोड़ा? आपने दूसरी प्रेमिका क्यों बनाई?
उत्तर बहुत सरल है. हम किसी एक चीज में फंसना नहीं चाहते हैं. हम लगातार प्रगति करना चाहते हैं. क्यों? अच्छे जीवन के लिए. क्वालिटी लाइफ के लिए. वर्तमान आधुनिक युग में क्वालिटी लाइफ मानव की सारी प्राथमिकताओं में सबसे ऊपर है. जब आप पूरी जिंदगी तमाम चीजों को छोड़ते रहे तो कोई दिक्कत नहीं और आज जब दलित आपकी बनाई हुई व्यवस्था में घुटन महसूस कर रहा है तो आप चाहते हैं की वह उस व्यवस्था को न छोड़े? हम कौन होते हैं किसी के जीवन की दिशा तय करने वाले? मेरा मन है माखनलाल में पढूं या आईआईएमसी में, नीला पहनूं या पीला, चावल खाऊं या रोटी, कमरे में रहूँ या फ्लैट में? आपको क्यों दिक्कत हो रही है? पुरानी व्यवस्था में मुझे जो दिक्कतें थीं उनके समाधान को आप आगे क्यों नहीं आए?

ख़बरों की दुनिया में रहने वाले लोगों को कम से कम दंगे से पहले सहारनपुर, वहां की स्थिति, राजपूतों द्वारा दलितों को एक बोर्ड न लगाने देना, उनको अम्बेडकर जयंती न मनाने देना, उनको शोभा यात्रा न निकालने देना, भीम सेना आदि के बारे में पता रहा ही होगा. आपने इनमें से कितने विषयों पर आपने लिखा? नहीं. तब आप इसको मुद्दा ही नहीं मानते थे क्योंकि यह कोई नई बात नहीं हो रही थी. सदियों से ऐसा चला आ रहा है. तब आप चुप रहे और आज जब दलित अपना निर्णय ले रहे हैं तो आप उन्हें सुझाव देने निकल पड़े. आज आप स्थिति संभालने की बात करते हैं. आज आपको हिंदुत्व, भाई चारा, इस्लामिक षडयन्त्र, विपक्षियों की चाल और न जाने क्या क्या दिखाई से रहा है.




कल से ही बहुत सारे मित्र मुझे बता रहे हैं की वो दलितों के साथ कोई भेदभाव नहीं करते हैं. उनको साथ बिठाकर खिलाते हैं. सही है मित्र आप उनके ऊपर एहसान कर रहे हैं. मुझे बताइए जरा आपके अब तक के मित्र मंडली में कितने दलित हैं? क्या आपने किसी दलित मित्र को अपने घर ले जाकर अपने थाली-गिलास में उनको खाना खिलाया है? कृष्ण-कन्हैया टाइप के भाई लोग जरा मुझे बताएं कि उनके पूर्व-प्रेमिकाओं में कितनी दलित लड़कियां थीं? या आप खुद दिमाग पर जोर डालिए और बताइए यदि आपके किसी मित्र किसी दलित लड़की से शादी किया हो?

मेरा एक मित्र है. शायद दलित है या पिछड़े वर्ग से है. मुझे स्पष्ट रूप से पता नहीं है. मैंने कभी जानने की कोशिश भी नहीं की. हाँ इतना पता है कि उसकी प्रेमिका ब्राह्मण है. दोनों में काफी प्रेम था. बात शादी तक पंहुची. घर वालों ने लड़के की जाति सुनते ही मना कर दिया. बोले और किसी ऊंची जाति का होता तो चल भी जाता. यह नहीं हो सकता. क्यों नहीं हो सकता भाई? दलितों के धर्म परिवर्तन पर उखड़े लोग बताएं जरा आप किसी चमार लड़की से शादी करने को तैयार हैं? आप अभी जोश में भले ही बोल दें पर गारंटी ले सकता हूँ बाद में आप पलट जाएंगे.

दलितों के साथ किए जा रहे भेद-भाव को बहुत सारे लोग यह कह कर तर्कसंगत ठहरा रहे हैं कि दलित भी कुछ जातियों के साथ भेद-भाव करते हैं. यह तो ठीक वैसा ही है जैसे कोई विद्यार्थी यह कह कर अपने फेल होने क बचाव करे कि उसके अन्य साथी भी फेल हो गए हैं. यहाँ फिर से अप्रोच की बात आती है. आपका अप्रोच कहता है कि अपने समुदाय के नियम-कानून को किसी तरीके से न्यायसंगत ठहराओ जबकि मेरा मानना है कि अपने अन्दर सुधार कर उनके लिए दीपक बनो.

गड़े मुर्दे न उखाड़ो

अतीत में हुई गलतियों की जब भी चर्चा होती है तो लोगों का मुंह यह कहकर बंद करने का प्रयास किया जाता है कि गड़े मुर्दे न उखाड़ो. इसके पीछे भी एक बड़ा खेल है. अतीत की जिन बातों से प्रभावशाली समुदाय की आभा बढती है या कम से कम उनको कोई दिक्कत नहीं होती है, अतीत के ऐसे पन्नों को स्वर्णिम इतिहास, गौरवशाली, शौर्य से भरा, आदर्श और न जाने किन-किन नामों से अलंकृत किया जाता है जबकि जिन चीजों से उनको दिक्कत है उसे ‘गड़े मुर्दे’ बता नेपथ्य में धकेल दिया जाता है. मेरा मानना है ‘गड़े मुर्दों’ को समय-समय पर उखाड़ना बहुत जरूरी है. इससे हमारी वर्तमान और आने वाली पीढियां सबक लेती रहेंगी और आने वाले समय में ऐसी किसी घटना को रोका जा सकेगा. हासिमपुर घटना के सम्बन्ध में उस समय गाज़ियाबाद के एसपी रहे विभूति नारायण सिंह भी ऐसा ही मानते हैं. इसीलिए वे चाहते हैं कि हासिमपुर नरसंहार को समय-समय पर याद किया जाए.

समस्या कहाँ है?

हमारे साथ समस्या यह है कि हम दलितों से अपने आप को ऊपर रखना चाहते हैं. इसमें कुछ अलग नहीं है. यह मानव का स्वाभाव है. सभी को नैसर्गिक इच्छा होती है कि उसे किसी से श्रेष्ठ समझा जाए. चूँकि दलितों के ऊपर हमारे पूर्वजों ने मानसिक कब्ज़ा जमा रखा है तो हम उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं. अब आप कहेंगे आप ऐसी मानसिकता नहीं रखते. तो मायावती को गलियां कौन देता है? आज भी जातिसूचक गलियां किन जातियों के नाम पर दी जाति हैं. चमार, बेडिया, भंगी क्या है ये? मैं जब कक्षा 8 पंहुचा तब मुझे पता चला कि असल में ये जातियां हैं. जब मैं स्नातक में पंहुचा तब मुझे पता चला कि ‘बेडिया’ दरअसल किसी जनजाति का नाम है. पढ़े-लिखे और प्रगतिवादी मानसिकता के लोग भी दलितों के समस्याओं को कोई बड़ी समस्या के रूप में नहीं देखते क्योंकि उनके लिए यह कोई नई बात नहीं है. ये सब सदियों से चली आ रहा है. दूसरी तरफ जब कभी दलित धर्म छोड़ने की बात करते हैं तो हमें अपने धर्म की चिंता सताने लगती है. हिंदुत्व तुरंत खतरे में आ जाता है. उसके पीछे हमें षडयंत्र दिखने लगता है.

आपने क्या किया है दलितों के सम्मान के लिए



जो लोग मुझे दलितों के लिए ‘कुछ करने’ और समाज में जहर न बोने का ज्ञान दे रहे हैं उनसे एक सीधा सा सवाल है. आपने अपने स्तर पर दलितों के उत्थान के सम्मान के लिए क्या किया है. नीचे कमेंट बॉक्स में बताइए. मैं भी तो जानूं जरा. मैंने क्या किया है यह किसी दूसरे ब्लॉग पोस्ट में बताऊंगा.

मुझे गरियाते रहिए

संवाद का सबसे स्याह पहलू है उसे व्यक्तिगत स्तर पर ले जाना. यहाँ तक बहुत सारे लोग गलियां देने लगते हैं. कुछ गलियां बौद्धिक और साहित्यिक गलियां होती हैं तो कुछ सीधे माँ-बहन को समर्पित होती हैं लेकिन मेरे ऊपर इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ता. मेरा मानना है अगर आप पत्रकारिता करने आए हैं (सब लोग पत्रकारिता नहीं करने आए हैं. पत्रकारिता के नाम पर और भी बहुत सारे धंधे हैं) तो आपको गाली, थप्पड़ आदि के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए और इसमें मैं उस व्यक्ति की गलती नहीं मानता हूँ. उस बेचारे को अब तक जो बताया गया है उसको उसने सच मान लिया है और उस ‘सच’ से उसकी भावनाएं जुड़ गई हैं और भावनाओं का खेल तो आप जानते ही हैं.


...सो अपने आप को रोक के रखिए

मेरे बहुत सारे मित्रों को इस बात की चिंता है कि मैं अपने रास्ते से भटकता जा रहा हूँ, मैं अपनी सभ्यता, संस्कृति को भूल रहा हूँ और सबसे बड़ी चिंता कि मैं वामपंथी (यद्दपि मैंने अभी तक वामपंथ को पढ़ा, समझा नहीं है) होता जा रहा हूँ. दरअसल, जब मैंने माखनलाल में प्रवेश लिया था तो मैं ही ऐसी बातें किया करता था. दो सालों में पता नहीं कहाँ से यह सारा ‘जहर’ आकर मेरे मष्तिष्क में भर गया है. मेरी सलाह है कि आप अपने आप को बचा के रखिए. कहीं आप भी विश्वविद्यालय से निकलते-निकलते यही सब न हो जाएं. सो थोडा सावधान रहिए, अपनी संवेदनाओं को मार दीजिए, पढ़ना-लिखना बहुत न कीजिये, सच को मष्तिष्क में मत प्रवेश होने दीजिए, जिस खूंटे को पकड़ कर आए थे उससे बंधे रहिए. शायद आप बच जाएं.

(नोट: जिन लोगों ने परीक्षा के एक दिन पहले ब्लॉग लिखने में मेरा 2 घंटे समय बर्बाद करवाया है न... मां सरस्वती उनको माफ़ नहीं करेंगी.)


जय श्री राम! 

Sunday, May 21, 2017

क्या होगा 'राष्ट्रवादी पत्रकारिता' के मेन्यू में ?

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नरेन्द्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के साथ ही राष्ट्रवादी पत्रकारिताका गाना गाया जा रहा है. ऐसी किसी भी खबर को दिखाने और प्रसारित करने की निंदा की जाने लगी है जिससे राष्ट्रहितको क्षति पंहुचती हो. पत्रकारिता के इस संकल्पना को मानने वालों पत्रकारोंकी लिस्ट लम्बी हो रही है. अब इसमें सिर्फ उगता भारत, डूबता सूरज जैसे दो टकिया समाचार संस्थान ही नहीं हैं बल्कि जी मीडिया जैसे बड़े घाघ शामिल हो गए हैं. सत्ता की मलाई चाटनी हो तो लोग क्या से क्या कर बैठते हैं जी ने तो सिर्फ राष्ट्रवादी पत्रकारिताको समर्पित जी हिंदुस्तान चैनल ही शुरू किया है.

अब सवाल यह उठता है कि राष्टवादी चैनल औरों से अलग कैसे होंगे? राष्ट्रवादी पत्रकारिता के मेन्यू में क्या होगा? जाहिर है राष्ट्रवाद का आधार गौ, गीता, गंगा और भारतीय संस्कृति है तो राष्ट्रवादी पत्रकारिताइन्हीं स्वर्णआधारों पर काम करेगी. वर्तमान पत्रकारिता और राष्ट्रवादी पत्रकारों की मांगों को देख-समझ कर राष्ट्रवादी पत्रकारिताके स्वरुप का अनुमान लगा रहा हूँ -
  • टीवी चैनलों के एंकर जय श्री रामके साथ कार्यक्रम की शुरूआत करेंगे. माथे पर टीका अनिवार्य होगा. पैनल डिस्कशन के दौरान हर पैनेलिस्ट को अपनी बात भारत माता की जयके साथ शुरू करना होगा और बीच-बीच में इसे दोहराते रहना होगा क्योंकि आज कल लोगों में देश प्रेम की भावना कभी भी गायब हो सकती है. भारत माता की जय का नारा उनको देशद्रोही होने से बचाए रखेगा.
  • सेना के ऊपर कोई भी सवाल नहीं उठाया जाएगा क्योंकि वो भारत माता के सच्चे लालहैं. सेना के सिपाहियों द्वारा किये गए रेप आदि को भारत माता की दूतों का प्रसाद माना जाएगा. इरोम जैसे लोगों को जेल में डालने के लिए सीरीज में कार्यक्रम तैयार किये जाएंगे.
  • गौ और गौ संरक्षण को चैनल अपने पालिसी का कोर बिंदु बनायेंगे. गायों पर विशेष कार्यक्रम बनाए जाएंगे. गायों का हक़ आदमी के हक़ से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा. हर हफ्ते न्यूज़रूम की गाय के गोबर से लिपाई होगी. हर पत्रकार को गौ-गोबर से बना साबुन और गौ-मूत्र से बनी सैम्पू लगानी होगी. गंगा पर भी विशेष फोकस होगा. गंगाजल के फायदे बताए जाएंगे. हाँ, गंगा की दुर्दशा पर कोई बात नहीं होगी क्योंकि इससे भाजपा सरकार की किरकिरी हो सकती है.

  •  चूँकि ‘राष्ट्रवादभाजपा की जागीर है इसीलिए उसको छोड़ बाकि सारी पार्टियों को देश हित में काम न करने वाला और विदेशी चंदे से चलने वाला माना जाएगा और इसके पक्ष में किसी भी तरीके से साक्ष्य इकट्ठा किया जाएंगे. भाजपा को देश के प्रत्येक राज्य में लाना पार्टी के साथ राष्ट्रवादीपत्रकारों की जिम्मेवारी होगी. सत्ता पक्ष से ज्यादा वार मृतप्राय विपक्ष पर किया जाएगा. विपक्षी पार्टियों के शासन के दौरान के गड़े मुर्दों को उखाड़ा जाएगा. भाजपा सरकारों की वाह-वाही की जाएगी. राष्ट्रवादी पत्रकार भाजपा हित को ही देशहित मानेंगे.
  • गाय हर प्रकार से समाज के लिए लाभदायक है इसीलिए गाय को मारना बिल्कुल गलत हुआ. इस दृष्टिकोण सेराष्ट्रवादीऔर रामजादोंद्वारा हरामजादोंके ऊपर की गई कार्यवाही को उचित माना जाएगा और भगवाधारियों द्वारा मुसलमानों की हत्या को नहीं दिखाया जाएगा या कम से कम दिखाया जाएगा.  


  • यह भी संभव है कि सबसे ज्यादा मुसलमानों को मारने वालों 'गुदड़ी के लालों' पर विशेष कार्यक्रम बनाये जायें. उनके इंटरव्यू को प्राइम टाइम में दिखाया जाए. ठीक वैसे ही जैसे किसी परीक्षा के टॉपर से उसके सफलता के राज पूछे जाते हैं.
  • किसी भी सूरत में भारत को हारता हुआ नहीं दिखाया जाएगा क्योंकि इससे भारतीयों का मनोबल गिर सकता है जो देश हित में नहीं है. मसलन भारतीय टीम पाकिस्तानियों को हर मैच में धूल चटाएगी, सैनिक पाकिस्तानियों को घुस कर मरेंगे, सैनिकों के सर अपने-आप कटने बंद हो जाएंगे.
  • एक विशेष कार्यक्रम चलाया जा सकता है जिसमें राष्ट्र चेतना के प्रखर गालीवादी लोग सोशल मीडिया पर वामियों और 'हिन्दू हितों के दुश्मनों' को पाठ पढ़ाने के 'गुरबताएंगे. विशेषकर गाली देने का हुनर सिखाया जाएगा.
  • आधुनिक पश्चिमी ज्ञान के स्थान पर वैदिक विज्ञान पर आधारित कार्यक्रम बनाये और दिखाए जायेंगे. इससे देशवासियों के मन में हमारे स्वर्ण अतीत के बारे में स्वाभिमान जगेगा.
  • पाकिस्तान और इस्लाम को सबसे ज्यादा बुरे तरीके से लताडने के लिए प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी.
  • एंकर राष्ट्रहितसे जुड़े मामलों का निपटारा खुद टीवी पर ही करेंगे क्योंकि राष्ट्रहित से जुड़े मामलों को लंबित करना सही नहीं माना जाएगा।
  • किसी भी ऐसे सवाल को टीवी पर नहीं दिखाया जाएगा जो संघ परिवार, भाजपा या मोदी को पसन्द न हो या उनके लिए असहज स्थिति पैदा कर सके.
  • राष्ट्रवादी संस्थान में काम करने वाले हर पत्रकार को पश्चिमी परिधानों का परित्याग कर भारतीय वस्त्र पहनने होंगे. महिलाओं को छोटे कपडे छोड़कर साड़ी पहननी होगी. चूँकि लाज महिला का आभूषण है इसीलिए हो सकता है कुछ टीवी चैनल महिला एंकरों का साड़ी के साथ घूँघट भी अनिवार्य कर दें. फिर हम लोग घूँघट वाली संस्कारी एंकर देख सकेंगे.




    • हर समाचार संस्थान के गेट पर भारत माता की विशाल प्रतिमा स्थापित की जाएगी ताकि संस्थान में प्रवेश करते ही राष्ट्रवाद की पर्याप्त खुराक उन्हें मिल जाए. न्यूज़रूम, कैंटीन और यहाँ तक कि वाशरूम में भी भारत माता की फोटो लगाई जाएगी ताकि किसी का राष्ट्रवाद धीमा न पड़ने पाए और कोई भी कामपंथी’ (वामपंथियों को उनके द्वारा दिया गया नाम) न बन सके.
    • दलित, आदिवासी, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले या समाज के किसी अन्य तबके के लोगों के हित में आवाज़ उठाने वालों को 'वामपंथी' तमगे से नवाज़ने में तनिक भी देरी नहीं लगाई जाएगी. 
    • ऐसे संस्थानों में चाय, काफी की जगह गंगाजल और गौ-मूत्र पिलाई जाएगी.
    • मोदी की चापलूसी एडिटर बनने की विशेष योग्यता होगी. रोज़ शाखा जाने वाले को ही रिपोर्टर बनाया जाएगा.
    • दलितों पर हो रहे किसी भी तरह के अत्याचार को नहीं दिखाया जाएगा क्योंकि इससे वैमनस्य फैलेगा जो देशहित में नहीं है. वैसे भी संघ दलितों के उत्थान के लिए तमाम तरह की योजनायें चला ही रहा है इसलिए मीडिया को इस विषय पर अपना समय व्यर्थ करने की जरूरत नहीं समझी जाएगी.
    • संस्थान के हर कर्मचारी को साल में एक बार लिखित रूप में अविरल देशभक्तिका शपथ पत्र देना होगा. संघ का कोई एक शिविर करना अनिवार्य किया जा सकता है.
    • आदिवासियों पर कोई ग्राउंड रिपोर्ट नहीं की जाएगी क्योंकि राष्ट्र हित में कुछ चीजें दबा लेनी चाहिए. विशेषकर वो जो बहुसंख्यकों के हित में न हों और आदिवासी बहुसंख्यकों के हित में नहीं हैं.
    • मोर्निंग स्लॉट में केवल गीता के उपदेश दिए जाएंगे. किसी और धर्म के उपदेशों को दिखाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि भारत के सभी लोगों का जड़ सनातन धर्म है. उनके पूर्वज भटक कर दूसरे धर्म में चले गए थे इसीलिए कायदे से वे सभी सनातनी ही हुए और गीता का उपदेश ही उनके लिए हितकारी होगा.
    • सरकार से एक कदम जाकर उसके शानदारयोजनाओं की जानकारी दी जाएगी. जैसे दो हज़ार के नोट में चिप लगाया गया था.
    • गद्दारगाँधी और नेहरू की फोटो न्यूज़रूम से हटाकर वीर सावरकर, गोडसे और बल्लभ भाई पटेल के चित्र लगेंगे. संघ चालक और मोदी तो परम पूज्यनीय होंगे ही.


    सरकार भी नहीं हटेगी पीछे
    सरकार भी देशभक्त पत्रकरों को मदद करने में अपना हाथ पीछे नहीं खींचेगी. उन्हें हर तरह की सुविधाएँ मुहैय्या करायी जाएंगी.
    • मसलन ऐसे 'सपूतों' को सुरक्षा दी जा सकती है. जैसे सुधीर चौधरी को जेड श्रेणी सुरक्षा दी गई है. पत्रकार सुरक्षा घेरे में पत्रकारिता करेंगे.
    • ऐसे पत्रकारोंको प्रेस कांफ्रेंस तक में जाने की जरूरत नहीं  होगी. विज्ञप्ति उनके दफ्तर पहुंचा दी जाएगी.
    • एनडीटीवी जैसे देशद्रोही चैनलों को एक दिन के लिए नहीं हमेशा के लिए बंद किया जाएगा. रवीश जेल जाएंगे.
    • सरकार वरिष्ठ और बड़े नामोंवाले पत्रकारोंकी एक समिति गठित कर सकती है जो संस्थानों के कार्यक्रमों और चाटुकारों’ (अब इन फीचरों के साथ मैं उनको पत्रकार नहीं कह सकता. सॉरी.) को राष्ट्रवादीहोने का प्रमाण पत्र देंगे.

    बढ़िया है न पत्रकारिता का राष्ट्रवादी मॉडल मॉडल?

    Sunday, May 14, 2017

    ...तो मां बनने को तैयार हैं आप?

    सुबह से ही सोशल साइट्स पर मदर्स डे से सम्बंधित पोस्ट पढ़ रहा हूँ. हर कोई अपने-अपने तरीके से मां के प्रति अपना प्रेम प्रकट कर रहा है. कोई मोबाइल में पड़े हजारों फ़ोटोज़ के बीच अपने मां को ढूंढ रहा है तो कोई फोटो के ऊपर लिखने के लिए अच्छा कैप्शन ढूंढ रहा है. कई लोग यह नहीं तय कर पा रहे कि मां की कौन सी फोटो डालें जिस पर लोग 'गॉर्जियस', 'ब्यूटीफुल', 'अवसम' जैसे कमेंट करें. मां के प्रति हमारी भावनाएं आज उफान पर हैं. आज हमारे भावनाओं के समंदर में ज्वार उठ खड़ा हुआ है. ज्वार के साथ एक बड़ी दिक्कत है. इसकी नियति में भाटा हो जाना लिखा है.

    बरसाती केवल मेढक ही नहीं होते, हमारे ज़ज्बात भी बरसाती होते हैं. अलग-अलग दिन, अलग-अलग तरह की बारिश होती है और हर बारिश के हिसाब से हम खुद को बदल लेते हैं. आज मदर्स डे की बारिश है, कल फादर्स डे की होगी, परसों वैलेंटाइन डे की, नरसों टेडी डे की और उसके बाद रोज़  डे, थैंक्यू  और पता नहीं कितने और डे... मदर्स डे को मां सबसे ऊपर है, वैलेंटाइन डे को प्यार सबसे ऊपर होगा और टेडी डे को जिंदगी में टेडी सबसे महत्वपूर्ण चीज बन जाएगी। हर नए दिन में नई प्राथमिकताएं।

    भावनाएं सेंसेक्स हैं, रोज नई ऊंचाइयों पर होती हैं. हम निवेशक हैं. हमें लगता है यही वह पॉइंट है जहाँ सबसे ज्यादा फायदा है. हर दिन हम अपने हिस्से की भावनाओं को किसी ‘डे’ नामक ब्रोकर से तुडवाकर उसे बाजारू बना देते हैं.

    मैं उलझन में हूँ. मुझे क्या करना चाहिए? अपनी भावनाओं को बाजारू बना दूँ? एक फोटो अपलोड करके कुछ अच्छा सा लिख दूँ? क्या मां बस एक फोटो है और हमारे जीवन में उसका योगदान बस कैप्शन तक सीमित है? क्या हम मां को किसी एक देह, फोटो, किसी याद तक समेट सकते हैं? मेरी मां कौन है? सिर्फ वो जिसने मुझे जन्म दिया?
    (फोटो क्रेडिट: juliapelish.com)

    नहीं। 'मां' शब्द की अभिव्यक्ति मात्र उस महिला से नहीं हो सकती जिसने मुझे जन्म दिया है. कोई भी भौतिक वस्तु मां शब्द को नहीं निरूपित कर सकती है. मां एक भावना है, एक विचार है. मां एक खूबसूरत अहसास है. एक ऐसा एहसास जो हर अच्छे-बुरे वक्त में हमारे साथ परछाई के तरह चलता है.

    याद कीजिए जब कभी रात के 10 बजे किसी सूनसान सड़क पर किसी डरी-सहमी लड़की को देखकर आपके मन में उसके प्रति चिंता के भाव आयें थे। वो चिंता नहीं थी आपका ममत्व था. उस समय आप आप नहीं थे. उस समय आप मां हो गए थे. जब उस डरी लड़की ने सड़क पर गुजर रही किसी गाड़ी की हेडलाइट के उजाले में आपके आँखों में कुछ देखकर आपके बैक सीट पर धीरे से बैठ गयी थी। तब उसने आपके आँखों में मां देखा था. जब आपका कोई मित्र एसएससी में चौथी बार सिर्फ 2 नंबर से लटक जाने के बाद फूट-फूट कर रो रहा था. आपने उसे संभाला था. उसे हिम्मत न हारने वाले किस्से सुनाये थे, आपने उसका सिर अपने कंधे पर रखकर उसके बालों में प्यार से हाथ फेरा था और उसके साथ जब आप भी फूट कर रोए थे. तब आप आप नहीं थे. आप मां हो गए थे. आप तब भी मां थे जब आपने किसी दलित, आदिवासी, गरीब, किसान के ऊपर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज़ बुलंद किया था.

    हम सब के भीतर 'कुछ' मां है. किसी के अन्दर थोड़ा ज्यादा किसी के अन्दर थोड़ा कम. हमें अपने अन्दर के मां को पहचानना है. अपने अन्दर के 'मां' वाले हिस्से को थोड़ा बढ़ाना है. मां के नाम पर रोज़ निकालने वालीं हजारों गालियों को बंद करना है. अगर हम यह सब कर पाए तो मदर्स डे की सार्थकता होगी. नहीं तो यह 'डे' बरसात बन जाएगा और हम मेंढक, डे प्रोडक्ट हो जाएगा और हम खरीदार।

    तो बताइए आप मां बनाने को लिए तैयार हैं?