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Tuesday, September 13, 2016

जेएनयू अध्यक्ष कॉमरेड मोहित के नाम खुला पत्र

आदरणीय कॉमरेड मोहित पाण्डेय जी,
जानकर हर्ष हुआ कि आप उसी विश्वविद्यालय से पढ़कर निकले हैं जहाँ मैं अभी पढ़ रहा हूँ। यानि आप मेरे अग्रज हुए। अपनी संस्कृति (जिसे आप मनुवादी कहते हैं) के अनुसार चूँकि हम अपने से बड़ों को प्रणाम करके उनका अभिवादन करते हैं, मन कर रहा है कि आपको प्रणाम करूँ।  पर डर लगता है कि कहीं आप मुझे ब्राह्मणवादी या मनुवादी न ठहरा दें...। फिर कैसे आपका अभिवादन करूँ ? मुझे पता है.., आपको 'लाल सलाम' पसंद आएगा।  पर लाल सलाम पेश करने वालों ने देश-दुनिया में जो कुछ किया है उससे मेरा मन विचलित हो जाता है।  मुझे लगता है कि जिस दिन इस लाल सलाम के नारे में दुनिया के करोड़ों बेगुनाह लोगों के खून की सड़ांध आपके नथुनों तक पहुंचेगी, इस्तेकबाल करने वाले ये लफ्ज़ आपको माँ-बहन की गाली से बढ़कर लगने लगेंगे।  ऐसा मैं हरगिज़ नहीं चाहूंगा। आपका अज़नबी अनुज होने के साथ-साथ मैं उस विद्यार्थी परिषद् का सदस्य भी रहा हूँ जिसकी आपने जेएनयू से अर्थी निकाल दी। मैंने आपके अध्यक्षीय चुनावी भाषण को सुना है। उसमें आपने कहा था कि जेएनयू ही देश में असली प्रतिपक्ष है। यानि आप विपक्ष की महत्ता को मानते हैं।परंतु पता नहीं क्यों आप लोगों को अपने विश्वविद्यालय में प्रतिपक्ष की मौजूदगी नहीं बर्दाश्त हो रही। असल में मानव अधिकार, प्रतिपक्ष, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और यहाँ तक की लोकतंत्र...। आप लोगों के मुंह से ये सारी बातें केवल नारों में अच्छा लगता है। आप जिस विचारधारा के झंडाबरदार बने हैं, उसने पूरी दुनिया में इन मूल्यों के साथ कैसा बलात्कार किया है, यह बात किसी से छुपी नहीं है। खैर, आपके अर्थी निकालने या पुतला दहन करने से विद्यार्थी परिषद् का अस्तित्व नहीं खत्म हो जाता। हमारा बढ़ा हुआ वोट प्रतिशत इस बात का गवाह है कि जेएनयू से हम जाने वाले नहीं, अपितु हम आने वाले हैं। आप और आपके लोगों का यह घिनौना कृत्य आपकी 'खोखली और मृतप्राय' होती विचारधारा का संकेत है। हाँ, खोखली और मृतप्राय...। इन्ही दो शब्दों से काम चला रहा हूँ। आपकी जमात के विद्वानों ने असहिष्णुता की परिभाषा देते हुए इसका मतलब बताया था - किसी दूसरे के विचारों को न सुनना।  आपकी परिभाषा के अनुसार कायदे से आपको 'असहिष्णु' कहना चाहिए। परंतु सहिष्णुता और असहिष्णुता का  सर्टीफिकेट बाँटने वाली एजेंसियों पर भी तो आपके कुनबे का ही एकाधिकार है।

माखनलाल विवि से पढ़े हैं पंडित जी

बहरहाल, आप और आपके संगठन को जीत की हार्दिक शुभकामनाएं। कहते हैं सफलता अपने साथ नई जिम्मेदारियां लेकर आती है। इस जीत के बाद आपकी जिम्मेदारियां भी बढ़ीं हैं। बड़े दुर्भाग्य की बात है, आप के संगठन से देशप्रेमियों को कोई उम्मीद नहीं रह गयी है। आपके ऊपर सबसे बड़ी जिम्मेदारी है उस मर गई उम्मीद को दोबारा जिन्दा करना।  आपका अनुज होने के नाते आपसे कुछ शिकायतें हैं, कुछ सलाह, तो कुछ सवाल भी।  उम्मीद है आप मेरी
 बातों पर जरूर गौर करेंगे-




  • उम्मीद है कि आपके कार्यकाल के दौरान 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' के नारों से जेएनयू परिसर नहीं गूंजेगा। महोदय, आप सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाइए, हम आपके साथ हैं। आप कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश में मानवाधिकारों के हनन और उन पर हो रही ज्यादतियों पर आवाज़ उठाइए, हम आपके साथ हैं।  आपको #ऑक्यूपाई यूजीसी जैसा कोई और आंदोलन चलाना होगा तो हमको जरूर बुलाइयेगा। मैं क्या, देश का अधिकतर नौजवान आपके साथ खड़ा मिलेगा।  पर बड़े भाई ! बड़ा दर्द होता है... जब आप लोग देश को तोड़ने की बात करते हो। 1 रूपये की माचिस पर भी टैक्स देकर देश को समर्थ बनाने में लगे हम लोग देश के टुकड़े होने की बात नहीं सुन सकते।  
  • भैया, ये मनुवाद-मनुवाद का खेल खेलना बंद कर दीजिये।  मनुवाद के नाम पर गुमराह मत कीजिये देश के नौजवानों को।  हमने आज तक कभी मनुस्मृति को अपनी आँखों से देखा नहीं है, छूने की बात तो छोड़ ही दीजिये।  दिल पर हाथ रखके बताइयेगा, जेएनयू आने से पहले मनुस्मृति को कभी पढ़ा था आपने? जिस मनुस्मृति को हमने देखा नहीं, छुआ नहीं, उसको जलाकर, उसका नाम बार-बार उछालकर आप लोग क्या साबित करना चाहते हो ?
  • ये जो लाल और नीले रंग (लाल-वामपंथ, नीला-आंबेडकरवाद) को एक करने की योजना आप लोग बना रहे हैं, उससे आप लोगों का राजनीतिक हित तो सध जायेगा, पर इस देश का बड़ा नुकसान हो जाएगा। हम मानते हैं कि हमारी वर्ण व्यवस्था में समय के साथ खामियां आ गयी थीं। आज हम उनसे लगातार लड़ रहे हैं और वो धीरे-धीरे समाप्त हो रही हैं । दलितों में बदले की भावना भड़काकर उन्हें हमसे लड़ाइए मत। अपने इस 'वर्ग संघर्ष' की संकल्पना में थोड़ा बदलाव कीजिए।  
  • जेएनयू से आप लोग समय-समय पर अंतरराष्ट्रीय समस्याओं पर आंदोलन, सभा, गोष्ठी वगैरह करते रहते हैं। अवाम पर हो रहे जुल्मों-शितम की आवाज़ को बुलंद करते रहे हैं। फलस्तीनियों के लिए आप लोगों का प्यार जग-जाहिर है; होना भी चाहिए। पर कभी बेचारे तिब्बतियों, बलूचों, पाकिस्तानी हिंदुओं, यूक्रेनियों और कुर्दों का भी हाल-चाल ले लीजिए। 
  • कश्मीरियों के दर्द को आप के जमात के लोग अपना दर्द समझते रहे  हैं, एक नज़र अभागे कश्मीरी पंडितों पर भी डाल दीजिये।  आप के भाई लोगों ने तो उन गरीबों की ओर से मुंह मोड़ रखा है।  उम्मीद है आप उनके हकों-हुकूक की आवाज़ उठाएंगे।
  • जेएनयू में मुझ जैसे गरीब छात्र अपने माँ-बाप के सपनों को पूरा करने के लिए बड़ी उम्मीद से पढ़ने आते हैं। आप से निवेदन है कि उन बेचारों का कैंपस प्लेसमेंट होने दें। हर छात्र आपकी तरह क्रन्तिकारी नहीं हो सकता। अपने विधारधारा के चक्की में उसे न पीसिए।
  • आप निर्भीक और नवाचारी लोग हैं। कृपया कभी संघ और विद्यार्थी परिषद्  के उन निर्दोष कार्यकर्ताओं की आवाज़ भी बनिए, जिन्हें केरल और पश्चिम बंगाल में आपके लोग सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार देते हैं क्योंकि उनकी विचारधारा आपसे मेल नहीं खाती।  
  • निवेदिता मेनन आपके धड़े की फायरब्रांड प्रोफेसर हैं। पता नहीं क्यों कभी-कभी मेरा मन कहता है कि 'प्रोफ़ेसर' शब्द को दोबारा परिभाषित करना चाहिए। उन तक मेरा सन्देश पहुंचाइएगा कि कश्मीर, अरुणाचल या देश का कोई अन्य भाग हमारे लिए महज़ एक जमीन का टुकड़ा नहीं है। उससे हमारी भावनाएं जुडी हैं।  हज़ारों वर्ष पुरानी अपनी संस्कृति और सभ्यता से उनसे हम गुंथे हुए हैं।  इस देश की एकता और अखण्डता के लिए देश के नौजवानों ने अपना बलिदान दिया है,जेएनयू में जनता के मोटे पैसों पर बैठकर जहर नहीं उगला है।  उन्हें कहियेगा की गलत तथ्य प्रस्तुत कर लोगों को गुमराह न करें।
                                                                   और हाँ, ये ग़लतफ़हमी कभी मत पालियेगा कि आपने जेएनयू को जीत लिया है। जेएनयू आपका अंतिम किला है जिसे आप लोग बस बचाने में सफल हो पाए हैं। सोचिये एक अकेला विद्यार्थी परिषद् आप लोगों के लिए इतना बड़ा खतरा हो गया कि आप लोगों को आपस में हाथ मिलाना पड़ा। क्या ये आपकी रणनीतिक और नैतिक हार नहीं ? वैसे, देश की जनता 9 फ़रवरी को इतनी जल्दी नहीं भूलने वाली। अतः संभलकर चलिए अब, नहीं तो केरल से भी हाथ धो बैठेंगे। फ़िलहाल आशा करते हैं, लोगों को लड़ाने की बजाय आप उनकी आवाज बनेंगे। 

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Sunday, September 11, 2016

ख़त लिखता हूँ

मैं लेखक नहीं हूँ, और न ही मैं बनना चाहता हूँ. फिर भी मैं लिखूंगा, ऐसी कवितायेँ, जिनका कोई अर्थ न होगा। मैं लिखूंगा, ऐसी कहानियां , जिनकी कोई परिणति न होगी.. मैं ऐसी गजलें भी लिखूंगा, जिसमे न सुर होगा न ताल। मैं लिखूंगा और लगातार लिखूंगा... क्योंकि मुझे लेना है बदला, और चिढाना भी है, उस "मैं" को , जिसने किया है मेरे साथ भेदभाव.. मुझे, लेखकीय गुण न देकर..
मैं लिखूंगा.. रातों में, बरसातों में, किसी सूनी सड़को पे, या किसी तैरते सपने पर.. मैं खोजूंगा, तन्हाइयों में खुद को, इस कलम से, उन शब्दों को .. जिसने उड़ाया था, मज़ाक मेरे "मैं" होने का.. मैं थिरकाउंगा, कीबोर्ड पर अपनी अँगुलियों को.. मैं सहलाउंगा, बिना अर्थो की अपनी रचनानाओं को.. हाँ जनता हूँ ना, ये भी नहीं छपेगी.. फिर भी मैं लिखूंगा, उन तमाम प्रेम पत्रों की तरह, जिनको हर बार मोड़कर छुपा देता हूँ, तकिये के लिहाफ़ में.. मैं लिखूंगा, क्योंकि उम्मीद है, शायद ये छपेंगी एक दिन, या मेरा खत पहुंचेगा, उस शख्स तक, जिसे बताना चाहता हूँ ढेर सारी बातें.. नहीं! मैं लेखक नहीं हूँ, क्योंकि मैं कविता नहीं खत लिखता हूँ..

Friday, September 2, 2016

....क्योंकि रात हमारी है, काके !

रात में जगना एक अलग अहसास देता है। रात में सोने वालों को शायद पता भी न हो कि वे सो कर कितना कुछ खो रहे हैं ? रात के आगोश में आप वो तमाम काम कर सकते हैं जो जालिम दिन का उजाला नहीं करने देता। रात में आप सोच सकते हैं। अपने घर के आराम बिस्तर पर सोती हुई उस लड़की के बारे में जिसके लिए आपने गलियों के चक्कर काटे, मोहल्ले के 'अच्छे लड़कों' वाली छोटी सी लिस्ट में से अपना नाम कटवाया। जिसके लिए कोचिंग की अपनी क्लास को छोड़कर रास्ते में अपनी साइकिल लगाए खडे रहे ताकि उस चांद का एक झलक पा सकें। हां, बिल्कुल ! रात में आप उस चांद से चेहरे को जी भर कर याद कर सकते हैं जिसके लिए आप रात-रात तक जागे हैं। इस उम्मीद में कि शायद उसका फोन आ जाए। आप उन यादों को ताजा कर सकते हैं जब पहली बार आप मिले थे उससे। गली के उस मोड़ पर, जिसके किनारे सरकारी गोदाम की जर्जर होती दीवार पर ‘देखो गधा मूत रहा है‘ लिखा होने के बावजूद पेट भर कर मूता करते थे । जैसे वे खुद को गधा मानने को तैयार न थे। या फिर लेखक की इस ज्यादती पर ‘पुरस्कार वापसी' सरीखा आन्दोलन चला रहे थे।
साभार :www.pinterest.com
याद कीजिए रोज नाक बिचका कर पार करने वाली उस जगह पर आप कैसे खडे थे। घण्टों.......। क्योंकि उस समय आपके साथ कोई था, जिसकी कमी आपको आज तक खलती है। इसी रात में आप उस मनहूस समय को भी याद कर सकते हैं जब आप ने उसकी मजबूरी समझे बिना उसको बेवफा से शुरू करके र’डी तक फकत गालियां दी थी आपने। उस गलती के लिए रात में आप अपने आप को गरिया सकते हैं, झपड़िया सकते हैं। आप कुछ भी कर सकते हैं। रात में । आप सुट्टा मारिए, या मेरी तरह नए हैं तो जेब से निकालिए कमला पसंद की वो पुड़िया।  जो आप एक बार खरीद कर पांच बार खाते हैं। निकालिए और फांका मार लीजिए, बिना इसके परवाह किए कि कोई आपको देख लेगा। स्पेशियली वो जो आपको आज-कल कनखियों से देखा करती है। रात अपना यार है। इसके आगोश में खता होने का कोई चांस नहीं है बाॅस।  आप खुलकर खेलिए। अपने आप से। दारू से। सिगरेट से। या फिर किसी हसीन लड़की के तस्वीर से। देखिए आप। वो फिल्में जिसे दिन में देखने पर लोग मुंह बिचकाते हैं। या फिर कोई और दिव्य क्रिया कीजिए। इस निपट अकेले में। अरे नहीं! यह अकेलापन नहीं। यही तो वह महफिल है जहां हमारी आपकी सुनी जाती है। रात की महफिल आपकी है। दिन की ? अमां मियां ! वो महफिल किसी की हो पर आपकी तो नहीं है। हर कोई अपना सुनाए जा रहा है। आपको सुनने में कौन दिलचस्पी रखता है। मित्र ! यह भी बढ़िया मजाक है। मित्रता के नाम पर दिखावा है। हर कोई अपनी सुनाना चाहता है। महफिल है आपके यादों की। यही वो समय है जब आप अपने आप से, अपने वजूद से मिल सकते हैं। नहीं, घबराइए मत। इस समय आपको टोकने वाला कोई नहीं होगा। 
आप पढ़ सकते हैं तुलसीदास से लेकर खुशवंत सिंह और चेतन भगत तक। इंडिया टुडे से लेकर मनोहर कहानियां तक। आप निजात पाए रहेंगे, उस बिन मांगे सलाहों से जो पढ़ने में भी अच्छा बुरा का भेद करते हैं। आप सावरकर को भी पढ़िए और लावोस्की को भी। इस समय ऐसा कोई नहीं जो आपके हाथ में किसी किताब विशेष को देखकर राष्ट्रवादी या वामपंथी नामक बाजार में आई नई गालियों से नवाज दे। यही वो समय है जब आप मुक्त होकर सोच सकते हैं। आपके विचारों में डीटीसी बसों के हाॅर्न का शोर नहीं होगा। सड़क पर किसी बाइक के आगे आ जाने पर न ही कोई लट्ठमार कर्कश जट्ट आवाज  सुनाई देगी- ‘अबे भों*ड़ी ! अंधा है के।' 
या फिर, लिखिए....। महबूब की यादें रूमानी। पहले सेक्स की कहानी। वो लड़की अंजानी। कोई फितरत पुरानी।  या लिखिए उस पल की डायरी, जब आपको लव लेटर का जवाब थप्पड़ से मिला था। या फिर बचपन वह डर लिखिए जब चाचा आपको अकेले कमरे में बन्द कर घूमने चले गए थे और आपको लग रहा था कि बस अभी सांप लकड़ी के पल्ले और दरवाजे के बीच उस पतली सी दरार से आएगा और आपको धर दबोचेगा। अरे! उस हालात के मारे गरीब चोर के आंखों की कहानी लिखो न। जो 50 किलो गेहूं चुराने पर चैराहे पर सरेआम पीटा गया था। आप चाहते हुए भी कुछ न कर पाए थे। 

आप नाचो, गाओ, पढ़ो, लिखो, सोचो.....। आप हर वो काम करो जो दुनिया आपको दिन के रोशनी में नहीं करने देती। क्योंकि.... काके! रात हमारी है। सिर्फ हमारी। 

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