( पश्चिम बंगाल के चुनाव में हिंसा ओर मारकाट की घटनाएँ आम हैं पर जब पांचवीं में पढने वाले एक बच्चे को सिर्फ इसलिए पीट-पीट कर बेहोश कर दिया जाता है कि उसने खेलने के लिए किसी दल का बैनर फाड़ लिया था तो मानवता शर्मसार हो उठती है. जी हाँ ! पूर्वी कैनिंग विधानसभा सीट के हरिहरपुर गाँव में तृणमूल कोंग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ऐसा करामात किया है. पढ़ें उस 9 साल के नन्हे बच्चे की डायरी ....)
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लगातार मिलते जनसमर्थन से दीदी के गुंडे के हौसले सातवें आसमान पर हैं |
उस दिन अच्छी हवा चल रही थी. मैं पतंग उड़ाना चाहता था. अप्रैल महीने का अंत
चल रहा था. मैं जानता था कि अब्बा के 3000 महीने के अल्प आय में
से इस समय अम्मी पतंग के लिए रूपये देने से रहीं. तभी मेरी नज़र सामने के खम्भे पर
हवा के थपेड़ों से फडफडाते हुए बैनर पर पड़ी. बस मिल गया. वह बैनर नहीं पतंग है. जैसे वो खम्भे पर न लटका हो, दूर आसमान में तारों से
कबड्डी खेल रहा हो और मैं ! मैं अपने हाथों में उसकी डोर लिए हुए पड़ोस में खेलने गये एक छोटे बच्चे की
माँ की तरह कह रहा हूँ कि तू बहुत थक गया है, आजा आराम कर ले फिर खेलने जाना. इन्ही
हसीन ख्वाबों में डूबा मैं बरबस खम्भे की ओर चल पड़ा. खयाली पतंग की डोर अभी तक
मेरे हाथों में थी. मैंने जोर लगा कर खींचा. बैनर धडाम की आवाज के साथ जमीन पर आ गिरा.
इस बैनर से बड़ा पतंग बन सकता है. बड़ा.....वाला. इतना बड़ा जितना किसी के पास नही है.
न शाकिर के पास, न मुन्नन के पास और न ही उस भूरे, घुंघराले बालों वाले अब्दुल के
पास. मुझे नए प्रयोग करना अच्छा लगता है. मैं हर चीज में कुछ नया खोजता हूँ. ऐसा
मेरे दादा ने मुझे सिखाया है. मैं बना रहा
हूँ ऐसा पतंग जो पानी बरसने पर भी उड़ सके जब सब अपने घरों में दुबके बैठे हों. मैं
इसमें लगाउंगा, बहन शकीना के उस नीले दुपट्टे के टुकड़े को. जिसको बकरी ने खूंटी से
खींचकर कुतर दिया था. मैं पतंग में बैनर के तीन गुब्बारे जैसे दिखने वाले फूलों को
एकदम बीचो-बीच रखूँगा ताकि रिमझिम बारिश के बीच जब पतंग उड़े तो फूलों को मिल जाये
पानी की फुहारें. और वे खुले नीले आसमान में उड़ते हुए मुझे कहें-“थैंक्यू”. अचानक
मेरे तरफ पांच-छह लोगों की दौड़ने की आवाजें आने लगीं. वे कुछ बुदबुदा रहे हैं. नहीं
शायद गरिया रहे है. धमाक-धमाक. फट-फट. फटाक-फटाक. भच्च....मुंह से लाल-लाल कुछ
निकल पड़ा. कानों में सांय-सांय की आवाज़. सन्नाटा.... बेहोशी.
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| अपने बाबा के साथ पीड़ित शाहिल मुल्ला (फोटो :इंडियन एक्सप्रेस) |
मेरा नाम शाहिल मुल्ला है . मैं पांचवी में पढता हूँ. परिवार में 6 लोग हैं. मेरा घर पश्चिम बंगाल के हरिहरपुर गाँव में पड़ता है. अभी मैं अपने एक कोठरी के घर में
चारपाई पर लेटा हूँ. कमरा छोटा है पर हम रह लेते हैं इसमें. दो लोग चारपाई पर सो
जाते हैं बाकी सब जमीन में. आह! बहुत दर्द हो रहा है सिर में. लगता है जैसे किसी
ने बड़ा सा पत्थर मेरे सर पर दे मारा हो. मेरे होंठ सूजे हुए हैं. माँ ज्यादा करवट
नहीं लेने देती कहती है डॉक्टर ने मना किया है. कमर में चोट की वजह से. अम्मी के आँखों
से आंसू निकल रहे हैं. वो बगल में बैठी है, जबसे मेरी आँख खुली है. वो मेरे माथे
पर कपडे की पट्टी रख रही है. पट्टी गीली है. उसके आंसुओं से या पानी से ? पता
नहीं. वे मुझे दीदी के उस गंदे आदमी अएजुल सरदार के पास ले गए थे. उसके सामने उन
गुंडों ने मुझे बहुत मारा. बोले तुम्हारा बाप माकपा का मेंबर है. एक दिन हम तुम सब
को जान से मार देंगे. मैं मार से बुरी तरह बेहोश हो गया था. मुन्नन कहता है कि
बाबा मुझे गाँव के बाहर बड़े से खाली मैदान में से उठाकर लाये हैं. लोग कहते हैं कि
वे ममता दीदी के आदमी थे. लोग दीदी को तो अच्छा कहते हैं फिर उनके आदमियों ने मुझे
मारा क्यूँ ? मैंने क्या किया था? मैं तो केवल पतंग बनाना चाहता था. मैं अब कभी
पतंग नहीं उड़ाउंगा, नहीं तो वो मुझे फिर से मारेंगे.


