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Wednesday, May 4, 2016

वाह दीदी ! तू और तेरे गुंडे..

( पश्चिम बंगाल के चुनाव में हिंसा ओर मारकाट की घटनाएँ आम हैं पर जब पांचवीं  में  पढने  वाले  एक बच्चे को सिर्फ इसलिए पीट-पीट कर बेहोश कर दिया जाता है कि उसने खेलने के लिए किसी दल का बैनर फाड़ लिया था तो मानवता शर्मसार हो उठती है. जी हाँ ! पूर्वी कैनिंग विधानसभा सीट के हरिहरपुर गाँव में तृणमूल कोंग्रेस के कार्यकर्ताओं ने ऐसा करामात किया है. पढ़ें उस 9 साल के नन्हे बच्चे की डायरी ....)

लगातार मिलते जनसमर्थन से दीदी के गुंडे के हौसले  सातवें आसमान पर हैं 


उस दिन अच्छी हवा चल रही थी. मैं पतंग उड़ाना चाहता था. अप्रैल महीने का अंत चल रहा था. मैं जानता था कि अब्बा के 3000 महीने के अल्प आय में से इस समय अम्मी पतंग के लिए रूपये देने से रहीं. तभी मेरी नज़र सामने के खम्भे पर हवा के थपेड़ों से फडफडाते हुए बैनर पर पड़ी. बस मिल गया. वह बैनर नहीं पतंग है. जैसे वो खम्भे पर न लटका हो, दूर आसमान में तारों से कबड्डी खेल रहा हो और मैं ! मैं अपने हाथों में उसकी डोर लिए हुए पड़ोस में खेलने गये एक छोटे बच्चे की माँ की तरह कह रहा हूँ कि तू बहुत थक गया है, आजा आराम कर ले फिर खेलने जाना. इन्ही हसीन ख्वाबों में डूबा मैं बरबस खम्भे की ओर चल पड़ा. खयाली पतंग की डोर अभी तक मेरे हाथों में थी. मैंने जोर लगा कर खींचा. बैनर धडाम की आवाज के साथ जमीन पर आ गिरा. इस बैनर से बड़ा पतंग बन सकता है. बड़ा.....वाला. इतना बड़ा जितना किसी के पास नही है. न शाकिर के पास, न मुन्नन के पास और न ही उस भूरे, घुंघराले बालों वाले अब्दुल के पास. मुझे नए प्रयोग करना अच्छा लगता है. मैं हर चीज में कुछ नया खोजता हूँ. ऐसा मेरे दादा ने  मुझे सिखाया है. मैं बना रहा हूँ ऐसा पतंग जो पानी बरसने पर भी उड़ सके जब सब अपने घरों में दुबके बैठे हों. मैं इसमें लगाउंगा, बहन शकीना के उस नीले दुपट्टे के टुकड़े को. जिसको बकरी ने खूंटी से खींचकर कुतर दिया था. मैं पतंग में बैनर के तीन गुब्बारे जैसे दिखने वाले फूलों को एकदम बीचो-बीच रखूँगा ताकि रिमझिम बारिश के बीच जब पतंग उड़े तो फूलों को मिल जाये पानी की फुहारें. और वे खुले नीले आसमान में उड़ते हुए मुझे कहें-“थैंक्यू”. अचानक मेरे तरफ पांच-छह लोगों की दौड़ने की आवाजें आने लगीं. वे कुछ बुदबुदा रहे हैं. नहीं शायद गरिया रहे है. धमाक-धमाक. फट-फट. फटाक-फटाक. भच्च....मुंह से लाल-लाल कुछ निकल पड़ा. कानों में सांय-सांय की आवाज़. सन्नाटा.... बेहोशी.
अपने बाबा के साथ पीड़ित शाहिल मुल्ला                (फोटो :इंडियन एक्सप्रेस) 
             मेरा नाम शाहिल मुल्ला है . मैं पांचवी में पढता हूँ. परिवार में 6 लोग हैं. मेरा घर पश्चिम बंगाल के हरिहरपुर गाँव में पड़ता है. अभी मैं अपने एक कोठरी के घर में चारपाई पर लेटा हूँ. कमरा छोटा है पर हम रह लेते हैं इसमें. दो लोग चारपाई पर सो जाते हैं बाकी सब जमीन में. आह! बहुत दर्द हो रहा है सिर में. लगता है जैसे किसी ने बड़ा सा पत्थर मेरे सर पर दे मारा हो. मेरे होंठ सूजे हुए हैं. माँ ज्यादा करवट नहीं लेने देती कहती है डॉक्टर ने मना किया है. कमर में चोट की वजह से. अम्मी के आँखों से आंसू निकल रहे हैं. वो बगल में बैठी है, जबसे मेरी आँख खुली है. वो मेरे माथे पर कपडे की पट्टी रख रही है. पट्टी गीली है. उसके आंसुओं से या पानी से ? पता नहीं. वे मुझे दीदी के उस गंदे आदमी अएजुल सरदार के पास ले गए थे. उसके सामने उन गुंडों ने मुझे बहुत मारा. बोले तुम्हारा बाप माकपा का मेंबर है. एक दिन हम तुम सब को जान से मार देंगे. मैं मार से बुरी तरह बेहोश हो गया था. मुन्नन कहता है कि बाबा मुझे गाँव के बाहर बड़े से खाली मैदान में से उठाकर लाये हैं. लोग कहते हैं कि वे ममता दीदी के आदमी थे. लोग दीदी को तो अच्छा कहते हैं फिर उनके आदमियों ने मुझे मारा क्यूँ ? मैंने क्या किया था? मैं तो केवल पतंग बनाना चाहता था. मैं अब कभी पतंग नहीं उड़ाउंगा, नहीं तो वो मुझे फिर से मारेंगे.


Monday, May 2, 2016

तीव्र आर्थिक विकास ओर मजदूर हितों के बीच संतुलन


हर वर्ष 1 मई को मजदूरों के नाम पर घडियाली आंसू बहाए जाते हैं. कहा जाता है कि भारत में इस परम्परा की शुरुवात मद्रास में 1 मई 1923 में लेबर किसान पार्टी ऑफ़ हिंदुस्तान नामक संगठन ने किया. हर साल इस तारीख को मजलूमों से रहनुमाई रखने वाले लोग लाल झंडे के नीचे इक्कट्ठे होकर मजदूर हितों की बात करते हैं. इससे उनका हित कितना होता है, ये बाद का मसला है. लाल झंडे के देवता माने जाने वाले कार्ल मार्क्स ने कहा था कि दुनिया के मजदूरों एक हो जाओ. एक होकर क्या करो ? तख्ता पलट कर दो. शासन पर अपना कब्ज़ा कर लो. चाहे इसके लिए तुम्हे खूनी रास्ता ही क्यों न अपनाना पड़े. दुनिया के अनेक देशों में ऐसा हुआ भी. चीन, रूस सहित दुनिया के अन्य देशों सहित भारत में पश्चिम बंगाल एवं केरल जैसे राज्यों में कम्युनिस्ट ओर मार्क्सवादी पार्टियों के नेतृत्व में सरकारें बनीं. यानि मजदूर वर्ग सत्ता में आ गया. सत्ता में आने के बाद मजदूरों का कल्याण होना चाहिए था पर क्या ऐसा हुआ ? चीन ओर रूस में श्रमिकों के शोषण की कहानियां किसी से छिपी नहीं है. कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल में लोगों की स्थिति बदतर ही हुई है. साफ है कि बाहर से लुभाने वाली मार्क्स की विचारधारा मजदूरों का कल्याण न कर सकी. मार्क्स की विचारधारा समस्या के समाधान में केवल एक पक्ष को शामिल करता है. जब बात श्रमिक की हो रही हो तो स्वामी को कैसे भुलाया जा सकता है ? क्या उद्योगपति के हितों की अनदेखी कर श्रमिक हितों की बात व्यवहारिक तरीके से की जा सकती है ? सेवक ओर स्वामी एक दुसरे के बिना अधूरे हैं. तो मालिक और मजदूर के हितों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए? इस बात को समझने से पहले हमें यह समझना होगा कि वास्तव में दोनों चाहते क्या हैं? एक-दूसरे से उनकी अपेक्षाएं क्या हैं ? पहले बात श्रमिकों की. श्रमिक अपने श्रम का उचित और समय पर भुगतान चाहता है. साथ ही वह सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा की भी हसरत रखता है. क्या पता गाहे-बगाहे अगर कोई दुर्घटना घट जाये तो शेष जीवन या उसके न रहने के बाद उसके मातहत बीबी-बच्चे भूखों मरने को बेबस न हों. मोटा-मोटा बस इतना ही चाहता है मजदूर. अब बात उद्योगपति की. कोई भी व्यक्ति मुनाफा कमाने के लिए ही उद्योग शुरू करता है. जैसे-जैसे पूरी दुनिया में बाजारीकरण व निजीकरण का दबदबा बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे माल को सस्ते दाम पर उपलब्ध कराने के साथ-साथ मुनाफा कमाने की चुनौती भी लगातार बढ़ती जा रही है. सस्ते और गुणवत्तापरक माल ही बाज़ारों में टिक पा रहे हैं. परोक्ष रूप से कहें तो बाज़ार में सस्ते ओर गुणवत्तापरक श्रम की जबरदस्त मांग है. यानि नियोक्ता को सस्ता ओर प्रशिक्षित श्रम चाहिए. बात यहीं से बिगड़ना शुरू होती है. बाज़ार में प्रशिक्षित श्रम की भरी किल्लत है. लोगों की काम करने की क्षमता कम है. अपने आपको मुनाफे में रखने के लिए उद्दमी काम का समय बढ़ा देता है जबकि सुविधाएँ काम करता है. वर्तमान युग के मजदूर ओर नियोक्ता हितों के सामने असल समस्या है-उद्योग में अकुशल श्रम का आना. इस समस्या का हल दोनों पक्षों को मिलकर निकलना होगा. हमें श्रम को उद्योग विशेष की प्रकृति एवं मांग के अनुरूप प्रशिक्षित करना होगा. तभी मजदूरों का भी भला हो सकेगा और तेजी से बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां, पुल, बांध, सड़कें, ऊँची-ऊँची इमारतें, बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ आदि बन ओर पनप सकेंगी. आखिर विकास का हमारा यही तो पैमाना है.