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Saturday, February 11, 2017

पत्रकारों का निष्कासन, नए रंगरूट और विश्वसनीयता का संकट

अभी दो दिन से सोशल मीडिया पर बंगाल के नामी मीडिया समूह आनंद बाज़ार पत्रिका से दो सौ पत्रकारों के निकले जाने की खबर चर्चित हो रही है. सोशल मीडिया के की खबर को इसलिए उद्धृत करना पड़ रहा है क्योंकि मीडिया से सम्बंधित अधिकतर ख़बरों को खबरनवीस गटक जाते हैं. अंग्रेजी में नवाचार व मूल्यों की पत्रकारिता करने के लिए स्थापित ‘द क्विंट’ को छोड़ दें तो किसी ठीक-ठाक मीडिया समूह ने इस खबर को रिपोर्ट नहीं किया. ‘द क्विंट’ की भी रिपोर्ट ‘निकाले जायेंगे’ के आधार पर है. सोशल मीडिया पर विभिन्न संस्थाओं के रिपोर्टर व अन्य कर्मियों के पोस्ट की मानें तो आनंद बाज़ार पत्रिका व उसके अंग्रेजी दैनिक ‘द टेलीग्राफ’ से लगभग 200 कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. 10 दिसंबर को लिखे गए एक ‘द क्विंट’ के खबर के अनुसार आनंद बाज़ार पत्रिका में कुल 1200 कर्मचारियों में से लगभग 40 से 50 प्रतिशत कर्मचारियों को बाहर का रास्ता देखना था. यानी आने वाले दिनों में और भी कर्मचारी निकाले गए. खबर के अनुसार, अंदरखाने के लोगों ने बताया कि आनंद बाज़ार पत्रिका ने कुछ समय पहले समूह के अख़बार, टीवी चैनल और अन्य माध्यमों का खर्च कम करने व आमदनी बढ़ाने के लिए अमेरिकी कंपनी ‘हे कंसल्टेंसी लिमिटेड’ के साथ हाथ मिलाया था. अपनी रिपोर्ट में हे ने यह नायाब तरीका सुझाया. इससे कुछ ही समय पहले अंग्रेजी दैनिक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने अपने छह संस्करण बंद कर दिए. एक अनुमान के मुताबिक इन संस्करणों में काम करने वाले वाले लोगों की संख्या 200 के आस-पास है. छोटे से आकार की मीडिया इंडस्ट्री में 400 अनुभवी लोगों को पचा पाना काफी दुष्कर कार्य है.
(फोटो क्रेडिट - www.eremedia.com)
          
अब मामला आता है नए पत्रकारों का. एक अनुमान के मुताबिक अकेले दिल्ली-एनसीआर में 100 से ज्यादा मीडिया कॉलेज हैं जहाँ से हर साल हजारों की संख्या में नए रंग-रूट निकलते हैं. हाल के दिनों में मीडिया जगत में हो रही छटनी और उथल-पुथल से इतना तो तय है कि मीडिया संस्थानों में नयी भर्तियों पर ग्रहण लग गए हैं. सवाल यह है कि बड़ी हसरत के साथ पत्रकार बनाने के सपना और दुनिया बदलने की जिद लेकर दिल्ली आये नवजवानों का क्या होगा? उनके जिद्द का क्या होगा? क्या उन्हें कहीं जगह मिलेगी या मजबूर होकर उन्हें पत्रकारिता के नाम पर गोरखधंधा चलाना पड़ेगा. या फिर ट्रेनिंग व इंटर्नशिप के नाम पर और अधिक लम्बे समय तक शोषण झेलने के लिए अभिशप्त होना पड़ेगा. अगर कहीं नियुक्ति हो भी गयी तो किस कीमत पर? क्या मानकों के अनुसार उन्हें वेतन मिला पायेगा? मुझे एक बड़े हिंदी अख़बार के कुछ लोगों ने बताया कि संस्थान में लम्बे समय तक जमे पत्रकारों को निकालकर नए लोगों को इसलिए रखा जा रहा है क्योंकि उन्हें वेतन कम देना पड़ेगा. मतलब साफ़ है कि मीडिया व मीडियाकर्मियों को और बुरे दिन देखना अभी शेष है.  

एक तरफ रोटी के लिए कोहराम मचा हुआ है तो दूसरी तरफ मीडिया शिक्षण संस्थओं में मोटी रकम पाने वाले शिक्षकों व प्रोफेसरों को ‘मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर’ चिंता खाए जा रही है. मीडिया के कार्यप्रणाली पर स्वघोषित राष्ट्रीय स्तर की गोष्ठियां फैशन बन गयी हैं. सोशल मीडिया पर खबरें शिकायती तेवर के साथ साझा की जा रही हैं. ‘भांड मीडिया’, ‘बिकाऊ मीडिया’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो गया है. अपने नौकरी पर उल्टी लटकती तलवार के साथ किसी पत्रकार से मात्र सच बोलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? संस्थानों में बैठे लोग बखूबी जान रहे हैं कि सम्पादकीय सत्ता का किस प्रकार हनन हुआ है और प्रबंधन का प्रभाव किस हद तक बढ़ गया है. संस्थाओं में एचआर की भूमिका कक्षा के मास्टर सी हो गयी है. नौकरी पर संकट का आलम यह है कि वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने एक बार कहा था कि ‘जरा सा झुकने’ को कहने पर पत्रकार ‘रेंगने’ लगते हैं. प्रबंधन में बैठे लोग चाहते हैं कि ख़बरों को इस प्रकार लिखा जाए जिससे सरकार की कृपा बनी रहे और अधिक से अधिक विज्ञापन मिल सके. यहाँ यह रेखांकित करना आवश्यक है कि पिछले विधानसभा चुनावों से ही आनंद बाज़ार पत्रिका समूह और पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल में छद्म-युद्ध चल रहा था जिससे समूह को सरकारी विज्ञापन बंद हो गए थे. यह समस्या बाजारीकरण, पूंजीवादी व्यवस्था का बढ़ता चलन और मंदी के साथ-साथ उतना ही सामाजिक भी है. दुनिया में कोई भी वस्तु मुफ्त नहीं मिलती है फिर समाचारों को क्यों मुफ्त में बांटा जा रहा है? जिस चीज को मुफ्त में बांटने की होड़ हो उसमे कुछ खोट तो होगा ही. हम एक अच्छा भी और ‘सस्ता भी’ तो छोडिए ‘मुफ्त का’ पाना चाहते हैं. अगर हम मुक्त मीडिया चाहते हैं तो उसके लिए हमें भुगतान करना ही होगा, नहीं तो हमें मीडिया पर घडियाली आंसू बहाना बंद कर देना चाहिए.