लगभग महीने भर पहले
राजधानी के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में घटी देश विरोधी नारेबाजी की घटना ने
राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह के बहस को जन्म दिया. जब बहस देशद्रोह बनाम राष्ट्रवाद
पर छिड़ी तो देशद्रोह व राष्ट्रवाद के परिभाषा पर बहस छिड़ना भी लाजिमी था और ऐसा ही
हुआ. आज देश का बौद्धिक खेमा राष्ट्रवाद के परिभाषा पर अलग-अलग खेमों में बंटा हुआ
है. कन्हैय्या कुमार और उनके साथियों के गिरफ़्तारी के बाद तो जेएनयू में बाकायदा
राष्ट्रवाद पर खुली कक्षाएं आयोजित की गयीं. राष्ट्रवाद मुख्य रूप से पश्चिम से
आयातित संकल्पना है. वाम विचारधारा के विद्वान ऐसा ही मानते हैं. पश्चिम में
औद्दोगिक क्रांति एवं साम्राज्यवाद के उदय के साथ ही राष्ट्रवाद की संकल्पना का उभार
हुआ. पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल में उनके साझा आर्थिक हित थे. पश्चिमी
राष्ट्रवाद का उदय दुनिया के संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की मंसा की पृष्ठभूमि में
हुआ. जिसने पूरी दुनिया को “हम” और “अन्य” में बाँट दिया. यह मूलतः बुर्जुआ
संकल्पना थी. पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल में कुछ साझा पहचान थी . जैसे दुनिया पर
कब्ज़ा ज़माने वालों की नस्ल गोरी थी . वे क्राइस्ट को मानते थे . भौगोलिक एकरूपता
के कारण उनका खान-पान, वेश-भूषा सब एक जैसी थी. यानी पश्चिमी राष्ट्रवाद के मूल
में समानता और एकरूपता थी. उन्होंने अपने आपको दुनिया में सबसे श्रेष्ठ घोषित
किया. इस प्रकार राष्ट्रीय राज्यों का उदय खुद को एक-दूसरे से श्रेष्ठ साबित करने
की पृठभूमि में हुआ. पश्चिमी राष्ट्रवाद के विभाजनकारी स्वरुप को इसी बात से समझा
जा सकता है कि मात्र धार्मिक असमानता के कारण यहूदियों को पश्चिमी देशों ने कभी
अपने यहाँ टिकने न दिया.
भारतीय राष्ट्रवाद अपने प्रकृति के
कारण पश्चिमी संकल्पना से निहायत भिन्न है. हमारा राष्ट्रवाद भारतीय उपमहादीप के
विविधताओं में मौजूद कुछ साझे तत्वों पर आधारित है. वाम विचारक मानते हैं कि भारत
में राष्ट्रवाद की संकल्पना अंग्रेजों के आगमन के साथ आयी जो लगभग पश्चिमी ढांचे
पर आधारित था. परन्तु अंग्रेजों के आगमन से पूर्व शेरशाह सूरी ने ग्रांड ट्रंक रोड
बनवाई जो बहुत सारे राज्यों से होकर गुजरती थी. क्या इस घटना में राष्ट्रवाद के
लक्षण नहीं मिलते ? क्या वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में कोई सड़क कई देशों से बिना
किसी सीमा और रोक-टोक के गुजर सकती है ? मूलरूप से भारतीय राष्ट्रवाद सांस्कृतिक
पृष्ठभूमि पर आधारित है. इसमें ‘हम’ और ‘अन्य’ के विचार के लिए कोई स्थान नहीं है.
भारतीय राष्ट्रवाद ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का उद्घोष करता है. भारतीय राष्ट्रवाद
वैश्विक संसाधनों पर अधिकार ज़माने की बात नहीं करता और न ही ये नस्लीय, धार्मिक या
जातीय समानता की बात करता है. यानी बहुलता इसके जड़ में बसी है. भारतीय राष्ट्रवाद
के इसी विशेषता का परिणाम है कि हमारे देश में जिस भी जाति, नस्ल या धर्म के लोग
आये हमने सबको स्वीकार किया. राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ को राष्ट्रवाद का अगुवा माना
जाता है. वह खुद भी इस बात का उद्घोष करता है. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद उसका प्रमुख
एजेंडा है और यही कारण है कि संघ के मानचित्र के अनुसार भारतीय राष्ट्र में
वर्तमान भारत, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, भूटान और बांग्लादेश तक
का क्षेत्र आता है. संघ दृष्टि में पूरा भारतीय उपमहादीप एक राष्ट्र है. इस प्रकार
का राष्ट्रवाद समावेशी है. बहुलतावादी है. परन्तु दुर्भाग्य से वर्त्तमान समय में
देश में राष्ट्रवाद के अर्थ को बेहद संकुचित कर दिया गया है. आज राष्ट्र का अर्थ
चंद राष्ट्रीय प्रतीकों तक सिमट कर रह गया है जो भारतीय सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को
उसके उद्गम स्थल पर ही झुठलाता है. सबसे मज़ेदार बात यह है कि सांस्कृतिक
राष्ट्रवाद की झंडाबरदार आरएसएस की सहयोगी संस्थाएं ही यह काम कर रही हैं. मसलन
अगर आप भारत माता को माता नहीं मानते तो आप राष्ट्रवादी नहीं हैं. अगर आप महिषासुर
दिवस मनाते हैं तो आप राष्ट्रवादी नहीं हैं और चूँकि आप राष्ट्रवादी नहीं हैं
इसलिए आप देशद्रोही हैं. निरपेक्ष आप रह ही नहीं सकते. राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र
बाँटने वाले आपको निरपेक्ष रहने ही नहीं देंगे. उनके लिए स्त्री-पुरुष के बीच,
दिन-रात के बीच कोई चीज आती ही नहीं है. राष्ट्रवाद पर छिड़ी वर्त्तमान बहस बौद्धिक
समाज के भटकाव को ही नहीं वरन लोगों की संकुचित होती मानसिकता को भी प्रदर्शित
करती है. वैसे भी राष्ट्रवाद की संकल्पना अपने उदयकाल से ही विवादों में रही है.
अपेक्षाकृत अधिक उदार लोग दुनिया में किसी सीमा को नहीं स्वीकार करना चाहते हैं.
पहली नज़र में यह लुभाती है पर क्या बिना किसी सामाजिक इकाई के आधुनिक सभ्य समाज की
कल्पना की जा सकती है ? उदहारण सामने है. पश्चिमी देश अपने टूटते परिवारों से किस
प्रकार जूझ रहे हैं. अतः समाज में राष्ट्र नामक इकाई का रहना तो आवश्यक है परन्तु
वर्त्तमान विकृत राष्ट्रवाद समाज में कलह ही पैदा करेगा. बेहतर होगा यदि हम अपने
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के अति-उदार, बहुलतावादी माडल को लागू करने की दिशा में काम
करें. यह भारत के साथ-साथ विश्व कल्याण के लिए भी उपयोगी होगा.