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Tuesday, September 8, 2015

मचाते रहो...

मचाते रहो

अपने देश ने कितनी ही बड़ी –बड़ी मिशाइलें क्यों ना बना ली हों | ज्ञान – विज्ञान के क्षेत्र में कितनी तरक्की क्यों न कर ली हो पर हम इन्फेक्शन रोकने का तरीका न इजाद कर पाए | अभीभूमि बिल और जीएसटी पर विपक्षी दलों का रोना- पीटना बंद नहीं हुआ था कि ये बीमारी जंगल के आग की तरह सब्जी मंडियों तक आ पंहुची |और कोई एसा है जो मंडी न जाता हो ? अब जो-जो मंडी में गया ,रोने –पीटने की बीमारी सबको होती गयी | फिर क्या था ? हर रशोई में हाय-तौबा मच गया | टी वी चैनलों के आँखों से इतना पानी निकला कि सरकार तक डूबने-उतराने लगी |जब ये कूं-कूहों कि आवाज हरखू काका के पास पहुंची तो उन्हें लगा कि देश पे कोई संकट आ गया है | उनकी राष्ट्रभक्ति जाग उठी | वो देश पर जीने मरने कि कसमें खाने लगे | परमियां....जैसे ही पता चला कि ये सारा रायता इस ‘पियाजिया’ ने फैला रखा है | हरखू काका चारों खाने चित्त ...|अब तो काका बड़े असमंजस में थे | उन्हेंसमझ में नहीं आ रहा था किउनके घर में सड़ने वाला प्याज जिसे ३ रूपये किलो से ज्यादा कोई लेने को तैयार नहीं होता था उसने बड़ी – बड़ीगाड़ियों में घूमने वाले इन पढ़े–लिखे साहबों के आँख में दम करके रखा हुआ है ? अपने प्रेमिकाओं से ब्रेकअप पर जश्न मनाने वाले इन साहसी साहबों को प्याज जैसी निगोड़ी चीज रुला कैसे सकती है | अरे ! ये तो कमाल हो गया | ये वही ‘पियाजिया’ हैना जिसे लेने कि बात पर बनिए-साहूकार मुंह एंठते फिरते थे | गाँव के सभी किसान जान गये कि प्याज ही वह चीज है जो इन साहबों के आँखों में दम कर सकती है नही तो इनके फटफटियों से निकलने वाले धुएं ने उनके नाक में दम करके रखा हुआ था | इन साहबों द्वारा प्याज कि इतनी उपेक्षा ठीक नहीं |काकाके तरह मुझे भी प्याज पे दया आ रही है |बेचारा.....| एकवीपी सिंह साहब का समय था | तूती बोलती थी उसकी| पूरे सब्जी बिरादरी में उसका कोई सानी न था | आंसुओं की नदियाँ बहा करती थीं | तबजुमला चला करता था “वीपी सिंह के देखो राज, 80 रुपया किलो प्याज” | जैसे ही सिंह साहब चलता बने वैसे ही प्याज महरानी का वैभव वैसे ही गायब हुआ जैसे पानी में डिस्प्रिन की गोली | भाजपा की तरह ही लम्बा वनवास झेलकर सत्ता में प्याजलौटी तो विपक्षियों से उनकी सुख-समृधि,उसका वैभव देखा  नहीं जाता| सबसे ज्यादा जलन तो पेट्रोल को हो रहा है |हो भी क्यों ना...? लोग उसे फेसबुकिया ताना जो मार रहे हैं | “जो लोग गाड़ी की टंकी फुल कराके खुशहो रहे हैं उन्हें मै बता दूँ कि अभी-अभीमैंने प्याज के पराठे खाएं हैं”-जैसे जुमलों से तो कान पक गया | वैसे अंदरखाने की बात बता रहा हूँ आपको | पेट्रोल को तो लोग बदनाम कर रहे हैं |असल साजिश तो आलू-टमाटर ने रची है | ‘राजा साहब’ की चर्चाकहीं हो ही नहीं रही |जिस गली देखो महरानी के जलवे हैं |
कवितायेँ,कहानियां और आरतियाँ तक बनने लगी महरानी के शान में | कहते हैं न समय पड़ने पे तीन नाम-परशू,परशुवा,परशुराम| वैसे जो लोग देश के परम्पराओं के बिगड़ने को लेकर चिंतित है उन्हें मै बता दूँ कि हमारी एक परंपरा जो सदियों से चली आ रही है वो न मिटी है न मिटेगी | हम ताली और गाली साथ-साथ देते हैं | मंदिर में ताली और बाहर निकलते ही गाली....| लेकिन महरानी के मामले में एक और परम्परा टूटी | यानी मंडी केबाहर तालीऔर मंडी केअन्दर गाली| बड़ी नाइंसाफी हुई है प्याज के साथ | आप उसे नाहक गरियाते फिरते हैं बिलकुल मोदीजी को गरियाने वालों कि तरह |आखिर प्याज आपसे कहने आया है कि आप उसे खाएं | इतने दिलजले हैं तो न खाएं | उसकीबला से |पर हजरत तुम तो ख’द ही बेजार हुए जाते हो | 80 रुपया लीटर पेट्रोल भरवा लोगे पर बस में कदम न रखोगे | डोमिनोज का पिज़्ज़ा तुम्हारे लिए सस्ता है | 200रुपये का इंटरनेटपैक डलवाते हो तब तुम्हारी जान ना जाती है | प्रेमिका के साथ रेस्टोरेंट में जाने पर वेटर को 100 रुपया टिप देने में तुम्हारी रसोई खतरे में नहीं पड़ती है| 12 पैसे कीमत से बनने वाली कोल्ड-ड्रिंक को 12 रूपये में खरीदने में अपनी शान समझते हो | उसके खिलाफ कभी झंडा नहीं उठाया तुमने | पर 1 रूपये के तंबाकू में चार दिन कामचलाने वाले किसान को उसके उपज का सही दाम मिले तो तुम मरे जाते हो | क्यों..? क्योंकि गाड़ी पे पत्नी को बैठाकर,मूंछों पे ताव धरके मोहल्ले से निकलते हो | अपनी बीबी के आँखों में धूल झोंककर दूसरी महिलायों से चैटियाते हो| ये सब तुमको मंहगा नहीं लगता क्योंकि ये सारी चीजें तुम्हारे ‘शान’ से जुडी हैं | और हम श्रेष्ठकुल के आर्यवंशी अपने ‘शान’ से समझौता नहीं कर सकते |लगातार मचाये जा रहे हो | सब तो वही कर रहे हैं|मै भी | मचाना तो लोगो की फितरत है |उन्हें बस नए-नए मसले मिलते रहें | मैंने अपने हिस्से का मचा लिया है अब आप भी मचाते रहो | क्या.? हल्ला......|

Thursday, August 13, 2015

धरती पर भगवान् .......धोखे मे इन्सान

धर्मक्षेत्र एवं कुकर्मक्षेत्र का पुराना एवं गहरा नाता रहा है | मनुष्य जब अपने हद दर्जे के कुत्सित कार्यों के फलस्वरूप समाज से बहिस्कार एवं विरोध सहते –सहते थक जाता है तो अपने खतरनाक मंसूबों को अंजाम देने के लिए वह धर्म का चोगा ओढ़ लेता है | उसके लिए यह ब्रम्हास्त्र है | यही वह पेशा है जिसमे तर्क –वितर्क की गुंजाइश बहुत कम होती है परन्तु सुरक्षा एवं सम्मान बढ़कर | चोगे को कितनी ही सावधानी से से पकड़ा जाए परन्तु आँधियों के झोके जब चोगा उठता है तो असली चेहरा सामने आ ही जाता है | ताजा घटनाक्रम को ही ले लें | आसाराम,रामपाल और निर्मल बाबा के कारगुजारियों ने जैसे महार्षि अगस्त, सुश्रवा , वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसा अनगिनत ऋषियों की महान परम्परा को कम पलीता लगाया था की सच्चिदानंद गिरी उर्फ़ सचिन दत्ता , राधे माँ एवं सारथी बाबा भी उस जमात में शामिल हो गए | हमारा देश इस बात का गवाह रहा है की यहाँ ऋषि- मुनियों की समृद्ध परम्परा रही है जिसने न सिर्फ धर्म , अध्यात्म जैसे अलौकिक क्षेत्रों में  ऊँचाइयों को छुआ बल्कि विज्ञान , स्वास्थ , राजनीति , कूटनीति आदि लौकिक विषयों में भी एक प्रतिमान स्थापित किया | “जब भी कोई व्यवस्था लम्बे समय तक चलती है तो वह भ्रष्ट हो जाती है |” ख्यातिप्राप्त कवि अलेक्जेंडर फ्रेजर की यह उक्ति धर्मनगरी पर भी बखूबी लागू हुई | अभी हल ही में चर्चा में आये आये तीन घटनाक्रमों को एक साथ समग्रता से देखने पर आस्था के नाम पर लोगों के साथ हो रहे छल का सम्पूर्ण चेहरा बेनकाब हो जाता है | मोटे तौर पर समाज उस व्यक्ति क संत का दर्जा देती है जिसमे काम , क्रोध , मद एवं लोभ जैसे सांसारिक विषयों को विजिटर कर लिया हो या उस दिशा में प्रयत्नशील हो | उपयुक्त कसौटी पर आज के बहुप्रचारित संतों को परखने की कोशिश करते हैं |
                        बीते ३१ जुलाई को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रयाग में नोयडा के बीयर बार , डिस्को और रियल एस्टेट का धंधा करने वाले जिन सचिन दत्ता उर्फ़ सच्चिदानंद गिरि का निरंजनी अखाड़ा के महामंडलेश्वर के रूप में जिस प्रकार पट्टाभिषेक हुआ ,वह संत समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है | उनके अभिषेक के समय दो – दो हेलीकाप्टरों से पुष्प वर्षा की गयी | सादा जीवन – उच्च विचार जैसे महहन परम्परा का गुणगान वे किस मुंह से करेंगे यह कहना मुश्किल है | पूरे कार्यक्रम के दौरान जिस तरह से उत्तर – प्रदेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल सिंह और ओमप्रकाश सिंह मौजूद रहे वह धर्म जगत – राजनीति – कर्पोरेट गठजोड़ दर्शाने के लिए पर्याप्त है | संत का जीवन लोगों के लिए मिशाल होता है | अखिल भारतीय अखाडा परिषद के विवादित राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत नरेन्द्र गिरि की मेहरबानी से महामंडलेश्वर बने सचिन दत्ता के एक होटल बिल से पता चलता है की उन्होंने ५ दिन के लिए  ३८३९१२ रूपये चुकाए जिसमे खाने का बिल शामिल नही था | अक्सर विवादों में रहने वाले सचिन दत्ता के ऊपर पंजाब में धोकाधड़ी मुकदमा दर्ज है | मीडिया में आने वाली ख़बरों की माने तो महामंडलेश्वर बनवाने के एवज में सचिन ने उत्तर प्रदेश सरकार के किसी वरिष्ठ मंत्री को ऑडी कार उपहार स्वरूप भेंट की है | यह सारा खेल हिन्दु परम्पराओं के निर्वाहक साधू – संतों ने खेली | कायदे से वही व्यक्ति महामंडलेश्वर बन सकता है जो सम्बंधित अखाड़े से एक संत के रूप में कम से कम १० सालों से जुडा हो | साथ साथ धर्मशास्त्र का अच्छा ज्ञान होना चाहिए |सनातन धर्म के प्रति समर्पण के साथ साथ उसका निर्विवादित होना भी आवश्यक है | अब किस दिव्य दृष्टि से देखने पर महंत नरेन्द्र गिरि को सचिन में संतों के सारे लक्षण दिखाई दिए यह बात मीडिया को उनसे पूछना ही चाहिए | वैसे भी नरेन्द्र गिरि जी किस मुंह से सचिन से निर्विवादित होने की बात रखेंगे जबकि उनका अपना ही पद विवादों के घेरे में है | ध्यान देने की बात है की मीडिया में उछालने से पूर्व अखाड़े से सम्बंधित या किसी अन्य संत ने इस नियुक्ति के विरोध का साहस नही दिखाया | इससे दो बातें निकलकर सामने आतीं हैं –एक तो यह कि अपराधीकरण के कारण संत समाज में या तो हिटलरशाही मौजूद है या संत समाज के अधिकांश लोग एक जैसे ही हैं जो धर्म का चोगा ओढ़कर अपना व्यापार चलाते हैं और जो सच्चे संत हैं वो इस राजनीतिक दांव – पेंच एवं मीडिया के चमक दमक से बहुत दूर कहीं ब्रम्ह साधना और समाज निर्माण के कार्यों में लगे हैं | जो भी हो इस तरह की घटनाएँ ने सिर्फ करोड़ों हिन्दुओं के आस्था का मजाक बनाती हैं वरन स्वयं धर्म के विनाश का कारण भी बनती हैं | हालाँकि मामला गरमाने पर उन्हें निलंबित कर दिया गया परन्तु जैसा कहा गया कि वे २०-२२ सालों से अग्नि अखाड़े से जुड़े रहें हैं | अगर कोई इतने समय से जुडा रहा है तो निश्चित रूप से उसके बारे में सम्बंधित लोगों को उनकी योग्यता की पूरी जानकारी रही होगी फिर भी उनकी अयोग्यता के बावजूद उन्हें इस पद पर विभूषित क्यों किया गया इस यक्ष प्रश्न का उत्तर सम्बंधित लोगो को देना ही होगा |
                             दूसरा मामला प्रकाश मे तब आया जब स्वयं को दुर्गा का अवतार कहने वाली राधे मां ने अपने गलत कार्यों का विरोध करने वाले एक व्यक्ति को देर रात फोन करके प्रेमपूर्ण बातों मे उलझाने की कोशिश की | इसके बाद तो राधे माँ के करामातों की किताब पृष्ठ दर पृष्ठ खुलने लगा | पंचदशनाम जुना अखाड़ा के इस महामंडलेश्वर की मिनी स्कर्ट में फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हो उठा |उनके ऊपर मुम्बई के कांदीवली थाने मे दहेज़ उत्पीडन हेतु उकसाने का मामला दर्ज हुआ और अश्लीलता फ़ैलाने के आरोप लगे | दरअसल वैश्वीकरण और बाजारीकरण ने जीवन के सभी क्षेत्रों को अपनी जद मे ले लिया है और धर्म भी इसका अपवाद नही रहा | उपरोक्त दोनों मामलों मे व्यवसाय भाव साफ – साफ दिखता है | आखिर जब व्यक्ति दीक्षित होकर संत बन गया तो उसके पास अपना कुछ भी नही रह जाता है उस स्थिति मे सचिन ने मंत्री जी को ऑडी भेंट की | कोई भी साधारण आधमी  भी समझ सकता है कि की यह एक तरह से सौदा था | हेलीकाप्टर से पुष्प वर्षा होने की घटना धार्मिक मामलों मे भी कारपोरेट के दखल को प्रदर्शित करता है | दूसरे मामले मे तो इसका निर्धारण करना मुस्किल हो जाता है कि यह धर्म से जुडा मसला है या किसी इवेंट मैनेजमेंट से जुड़ा मसला | हाल ही मे आतंकी हमला झेलने वाले पंजाब के गुरुदासपुर की रहने वाली दो बच्चों की माँ सुखविंदर के साथ ऐसा अचानक क्या घटित हुआ कि अपना सिलाई का धंधा छोड़ वह सन्यासिन बन बैठी ,वह भी तब जब हलवाई पेशे वाला उसका पति लंदन चला गया हो | दरअसल, सुखविंदर ने कभी मंदा पड़ने वाले धर्म के चोखे धधे को ताड लिया और धंध बदलकर राधे मां बन बैठी | अपने धंधे को बढ़ने के लिए राधे माँ ने अदभुद सूझ-बूझ का परिचय दिया | राधे माँ का वेबसाइट न सिर्फ उनके साक्षात् दुर्गा माँ होने की घोषणा करता है वरन उनके दिव्य दर्शन का निमंत्रण भी देता है | राधे माँ की चौकियों मे दर्शन के टोकन के लिए लगने वाली लम्बी क़तार किसी अच्छे खासे चलने वाले दुकान का एहसास कराती है | वहीँ चौकियों मे भजनों और फ़िल्मी गीतों पर बाजारू नाच के बीच भक्तों द्वारा माँ को किये जाने वाले  चुम्बनों को देखकर मन मे भ्रम पैदा होता है कि यह जागरण है या मुजरा |  माँ के दो खास शिष्यों मे से एक टल्ली बाबा तो केवल जागरणों की बुकिंग करता है |
                         तीसरा मामला उडीसा के सारथि बाबा से जुडा है जिनके ऊपर महिलाओं से अवैध सम्बन्ध रखने का आरोप है | हैदराबाद के एक होटल मे एक ही कमरे मे बाबा एक महिला के साथ रुका था और महिला को अपनी पत्नी बताया था |  
                          ऊपर के दोनों मामलों से सम्बंधित लोग या तो महामंडलेश्वर थे या बनाये जा रहे थे जिस पर विवाद हुआ | दरअसल, महामंडलेश्वर बनने के बाद पदासीन व्यक्ति को परोक्ष रूप से ही सही मिलती हैं | कुंभ पर्व पर होने वाली पेशवाई व शाही स्नान मे अखाडा के आचार्य पीठाधीश्वर के साथ महामंडलेश्वर रथ पर बैठकर निकलते हैं | चांदी का सिंहासन होता है और रत्नजडित क्षत्र उनकी शोभा बढ़ाते हैं |कैसी विडम्बना है कि भगवान अपने तिरपाल और कैलाश पर्वत पर ही खुश हैं और उनके तथाकथित भक्तों को चांदी का सिंहासन व क्षत्र की जरुरत पड रही है भक्ति पाने के लिए मज़ेदार बात यह है कि दोनों मामलों पर संतो के बीच गंभीर मतभेद देखने को मिला | दोनों मामलों मे आरोपियों की तरफदारी करने वाले लोगों मे से कोई भी परी अखाड़े के मान्यता के मुद्दे पर बोलने को तैयार नहीं है | दबी जुबान मे कई संत स्वीकार करते हैं कि वे धर्म – कर्म जैसे पुरुष  प्रधान क्षेत्रों मे महिलाओं की मौजूदगी मंजूर नहीं है | इन घटनाओं के आलोक मे यदि कोई अपने को नास्तिक न बनने का 10 कारण पूछे तो उनमे से शायद ही कोई बोलने की स्थिति मे हो |एसा नही है की यह स्थिति केवल हिन्दू धर्म मे है | चर्च मे पादरियों द्वारा छोटे बच्चों के साथ दुष्कर्म की घटनाओं को कौन भूला है ?ईसा के आदर्शों का गला कैसे घोटा जा रहा है इस सन्दर्भ मे एक घटना का उद्धरण समीचीन होगा | एक बार ब्रिटिश संसद मे वेश्यालयों को बंद कराने सम्बंधित बिल का यह कहते हुए विरोध किया था कि वेश्यालय ही वह जगह हैं जो चर्च मे जाने वाली हमारी बहू –बेटियों की इज्जत पादरियों से बचा सकते हैं |इसी तरह इस्लाम मे भी जारी होने वाले फतवे हास्यास्पद व आधारहीन होने के साथ साथ बिरादारी के तरक्की मे भी बाधक हैं |मुस्लिम धर्मगुरुओं द्वारा कुरान की शिक्षाओं को तोड़ –मरोड़ कर पेश करने का ही नतीजा है कि पढ़े –लिखे युवा भी जिहाद के नाम पर हत्या बलात्कार जैसे कृत्यों से परहेज नही करते |
धर्म के नाम पर होने वाली ठगी व अत्याचार कोई नई बात नही है | यह समस्या आदिकाल से है | इस समस्या का हल भी लोगों की इच्छाशक्ति मे ही निहित है | वस्तुतः इस समस्या पर गहन चिंतन दुर्भाग्य से अभी तक नही हो पाया है |लोगो के आस्था के साथ खिलवाड़ करने वाले बाबा , मौलवियों एवं पादरियों का एक ही मकसद होता है कि कैसे वे लोगो के नज़र मे खुद को चमत्कारी सिद्ध कर पायें क्योकि दुनिया चमत्कार को ही नमस्कार करती है | हमें चमत्कारों पर विश्वास करना बंद करना होगा नही तो मुफ्तखोरी के चक्कर मे उडीसा के परिवार की तरह बाबाओं पर सब कुछ लुटाने के बाद आत्महत्या करने पर मजबूर होते रहेंगे | हमें धर्म की मूल भावना को समझना होगा न कि किसी व्यक्ति विशेष से अपने कल्याण की उम्मीद करना | “we must have a power to judge what is just,beautiful and hounrable.” – महान दार्शनिक सुकरात के इस बात को अगर हम अपने जिंदगी मे उतर लें तो कुकुरमुत्ते की तरह पैदा होने वाले बाबा , मौलवियों को रोक सकेंगे |